आंखें हों तो ही देखोगे, बुद्धि हो तो ही समझोगे!

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बहुत धुंधला सा कुछ याद है. जब मैं छोटा था शायद 1988 से 1993 के बीच की बात होगी, दूरदर्शन पर एक सीरियल आता था. जिसमें दो पायलट किसी विमान दुर्घटना से बच कर एक ऐसी जगह पर पहुंच जाते हैं जहां पर सभी लोग अंधे होते हैं.

वह एक विचित्र सा गांव होता है यहां पर सारे लोग अंधे होते हैं किसी को भी दृष्टि नहीं होती. जब दोनों पायलट को होश आता है तो वे पाते हैं कि उन्हें बचा कर लाने वाले सभी लोग अंधों की ही तरह व्यवहार करते हैं.

बहुत ही जल्दी दोनों युवकों को पता चल जाता है कि यहां तो सब अंधे है. अब वे उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं कि भाई आप लोग अंधे हो और हम लोग देख सकते हैं. हमारे पास दृष्टि है जिसके चलते हम वस्तुओ के रंग देख सकते है, उनका नाप देख सकते है अर्थात यह भी एक ज्ञानेंद्रिय जो एक प्रकार के अलग ज्ञान का बोध हमारी आत्मा को करवाती है.

लेकिन वे गांव वाले उनका भरोसा नहीं करते. गांव वाले कहते हैं कि दुर्घटना की वजह से आप लोगों का दिमागी संतुलन बिगड़ गया है. वस्तुतः दृष्टि जैसी कोई चीज नहीं होती.

वे दोनों उन्हें फिर समझाते हैं कि भाई यह दुनिया बहुत खूबसूरत है, पेड़ों का रंग हरा है, हमारी त्वचा का रंग भूरा है, ये पेड़ बड़ा है और ये छोटा. लेकिन वे लोग नहीं मानते उल्टा उन्हें समझाते है कि वे दोनों गलत है और इसलिए उन्हें उपचार की आवश्यकता है.

उन्हें पहरे में रखा जाता है. पूरे गांव के चारों तरफ नाकाबंदी होती है और अंधे वहां चौकीदारी पर होते हैं. आश्चर्यजनक रूप से वे अपनी दुनिया में काफी अनुकूलन प्राप्त कर चुके होते हैं.

बहुत समय तक वह दोनों उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं लेकिन उल्टे वह लोग उन्हें समझाने लग जाते हैं कि भाई तुम लोग गलत सोच रहे हो.

वह दोनों घबरा कर बार-बार भागने का प्रयास करते हैं और पकड़े जाते हैं. अब चूंकि बहुत पुरानी सी बात है मुझे बस इतना याद है कि शायद एक बार में भागने में सफल हो जाते हैं और अपनी दुनिया में पहुंच जाते हैं.

वह जो तड़प है अंधों की दुनिया से निकल कर अपनी दुनिया में जाने की, उसे मैंने बहुत करीब से महसूस किया है. वह मेरी बचपन की यादों से जुड़ी है.

तो भाई आखिर आज मैं यह कथा क्यों सुना रहा हूं?

आज एक कुबुद्धिजीवी ने महाराणा प्रताप पर ऐतिहासिक मज़ाक किया. वह कहता है कि महाराणा बाहुबली, महावीर नहीं थे और विजेता भी नहीं थे. उसके शब्दों में – “हल्दी घाटी के युद्ध के बाद फरारी काटते रहे जीवन भर.”

अगर वीर और विजेता होते तो भागते क्यों फिरते जंगलजंगल?

उन्होंने कब मुगलों को हराया?

उनका क्या उखाड़ लिया?

हराया होता तो अकबर कैसे होता? मुग़ल सल्तनत कैसे काबिज रही?

और वह हमें समझाने लगे कि आपने गलत इतिहास पढ़ा है या आप कही-सुनी बातों पर यकीन करते हैं. चारण-भाटों और किवदंतियों पर विश्वास करते हो.

मैंने भी कई तर्क रखे. मैंने कहा कि यदि जंगल-जंगल सैन्य संग़ठन के लिए भटकने की वजह से वे भगोड़े थे तो क्या चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल अशफाक उल्ला खान ये सब भी भगोड़े थे?

मैंने उन्हें समझाया कि जिस लक्ष्य को लेकर अकबर के आदेश पर मान सिंह अपनी सेना लेकर महाराणा प्रताप को पकड़ने अथवा झुकाने आया था, वह बिल्कुल पूरा नहीं हुआ. उल्टा उसे जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा तो नैतिक रुप से अकबर की हार ही तो हुई.

8000 राजपूतों ने 48,000 मुगलों को मार गिराया तो क्या इसे अकबर की जीत कहा जाए?

छापामारी भी कायरता है तो शिवाजी ने भी यही किया, तो ठीक है हिम्मत हैं तो मुंबई जाकर बीच चौराहे पर खड़े हो जाइए और कहिए लोगों से कि शिवाजी भी कायर थे?

फिर वही ढाक के तीन पात. अंधों वाली कहानी. मैं भी उन जन्मांधों को दृष्टि का अस्तित्व समझा रहा था. कुल मिलाकर हमारी और उनकी हालत उसी सीरियल जैसी है.

मुझे तो लगता है कि वे आज भी वैसे ही अंधों की दुनिया में पूरी झूठी शान से जी रहे है और हम जैसे दृष्टिवान उनके बीच में फंसे अपनी आँखों वाली दुनिया में जाने के लिए तड़प रहे हैं लेकिन उनकी नाकाबंदी बड़ी खतरनाक है और उनका आपसी विश्वास अंधा होने को लेकर बहुत ही दृढ़ वैज्ञानिक है.

कम से कम मेवाड़ के बारे में तो मेरा ज्ञान आप (वामियो द्वारा अंधे किये गए) लोगों से अधिक है. मैं वहीं पला-बढ़ा हूं.

मैंने यहां प्रताप की विजय को एक-एक शख्स में देखा है, यहां के अवशेषों में देखा है, लोकगीतों, नृत्यों, संवादों में देखा है, गांवों में देखा है, सुना है लेकिन वे मानने को तैयार नहीं.

खैर इस बार मेरे क्रोध से चिढ़कर उन्होंने मुझे मेरी अपनी आँखों वाली दुनिया में वापस फेंक दिया. ब्लॉक मार दिया. काफी सुकून मिला अपनी आंखों वाली दुनिया में आकर.

आश्चर्य और शर्म भी आती है कि कैसे आप अपने उन पुरखों को गाली देते हो जो वास्तविक असहिष्णुता, दमन और क्रूरता के ऐतिहासिक काल में आप लोगों को भविष्य के रूप में बचाने के लिए जीवन भर लड़ते रहे, जंगलों की खाक छानते रहे, घास की रोटियां खाते रहे.

धिक्कार है कि आज आप उन्हें गालियां दे रहे हैं. उनके ऐतिहासिक अद्वितीय स्वामिभक्त घोड़े तक का उपहास बना रहे हो.

धिक्कार है ऐसे लोगों के अभिभावकों को जिन्होंने जीवन के कुछ अन्य महत्वपूर्ण कामों के चलते अपने बच्चों को संस्कार रुपी सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय के लिए मिशनरियों के भरोसे छोड़ दिया, जहां वामपंथी इतिहासकारों ने उन्हें आँखे होते हुए भी अंधा बना दिया.

धिक्कार है आपके भारतीय होने पर! धिक्कार है! धिक्कार है!!

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