यूपी चुनाव में भाजपा की लहर नहीं, सुनामी है

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यूपी में भाजपा की लहर है…. ये कहना गलत होगा. लहर नहीं जनाब…. सुनामी है. मैं ये बात यूँ ही नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पे कह रहा हूँ.

भाजपा के इतिहास में अब तक भाजपा की राजनीति दो बार उफान पे आयी. पहली राम लहर में, दूसरी मोदी लहर में.

राम लहर में भाजपा के पीछे हिन्दू वोट एकजुट हुआ था. उस लहर में कोई जातीय कोण नहीं था.

उसके तुरंत बाद बाबरी विध्वंस हुआ…. कल्याण सिंह की सरकार नरसिम्हा राव जी ने बर्खास्त कर दी और फिर जब नया चुनाव हुआ तो सपा-बसपा गठबंधन हुआ.

मिले मुलायम कांशी राम, हवा में उड़ गए जय श्री राम…. ये नारा था उस गठबंधन का. और श्री राम को वाकई हवा में उड़ा दिया गया.

ये वो दिन थे जब इस सपा-बसपा गठबंधन को समूचा OBC, दलित और मुस्लिम तबका वोट करता था.

भाजपा के पल्ले सिर्फ सवर्ण और बनिया सुनार था…. अकेले सवर्णों के बल पे आप सरकार नहीं बना सकते.

भाजपा का वनवास बहुत लंबा चला और सपा-बसपा बारी-बारी से इन्ही OBC और दलित वोट के Core Vote और इसके ऊपर मुसलमान का Top Up…. उसी Top Up में कभी ब्राह्मण शामिल हो गए तो कभी अन्य सवर्ण जातियाँ….

भाजपा सिकुड़ती गयी, सिकुड़ती गयी और अंततः 15% वोट, 10 सांसद और 47 विधायक तक आ सिमटी.

फिर शुरू हुआ मोदी – अमित शाह का दौर.

इस दौर में पहले तो मुद्दे बदले….

मोदी जी के नेतृत्व में मुख्य मुद्दा विकास हो गया….

विकास के इस मुद्दे को सामने रख नेपथ्य में अमित शाह के नेतृत्व में यूपी में एक अनोखी सोशल इंजीनियरिंग चल रही थी.

ये एक बड़ी कड़वी सच्चाई है कि OBC और दलित समाज की सारी मलाई अहीर और चमार खा गए. बाकी सब इनकी पालकी ढोते रहे और इनके जूठे पत्तल चाटते टुकुर-टुकुर ताकते रहे.

भाजपा ने इसी गैर यादव OBC और गैर चमार दलित पे फोकस किया और हाशिये पे पड़े इन जातीय समूहों को राजनीति की मुख्य धारा में ले आये.

इसकी शुरुआत यूँ तो 2013 में ही हो गयी थी पर तमाम राजनैतिक पंडित और चुनाव विश्लेषक और पत्रकार इस ट्रेंड को पढ़ने में चूक गए.

ये जातियां चूँकि पिछले 20 बरस से सपा-बसपा को वोट देती आ रही थीं इसलिए किसी को अंदेशा भी न था कि बाजी इस कदर, इतनी जल्दी पलट जायेगी.

हाशिये पे पड़ी ये जातियां भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो रही थीं. पर दिल्ली के स्टूडियो में बैठे स्वनामधन्य पत्रकार / विश्लेषक इस से बेखबर भाजपा को अब भी वही पुरानी वाली भाजपा समझ के सिर्फ 160 से 220 seat दे रहे थे जबकि बहुमत का जादुई आंकड़ा 272 का था.

चुनाव हुआ…. result आया, पर एक बार फिर उस result की सही समीक्षा न हुई…. जीत का सेहरा मोदी जी के करिश्मे और विकास के एजेंडे के सिर बाँध दिया गया और OBC-दलित योगदान को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

जब political forces की re-alignment होती है तो वो हमेशा दो चरणों में होती है. पहला Test phase होता है और दूसरा final phase.

इसे आप दिल्ली में हुए दो विधानसभा चुनावों के माध्यम से समझ सकते हैं. जब पहली बार आम आदमी पार्टी दिल्ली के चुनावी मैदान में उतरी तो दिल्ली के मुसलमानों ने बड़े अनमने ढंग से उसे थोड़ा बहुत वोट दिया. किसी को भरोसा न था कि AAP कैसा perform करेगी. पर फिर भी AAP 28 सीट ले आयी.

फिर जब 2015 में दिल्ली में दुबारा चुनाव हुआ तो मुस्लिम वोट को किसी प्रकार की कोई शंका न थी. दिल्ली में भाजपा को कौन रोक सकता है इसमें कोई शक़ शुबहा न था इसलिए समूची दिल्ली का मुस्लिम वोट एकमुश्त AAP को मिला.

दिल्ली में मुस्लिम वोट के AAP के पक्ष में re-alignment की 2013 में शुरू हुई प्रक्रिया 2015 में आ के समाप्त हुई.

इसी तरह UP में गैर यादव OBC और गैर चमार-जाटव दलित की भाजपा के पक्ष में re-alignment की प्रक्रिया जो 2013 में शुरू हुई उसका प्रथम चरण 2014 के लोस चुनाव में और अब ये फाइनल चरण 2017 के विधान सभा में पूरा हो रहा है.

UP के जिन गांवों में भाजपा का झंडा तक न दीखता था और जहां उसे 50 वोट नहीं मिलता था वहाँ पार्टी 600 वोट ले के निकल रही है.

ये अमित शाह की राजनैतिक सूझबूझ ही है कि आज भाजपा ने 150 से ज़्यादा टिकट गैर यादव OBC को और लगभग 67 टिकट गैर चमार-जाटव दलितों को दिए हैं.

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि यूपी में अगली सरकार OBC-दलित के वोट से चुनी जायेगी. एक और जहां मुस्लिम वोट कुल जमा 20-22% है वहाँ OBC वोट 40% से ज़्यादा है.

तमाम एकता के बावजूद मुस्लिम वोट जहां 3 जगह बँट रहा है, वहाँ OBC वोट एकमुश्त भाजपा की झोली में गिर रहा है.

भाजपा की लहर नहीं सुनामी है.

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