भारत, मुसलमान, राजनीति और वोटबैंक

0
26

देश के पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों के बहाने कई नए और चौंकाने वाले तथ्य भी राजनीतिक रूप से उभर कर सामने आने लगे हैं. हालांकि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने कड़ाई से कहा है कि किसी भी दशा में जाति और सम्प्रदाय या धर्म का इस्तेमाल चुनाव में नहीं किया जाना चाहिए लेकिन ये राजनीतिक पार्टियां बावज़ूद इसके, अपनी जीत-हार के सारे समीकरण जाति और सम्प्रदाय के आधार पर ही तय कर रही हैं.

इतना ही नहीं, ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश में तो इस आदेश का कोई असर ही नहीं दिख रहा. मंचों से खुलेआम दलित-मुस्लिम गठजोड़ की वकालत की जा रही है. मुस्लिम समुदाय को हर भाषण में इस बात से डराया जा रहा है कि यदि आप ने फलां के साथ मिल कर वोट नहीं दिया तो फलां जीत जाएगा और फिर आप संकट में आ जाओगे.

कोई कहता है कि हमने 104 मुसलमान प्रत्याशी उतारे हैं इसलिए आप हमारे साथ आइये. कोई कहता है हमने 70 टिकट दिया है, मुसलमान हमारे साथ होने चाहिए.

इस वोट बैंक पर कब्जे के चक्कर में सभी यह भूल गए हैं कि यहाँ और भी समुदाय हैं जो अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं, लेकिन उनको कोई पूछने वाला नहीं है.

यहाँ यह बिंदु का उल्लेख करना भी जरूरी है कि उत्तर प्रदेश की जंग में एक तरफ भाजपा के चेहरे के रूप में नरेंद्र मोदी स्वयं हैं और दूसरी तरफ सारे दल मोदी का ही भय दिखा कर मुस्लिम वोट बटोरने की जुगत में हैं.

यहाँ सपा-कांग्रेस गठबंधन, मायावती की बसपा और भाजपा का त्रिकोणीय संघर्ष है लेकिन केंद्र में मुसलमान और उन्हीं से जुडी राजनीति चर्चा में है. रोचक पहलू तो यह है कि इसी युद्ध के दरमियान मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक का मुद्दा भी आ गया है.

भारत के राज्यों में हो रहे चुनाव के दौर में ही इस्लाम को लेकर एक व्यापक अध्ययन और दो पुस्तकों की चर्चा आजकल दुनिया में छायी हुई है. इन पुस्तकों के आधार पर हकीकत और फ़साना समझ लेना भी जरुरी है क्योंकि यहाँ तो सवाल भारत, भारतीयता और वोटबैंक का है.

धर्मांधता किसी की भी हो, हिंदू, सिक्ख, मुसलमान या ईसाई, मानवता के लिए खतरा होती है. गत 2-3 दशकों से इस्लाम धर्म के मानने वालों की हिंसक गतिविधियां पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं.

2005 में समाजशास्त्री डॉ पीटर हैमण्ड ने गहरे शोध के बाद इस्लाम धर्म के मानने वालों की दुनिया भर में प्रवृत्ति पर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘स्लेवरी, टेररिज्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट’.

इसके साथ ही ‘द हज’ के लेखक लियोन यूरिस ने भी इस विषय पर अपनी पुस्तक में विस्तार से प्रकाश डाला है. जो तथ्य निकलकर आए हैं, वह न सिर्फ चैंकाने वाले हैं, बल्कि चिंताजनक हैं.

ये ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें बिना धर्मांधता के चश्मे के हर किसी को देखना और समझना चाहिए! चाहे वो मुसलमान ही क्यों न हों.

अब फर्ज उन मुसलमानों का बनता है, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं, वे संगठित होकर आगे आएं और इस्लाम धर्म के साथ जुड़ने वाले इस विश्लेषणों से पैगंबर के मानने वालों को मुक्त कराएं, अन्यथा न तो इस्लाम के मानने वालों का भला होगा और न ही बाकी दुनिया का.

जहां तक भारत का सवाल है, तो यह सोचने और विचार करने का सटीक समय है कि उनके लिए भारतीयता कितनी अहमियत रखती है. वे वास्तव में भारतीय रहना चाहते हैं या केवल कुछ राजनीतिक पार्टियों के लिए वोटबैंक बनकर.

भारत के खिलाफ साज़िश और विध्वंस में लगे मोस्टवांटेड आतंकवादी –

1. हाफिज मोहम्मद सईद, 2. साजिद माजिद, 3. सैयद हाशिम अब्दुर्रहमान पाशा, 4. मेजर इकबाल, 5. इलियास कश्मीरी, 6. राशिद अब्दुल्लाह, 7. मेजर समीर अली, 8. दाऊद इब्राहिम, 9. मेमन इब्राहिम, 10. छोटा शकील, 11. मेमन अब्दुल रज्जाक, 12. अनीस इब्राहिम, 13. अनवर अहमद हाजी जमाल, 14. मोहम्मद दोसा, 15. जावेद चिकना, 16. सलीम अब्दुल गाजा, 17. रियाज खत्री, 18. मुनाफा हलरी, 19. मोहम्मद सलीम मुजाहिद, 20. खान बशीर अहमद, 21. याकूब येदा खान, 22. मोहम्मद मेमन, 23. इरफान चौगले, 24. फिरोज राशिद खान, 25. अली मूसा, 26. सगीर अली शेख, 27. आफताब बटकी, 28. मौलाना मोहम्मद मसूद अजहर, 29. सलाउद्दीन, 30. आजम चीमा, 31. सैयद जबीउद्दीन जबी, 32. इब्राहिम अतहर, 33. अजहर युसुफ, 34. जहूर इब्राहिम मिस्त्री, 35. अख्तर सईद, 36. मोहम्मद शकीर, 37. रऊफ अब्दुल, 38. अमानुल्ला खान, 39. सूफियान मुफ्ती, 40. नाछन अकमल, 41. पठान याकूब खान, 42. कैम बशीर, 43. आयेश अहमद, 44. अल खालिद हुसैन, 45. इमरान तौकीब रजा, 46. शब्बीर तारिक हुसैन, 47. अबू हमजा, 48. जकी उर रहमान लखवी, 49. अमीर रजा खान, 50. मोहम्मद मोहसिन.

यहाँ यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि अज़मल कसाब और अफ़ज़ल गुरु को फांसी दी जा चुकी है.

कुरान के अनुसार दो भागों में बँटा हुआ है विश्व

जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी कहते हैं कि कुरान के अनुसार विश्व दो भागों में बँटा हुआ है, एक वह जो अल्लाह की तरफ़ हैं और दूसरा वे जो शैतान की तरफ़ हैं.

देशों की सीमाओं को देखने का इस्लामिक नज़रिया कहता है कि विश्व में कुल मिला कर सिर्फ़ दो खेमे हैं, पहला दार-उल-इस्लाम (यानी मुस्लिमों द्वारा शासित) और दार-उल-हर्ब (यानी “नास्तिकों” द्वारा शासित).

उनकी निगाह में नास्तिक का अर्थ है जो अल्लाह को नहीं मानता, क्योंकि विश्व के किसी भी धर्म के भगवानों को वे मान्यता ही नहीं देते हैं.

इस्लाम को लेकर बहुत से अध्ययन हो चुके हैं और अभी भी हो रहे हैं. हाल के दिनों में डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक ‘स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट’ तथा लियोन यूरिस की ‘द हज’ सर्वाधिक चर्चा में रही हैं, जिनके आंकड़ो को लेकर आजकल काफी बहस छिड़ी है.

इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही नहीं, समूची व्यवस्था है

उपलब्ध तथ्य और साहित्य के अनुसार इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही भर नहीं है, असल में इस्लाम एक पूजा-पद्धति तो है ही, लेकिन उससे भी बढ़कर यह एक समूची “व्यवस्था” के रूप में मौजूद रहता है.

इस्लाम की कई शाखायें जैसे धार्मिक, न्यायिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सैनिक होती हैं. इन सभी शाखाओं में सबसे ऊपर, सबसे प्रमुख और सभी के लिये बन्धनकारी होती है धार्मिक शाखा, जिसकी सलाह या निर्देश (बल्कि आदेश) सभी धर्मावलम्बियों को मानना बाध्यकारी होता है.

इस्लामीकरण की प्रक्रिया

किसी भी देश, प्रदेश या क्षेत्र के “इस्लामीकरण” करने की एक प्रक्रिया है. जब भी किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या एक विशेष अनुपात से ज्यादा हो जाती है तब वहाँ इस्लामिक आंदोलन शुरु होते हैं.

शुरुआत में उस देश विशेष की राजनैतिक व्यवस्था सहिष्णु और बहु-संस्कृतिवादी बनकर मुसलमानों को अपना धर्म मानने, प्रचार करने की इजाजत दे देती है, उसके बाद इस्लाम की “अन्य शाखायें” उस व्यवस्था में अपनी टाँग अड़ाने लगती हैं. इसे समझने के लिये हम कई देशों का उदाहरण देखेंगे, आईये देखते हैं कि यह सारा “खेल” कैसे होता है

जब तक किसी देश/ प्रदेश/ क्षेत्र में मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे –

अमेरिका – मुस्लिम 0.6%, ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%, कनाडा – मुस्लिम 1.9%, चीन – मुस्लिम 1.8%, इटली – मुस्लिम 1.5%, नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%

जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –

डेनमार्क – मुस्लिम 2%, जर्मनी – मुस्लिम 3.7%, ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%, स्पेन – मुस्लिम 4%, थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%

मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं.

उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं. इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी.

उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया. दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं –

फ़्रांस – मुस्लिम 8%, फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%, स्वीडन – मुस्लिम 5.5%, स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%, नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8%, त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%

इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले).

जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/ प्रदेश/ राज्य/ क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं,.

चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –

गुयाना – मुस्लिम 10%, भारत – मुस्लिम 15%, इसराइल – मुस्लिम 16%, केन्या – मुस्लिम 11%, रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)

जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे- इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%.

जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –

बोस्निया – मुस्लिम 40%, चाड – मुस्लिम 54.2%, लेबनान – मुस्लिम 59%

जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –

अल्बानिया – मुस्लिम 70%, मलेशिया – मुस्लिम 62%, कतर – मुस्लिम 78%, सूडान – मुस्लिम 75%

जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/ शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/ हथियार अपना कर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –

बांग्लादेश – मुस्लिम 83%, मिस्त्र – मुस्लिम 90%, गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98%, ईरान – मुस्लिम 98%, ईराक – मुस्लिम 97%, जोर्डन – मुस्लिम 93%, मोरक्को – मुस्लिम 98%, पाकिस्तान – मुस्लिम 97%, सीरिया – मुस्लिम 90%, संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%

बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –

अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%, सऊदी अरब – मुस्लिम 100%, सोमालिया – मुस्लिम 100%, यमन – मुस्लिम 100%

इन पुस्तको में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि दुर्भाग्य से 100% मुस्लिम जनसंख्या होने के बावजूद भी उन देशों में तथाकथित “शांति” नहीं हो पाती.

जिन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 8 से 10 प्रतिशत हो चुकी होती है, उन देशों में यह तबका अपने खास “मोहल्लो” में रहना शुरु कर देता है, एक “ग्रुप” बनाकर विशेष कालोनियाँ या क्षेत्र बना लिये जाते हैं, उन क्षेत्रों में अघोषित रूप से “शरीयत कानून” लागू कर दिये जाते हैं.

उस देश की पुलिस या कानून-व्यवस्था उन क्षेत्रों में काम नहीं कर पाती, यहाँ तक कि देश का न्यायालयीन कानून और सामान्य सरकारी स्कूल भी उन खास इलाकों में नहीं चल पाते.

ऐसा भारत के कई जिलों के कई क्षेत्रों में खुलेआम देखा जा सकता है, कई प्रशासनिक अधिकारी भी दबी जुबान से इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन कथित सेक्युलर राजनीतिज्ञों और विद्वानों को इसमें कुछ भी खराब नहीं दिखता.

शताब्दी के अंत तक आधी दुनिया होगी मुसलमान

आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)…

भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 40 से 50% तक पहुँच चुका है. अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी , आसानी से सोच-समझ सकता है.

(सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक ‘स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट’ तथा लियोन यूरिस – ‘द हज’, से साभार)

Slavery, Terrorism & Islam: The Historical Roots and Contemporary Threat
प्रथम प्रकाशन: 1 जनवरी 2005
लेखक: Peter Hammond

The Haj
प्रथम प्रकाशन: 1984
लेखक: Leon Uris

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY