संस्कृति और अर्थव्यवस्था : जानिये वैलेंटाइन डे के पीछे ‘उनका’ वास्तविक षडयंत्र

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हिन्दू दर्शन- सनातन संस्कृति ही एकमात्र ऐसी है जिसने हर मत मजहब को शरण दी है. और आज उसी सनातन संस्कृति के लोग ही उसके शत्रु बन गए हैं. हिंदुत्ववादी विचारधारा से जुड़े लोगों पर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लिबरल लोग मानवता का विरोधी होना बताते हैं. ये लोग असल में एक मानसिक बीमारी, मानसिक दास के जीते जागते उदाहरण हैं. वे ऐसे अधकचरे हैं जो किसी विचारधारा को नहीं जानते सिवाय जो उनके मस्तिष्क में भरा गया है.

सनातन की महानता जानने के लिए, पहले एक तुलनात्मक विवेचना करते हैं, सनातन संस्कृति और अन्य मतों की. R. J. Rumbell जो कि Hawaii university के प्रोफेसर हैं, अपनी 30 वर्षों से भी ज्यादा के शोधकार्य उन्होंने सामूहिक हत्याकांडों (mass killings) पर किया, जिनके अनुसार 2.62 billion ( 26 करोड़ 20 लाख) लोगों मारा गया विश्वभर में 20वीं सदी तक. जिसमें 90% हत्याएं इस्लाम, ईसाइयत या कम्युनिज्म ने की.

13 वीं सदी तक भारत में (आज के नक़्शे अनुसार) कलिंग युद्ध और एक घटना छोड़ कुछ नहीं हुआ था. जबकि विश्वभर में क्रूसेड और जिहाद के नाम पर हत्याएं हुई. फिर 13वीं सदी के बाद भारत में ही सर्वाधिक लोगों को मारा गया.

Dr John Pier Lehmann जोकि जाने माने अर्थशास्त्री हैं, WHO के उच्च पद पर रहे हैं. उनका कथन है “विश्व में समस्या एक विचारधारा और एक ईश्वरवाद से है. और हिन्दू दर्शन की महानता यह है कि इसमें हर विचारधारा को सहमति/संरक्षण है. पाश्चात्य सभ्यता, सनातन संस्कृति को देख हमेशा से आश्चर्य में रही, क्या कोई नारी ईश्वर (देवी) हो सकती है? (*इसीलिए दुर्गा माँ, सीता माँ का अपमान कम्युनिस्ट करते हैं).

आपको पता होना चाहिए जितने भी इस्लामिक/ईसाई देश हैं वहां 1940 से 1972 तक महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था, पढ़ने या बैंक खाता खोलने का अधिकार नहीं था. वहीँ भारत में लक्ष्मी बाई, झलकारी देवी, अवंतिका बाई जैसी वीरांगनाएं 100 वर्ष पहले हुई थी. “यत्र नारियस्तु पूज्यन्ते रमयन्ते तत्र देवताः” अर्थात जहाँ नारी का सम्मान है वहीँ ईश्वर है के विचार को #मनुस्मृति फैलाती रही.

पर यह संस्कृति उन्हें बर्दाश्त न थी. उन्हें दार-उल-इस्लाम या “गॉस्पेल” से रंगा हुआ भारत चाहिए था. हमें बस इतना पता है इस्लामी आक्रमण हुआ मंदिर और सोना लूटने के लिए, अंग्रेज/ईसाई आये हमें लूटने के लिए. लूटा यह सत्य है पर बात और भी गहरी है. हमारे शास्त्र कहते हैं धर्मस्य मूलं अर्थम् अर्थात धर्म का मूल अर्थ में है. भूखे लोगो का धर्म नहीं होता.

Belgium के एक बड़े अर्थशास्त्री Paul Birogue ने 1750 से 1900 तक विश्व अर्थव्यवस्था का शोध किया जिसने विश्व को चौंका दिया. भारत जहाँ 24.5% जीडीपी रखता था यूरोप और अमेरिका दोनों मिलकर 4% थे. और 1900 के अंत तक पूरा चित्र उल्टा हो गया. हमें गरीब न किया जाता तो लोगों का अन्य धर्म में जाने का सवाल ही नहीं होता.

इसके बाद Angus Meddison ने 0 BC से 20 AD तक शोध किया तो पश्चिमी देश हिल गये. 2000 वर्षों तक भारत दुनिया का सबसे अमीर देश था, यह उन्हें पच नही पा रहा था.

परंतु भारतीय संस्कृति को तोड़ने का षड्यंत्र बहुत पहले बनाया जा चुका था. तभी जब हमारी सनातन शिक्षा व्यवस्था को बंद कर अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लागू की गयी. राजा राम मोहन राय जैसे अंग्रेजो के पक्षधर (जिन्हें समाज सुधारक बताया गया) इसमें शामिल थे, और अब तक पूरी कांग्रेस भी साथ रही. बड़े बड़े घोटाले आपको गरीब बनाये रखने के लिए हैं न कि उन्हें पैसा कमाना था. और यही हम समझ नही पाए. यही लूटा गया पैसा भारत में आता है कम से कम 4000 NGO के माध्यम से जिसपर सरकार ने आंशिक प्रतिबन्ध लगाये हैं.

अब इतना तो हम समझ गए कि अंग्रेजो ने जो लूटा वो हम पर इन्वेस्ट भी किया, धर्मान्तरण के लिए. Thomas B.Macaulay का 2 फरवरी 1835 का वो कथन याद करिये “मैंने भारत भ्रमण में एक भी भिखारी, चोर या चरित्रहीन व्यक्ति नहीं देखा. यहाँ नैतिकता इतनी है कि गुलाम बनाना अत्यन्त कठिन. किंतु अगर फिर भी करना है तो भारत की रीढ़ की हड्डी उसकी संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करना पड़ेगा. फिर भारतीय अपनी सभ्यता को हीन और हमारी सभ्यता को उच्च समझेंगे. वे दिखने में भारतीय होंगे पर आत्मा से अंग्रेज इसाई.”

भारत में शराब का चलन, वैश्यालय का चलन सब उसी रणनीति का हिस्सा थी जो आज सफल होती दिख रही हैं. अमेरिका की एक बैंकिंग फर्म है ‘Goldman Sachs’ उसके अनुसार भारत 2025 तक विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था होगी. हमारे पास 1.7 trillion dollar होंगे अपने इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगाने के लिए वो भी  बिना उधार लिए. यह पैसा कहाँ से आया? यह भारत की पारिवारिक व्यवस्था से. जो घरेलू बचत हम करते हैं. अब आपको मोदी के जनधन खाते, नोटबंदी की याद आएगी, कैसे अधिक पैसा बैंक में आया.

इस परिवार व्यवस्था, हमारे संस्कारों ने हमें बचाये रखा है, नहीं तो हमारा देश अमेरिका के Lehman Brothers के साथ ढह गया होता. इन संस्कारों का लाभ अमरीका और यूरोपियन यूनियन को नहीं मिला इसलिए उनकी अर्थ व्यवस्था चौपट हो गयी और 2008 से अब तक ढंग से नहीं उबर सकी है. और इसीलिए बराक ओबामा को नेशनल मैरिज स्कीम बनानी पड़ गयी. इसीलिए Donald Trump और David Cameron आदि नेता भारत का गुणगान करने पर मजबूर हैं.

इस पारिवारिक व्यवस्था को ध्वस्त करने का सबसे बढ़िया मार्ग अंग्रेजो ने 180 वर्ष पूर्व सोचा था. वैलेंटाइन डे एक समय पर संत वैलेंटाइन ने भारत की परिवार व्यवस्था के प्रभावित होकर ही बनाया था. 14वीं शताब्दी में ईसाई देशों में बस ‘लिव इन’ सम्बन्ध चलता था. बच्चे हुए तो कान्वेंट में छोड़ देते थे. एक दिन को षड्यंत्र से पूरा सप्ताह बना दिया गया… चॉकलेट डे से वैलेंटाइन डे तक. यह संस्कृति का क्षरण है. और देश के हित में तो है ही नहीं. मूर्खता में लोग बस भेड़ चाल चलते रहते हैं. यह प्रथम चरण है क्षरण का, फिर लिव इन जैसी घटिया संस्कृति आती है.

वैलेंटाइन डे में 13 लाख से अधिक किशोरियां भारत में गर्भवती हो जाती हैं. और विदेशी कंपनियां 25000 करोड़ का व्यापार करके जाती हैं. उन्हें दुगना फायदा है आम के आम गुठलियों के दाम.

हर देश की जीने की पद्धति होती है, उसके अपने संस्कार उसके अपनी संस्कृति होती है. भारत को अमेरिका-यूरोप मत बनाओ, जहाँ माता पुत्र, पिता बेटी के भी अधर्मी सम्बन्ध जायज हैं. भारत की महान संस्कृति ही मानवता की धरोहर है. इसे संरक्षित करना हर भारतीय का कर्तव्य है. हमारी आरती में उद्घोष होता है प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो. हर जीव का महत्त्व है इसलिए सात्विक शाकाहार करना चाहिए. दया ही मानवता की पहचान है.

इन सब बातों के अलावा भी बहुत कुछ है. जब आप जानेंगे, तब पैरों से जमीन खिसक जायेगी. आपसे अनुरोध है विदेशी नहीं स्वदेशी बनें, यह आपका बहुत बड़ा योगदान होगा देश के लिए. हमारी सनातन संस्कृति ही हमारी शक्ति है, इससे दूर गये तो अमेरिकी मूल निवासी ‘रेड इंडियन’ जैसे लुप्त भी हो जायेंगे.

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