वामपंथियों, कांग्रेस, बुद्धिजीवियों, दलित चिंतकों और मीडिया के दलालों ने जमकर बेची थी रोहित की लाश

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आज से एक साल पहले जब एक हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी के छात्र रोहित चक्रवर्ती वेमुला ने 17 जनवरी 2016 को आत्महत्या कर ली थी तब भारत की राजनीति में एक भूचाल आ गया था.

मीडिया ने रातों-रात, जीवन से हारे हुए छात्र वेमुला की लाश को, मोदी सरकार द्वारा दलित उत्पीड़न का प्रतीक बना दिया था.

[जाली प्रमाणपत्र वाला फर्ज़ी दलित था रोहित वेमुला]

राजनीति की रोटी सेंकने के लिए वेमुला की लाश को सबसे पहले वामपंथियों ने बेचा था. इसके बाद फिर भारत के सभी सेक्युलर बिरादरी के राजनैतिक दलों, बुद्धिजीवियों, दलित चिंतकों और मीडिया में बैठे इन सबके दलालों ने, इस लाश को मोदी जी की सरकार और उसमें तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पर वार करने के लिए हथियार बनाने में कोई देरी नही की थी.

वेमुला की त्रासदी यह थी कि वह जीवन में संघर्ष का रास्ता छोड़ कर, सरकार के वजीफे पर ज़िन्दगी के शौक पूरा करने को ही जीवन समझ बैठा था.

जब उसको वास्तविकता का एहसास हुआ तब उसने मानसिक अवसाद में आकर जीवन का अंत कर लिया.

सभी दलित चिंतकों, सेक्युलर नेताओं, वामपंथी जमात और बुद्धिजीवियों ने इसे मोदी सरकार के दलित विरोधी और दलित उत्पीड़न रवैए के रूप में बेचा था.

उस वक्त मंत्री स्मृति ईरानी ने जब तथ्यों को लोकसभा में रखा था तब न विपक्ष ने सुना था और न ही मीडिया ने उसको भारत को सुनाना चाहा था, क्योंकि दलित पर राजनीति और सरकार को दलित विरोधी सिद्ध करने का यह अवसर कोई भी छोड़ना नहीं चाहता था.

मेरा उस वक्त ख्याल यही था कि जिस रोहित वेमुला ने जीवन से हार कर, शांति की अपेक्षा में मौत को गले लगाया था, उसकी आत्मा को मौत के बाद भी शांति नही मिली होगी. दलित के नाम पर फ़र्ज़ी वजीफे की झूठी ज़िन्दगी जीने वाले को मौत सकून कैसे दे सकती है?

लेकिन मुझे अब लगता है कि रोहित वेमुला की आत्मा को शांति मिल जायेगी क्योंकि मीडिया द्वारा प्रचारित और दलित चिंतकों व वामपंथियों द्वारा उसको दिया गया दलित व्यक्तित्व कुम्हलाने लगा है.

खबर आयी है कि गुंटूर के जिलाधिकारी जो वेमुला के दलित होने या न होने की जांच कर रहे थे उन्होंने जाँच पूरी कर ली है, जिसका निष्कर्ष यह है कि रोहित वेमुला दलित नहीं था और उसने जाली प्रमाणपत्र प्राप्त किया था.

वैसे इस चुनावी समर के मौसम में इस खबर के कोई मायने नहीं हैं लेकिन बताना इसलिए जरूरी था क्योंकि न बेईमान मीडिया इस पर कोई बात करेगी और न दलित हित की चिंता में दिन रात मरने वाले ही इस खबर का कोई संज्ञान लेंगे.

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