सांस्कृतिक निरक्षरता : मिल्स एंड बून्स में घुसी रहने वाली से अमृतलाल नागर को जानने की उम्मीद

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आपने पहली बार वैलेंटाइन डे का नाम कब सुना, कौन सा साल था? और उसके पहले प्रेम नहीं हुआ करता था क्या? और प्रेम की अभिव्यक्ति के कौन से अवसर थे?

1989-90 की बात रही होगी. बजरंगी अखाड़े टाइप के बॉय्ज़ स्कूल और पटना बी एन कॉलेज (जिसे बिना नारी कॉलेज भी कहा जाता था) के शुष्क वातावरण से निकल कर मेडिकल कॉलेज में पहुंचा था…

जिंदगी में पहली-दूसरी दफा लड़कियों की शकल सामने से देखी थी… उनसे बात करने का शऊर-सलीका और उन्हें इम्प्रेस करने की स्मार्टनेस तो दूर की कौड़ी थी… उनसे 2 मिनट बात करने में ही रक्तप्रवाह में एड्रेनलिन और टेस्टोस्टेरोन का मैच चलने लगता था.

तब क्या पता था कि यह वैलेंटाइन डे क्या बला है…और पता भी होता तो कौन सी मूली उखाड़ लाते.

तब नयी-नयी अंग्रेजी किताबें पढ़ने का शौक शुरू हुआ था. यह शौक जेन्युइन था… इसका लड़कियों को इम्प्रेस करने से ज्यादा वास्ता नहीं था.

पर अंग्रेजी किताबों का भंडारा तो गर्ल हॉस्टल में ही था… बॉय्ज़ हॉस्टल में कौन पढता था अंग्रेजी. वहां तो Ganong ही पढ़ ली जाये बिना डिक्शनरी के तो बहुत था.

तब पहली बार थॉमस हार्डी की Far from the madding crowd में वैलेंटाइन डे का जिक्र पढ़ा था. पर उससे भी जरा पहले, जिस बालिका से वह किताब मांग कर लाया था, उसने पूछा था – इस वैलेंटाइन डे पर क्या कर रहे हो?

मैंने पूछा – यह वैलेंटाइन डे क्या बला है?

उसने ऐसा एक्सप्रेशन दिया जैसे मैं “पी एस पी ओ” नहीं जानता… (याद है वो पंखे का विज्ञापन – ये pspo भी नहीं जानता… वैसे PSPO है Peak Speed Performance Output) क्या! वैलेंटाइन डे नहीं जानते?

यह पहली बार नहीं था जब उसके सामने मेरी सांस्कृतिक निरक्षरता की पोल खुली थी. उसके पांच मिनट पहले उसने बड़े गर्व से बताया था कि वह लोरेटो कान्वेंट से पढ़ी है.

जब मैंने कुछ खास प्रभावित होने वाली प्रतिक्रिया नहीं दी तो उसने यह दो-तीन बार दुहराया. फिर मैंने पूछ ही लिया, यह लोरेटो कान्वेंट कौन सी तोप चीज है…

अब मुझे लग ही रहा था कि मैं दुनिया का सबसे मूढ़, अनपढ़, अज्ञानी व्यक्ति हूँ… बात घूम फिर कर किताबों, लेखकों तक चली आयी.

मुझे यह थोड़ा सुरक्षित विषय लगा. यहाँ अपनी अज्ञानता को थोड़ा ढक सकता था. मुझे कुछ-कुछ याद है, अमृतलाल नागर जी का देहांत हो गया था या वे अस्वस्थ चल रहे थे, तो कुछ खबर आ रही थी अखबारों में.

तो मैंने पूछ लिया – अमृतलाल नागर को पढ़ा है?

उसने पूछा – यह अमृतलाल नागर कौन है?

अब मेरी शकल बनाने की बारी थी… हें! ये अमृतलाल नागर को नहीं जानती?

मेरी हीन भावना कुछ कम हुई. चलो, कुछ है जो यह भी तो नहीं जानती… तो मैंने उसका ज्ञानवर्धन किया…

अमृतलाल नागर के बारे में बताया, फिर मनोहरश्याम जोशी के बारे में बताया, फिर महादेवी वर्मा, जैनेन्द्र, निर्मल वर्मा और फणीश्वर नाथ रेणु के बारे में बताया और अपने आप को तीसमार खां समझता हुआ इस गफलत में वापस लौटा कि मैंने तो छोरी को इम्प्रेस कर दिया…

जब और समझा और जाना तो आज पता चलता है, मैं और कितना बड़ा बेवकूफ बन रहा था… थॉमस हार्डी से निकल कर मिल्स एंड बून्स में घुस जाने वाली लोरेटो की लड़की से मैं उम्मीद कर रहा था कि वह अमृतलाल नागर को जानती होगी… यही मेरी सांस्कृतिक निरक्षरता थी…

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