टेस्टिंग है कि आप वोट से जवाब दे सकते हैं या नहीं, चोट से देना तो बस का है नहीं

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जब एक नया सॉफ्टवेयर बनके तैयार होता है तब टेस्टर उसकी स्ट्रेस टेस्टिंग करता है. स्ट्रेस टेस्टिंग से टेस्टर सॉफ्टवेयर का ब्रेकिंग पॉइंट पता करते हैं.

इसमें CPU को उसकी प्रोसेसिंग क्षमता से ज्यादा और अधिक समय के लिए चलाकर चेक करते हैं कि क्या इससे कंप्यूटर हैंग होगा? इसीलिए इसे टॉर्चर टेस्टिंग भी कहते हैं.

यूपी सहित पूरे देश में आजकल यही टेस्टिंग चल रही है. उन्होंने सबसे पहले आपको एक बार पीटा. जब आपने प्रतिकार नहीं किया तो उन्होंने इसे दोहराना शुरू किया.

उन्हें लगा आप तो पीटी जा सकने वाली कौम हैं. तो धीरे-धीरे उन्होंने आपको मारना शुरू किया. आप फिर भी कुछ नहीं बोले तो उन्होंने भीड़ में मारना शुरू किया.

कई सारे नाम में गिना सकता हूँ. पर आप खुद देखें, सर्च करें तो बेहतर. कुछ काम खुद भी करने चाहिए. सेल्फ स्टडी से दिमाग के द्वार खुलते हैं.

अब इस स्ट्रेस टेस्टिंग का लास्ट फेज़ है. चुनाव का समय है. अभी मारेंगे तो तो आप जवाब दे सकते हैं.

जवाब करने के 2 तरीके हैं. एक चोट से दूसरा वोट से. चोट से जवाब देना आप जानते नहीं. इसकी टेस्टिंग पहले ही वो कर चुके हैं. ये टेस्टिंग है कि आप वोट से जवाब दे सकते हैं या नहीं.

उनकी रणनीति सफल हो रही है. धीरे-धीरे वो अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं. क्योंकि हम जाति और वर्ग में अभी तक बंटे हुए हैं. हम उससे आगे बढ़ कर वोट नहीं कर पा रहे.

मैं सलाह नहीं दूँगा कि आपको क्या करना है. आप खुद समझदार हैं. बस इतना बताना चाहता हूँ कि सारी टेस्टिंग होने के बाद ही सॉफ्टवेयर अपना काम शुरू करते हैं.

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