आप-हम किस मुँह से नई पीढ़ी के पुस्तकों से दूर होने का रोना रोते हैं?

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स्वामी ध्यान विनय से आप कोई भी प्रश्न करो, चाहे राजनीति से सम्बंधित हो, हिन्दू सनातन धर्म से सम्बंधित, अध्यात्म, पुनर्जन्म, कर्मकाण्ड, वामपंथ… उनका एक ही जवाब होता है…

“You should read Guru Datt…”

मैंने भी सोचा पढ़ ही लिया जाए… कुछ पढ़ी भी… लेकिन एक बात अनुभव हुई पढ़ते समय आधी ऊर्जा हाथ में किताब पकड़ आँखों को शब्दों पर टिकाने में खर्च हो जाती है… गुरुदत्त की किताबें पढ़ने के लिए नहीं सुनने के लिए हैं…

तो जब बड़े सुपुत्र ज्योतिर्मय गर्भ में थे तो ध्यान विनय ने गुरुदत्त साहित्य की खूब सारी पुस्तकें मुझे पढ़कर सुनाई… भाग्यचक्र, दायरे, ज़िंदगी, भैरवीचक्र…

देर रात हो जाती तो मैं कई बार सुनते सुनते सो जाती थी… लेकिन गर्भ का ये अभिमन्यु… जागता रहता… और सुनता रहता था…

फिर एक दिन गुरुदत्त की पुस्तक “परित्राणाय साधुनाम” डाक से आई तो मैं इसका आकार प्रकार और मोटाई देखकर अचंभित रह गयी, इतनी मोटी किताब कब सुन पाऊँगी!!!

लेकिन ज्योतिर्मय किताब हाथ में लिए यूं देखने लगे जैसे उनको बहुत प्रिय हो…

क्यों न हो… मेरे साथ उन्होंने भी तो सुनी है… मुझसे गुरुदत्त का परिचय आठ साल पहले ध्यान विनय ने करवाया था … उनको पढ़ते सुनते हुए हमेशा लगता है… मेरी वास्तविक यात्रा बहुत देर से शुरू हुई…

ज्योतिर्मय की यात्रा तो मेरे गर्भ से ही शुरू हो गयी थी… आप अपने बच्चों में हिन्दू सनातन धर्म की नींव डालना चाहते हैं… या उनकी नींव को मजबूत करना चाहते हैं… तो मैं भी यही कहूंगी “You should read Gurudatt…”

ज्योतिर्मय को यूं तो हिन्दी पढ़ना बहुत पसंद है, लेकिन वे इस उम्र में अभी इन पुस्तकों को समझ नहीं सकते… लेकिन ऐसी पुस्तकें गीता-रामायण जैसे धर्म ग्रंथों से कम नहीं होती, जिनको छूने भर से विशेष ऊर्जा आपकी देह में प्रवेश कर जाती है…

यकीन न हो तो कभी ऐसी किसी पुस्तक को प्रेम और श्रद्धा से अपने तकिये के नीचे रखकर सो जाइये… फिर देखिये …”जादू…”

इस विषय पर प्रख्यात लेखिका डॉ. कविता वाचकनवी एक महत्वपूर्ण बात कहती हैं –

एक युग था, जब आठवीं-दसवीं तक पढ़ी अतिसाधारण गृहणियाँ भी अपनी भीषण व्यस्त दिनचर्या व घरेलू हाड़तोड़ कामों के बीच से भी समय निकाल कर पुस्तकें पढ़ा करती थीं, भले ही किराए पर लिए गुलशन नन्दा टाइप उपन्यास ही; और इस बहाने हर मोहल्ले में किराए पर पुस्तक देने वाली एक दुकान भी होती थी.

प्रतिमाह घर में सदस्यताशुल्क चुकाई पत्र-पत्रिकाएँ भी आया करती थीं. अपने घर की उन्हीं कम पढ़ी-लिखी स्त्रियों की देखा-देखी और उनसे चुरा-छिपाकर पढ़ने वाली, एक पूरी पीढ़ी साहित्य पढ़ना सीख गयी. मैं उन सभी स्त्रियों और उनकी पढ़ने की उस लत को प्रणाम करती हूँ. वे लोग आज के लोगों से अधिक धनी या अधिक निठल्ले नहीं थे कि पुस्तक उनके लिए विलासिता न हो.

अब घरों से पुस्तकें नदारद हो गयी हैं, अधिकांश अध्यापकों के घरों में भी पुस्तकें उनकी पठन-पाठन में रुचि के कारण नहीं अपितु धन्धे की विवशता / आवश्यकता के कारण होती हैं. स्त्रियों और परिवार का स्तर टीवी धारावाहिकों के घटिया स्तर के अनुकूल है. जो कामकाजी नहीं हैं, वे दूसरों के जीवन में काँटे बोने और टीवी देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करतीं. पुरुषों का तो पढ़ने-लिखने से कुत्ता-बिल्ली का ही बैर है.

आप-हम किस मुँह से नई पीढ़ी के पुस्तकों से दूर होने का रोना रोते हैं? कभी अपने गिरेबान में झाँक कर देखिए और छल प्रपञ्च तथा टाईमपास घटिया मनोरंजन से उबरना सीखिए.

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