दूसरा संवाद : छू के जइयो हमारी बगीची, मैं पीपल के आड़े मिलूंगी

0
23
ma jivan shaifaly samvad 2 making india

दो साल पहले एक मित्र से फेसबुक के इनबॉक्स में संवाद हो रहा था.. मैंने एक ऐसी तस्वीर अपनी वाल पर शेयर की थी जिसमें एक बच्चे के पैर को एक कुत्ते ने बुरी तरह से नोंच कर घायल कर दिया था, और एक अन्य समाज सेवक मित्र उसकी मदद के लिए फेसबुक पर गुहार लगा रहा था…

वो- कभी कभी आप अजीब से काम नहीं करती? आपको वो तस्वीर नहीं शेयर करनी चाहिए थी जिसमें कुत्ते ने बच्चे को काटा.. आपको लगता है उस तस्वीर को कोई देखना चाहेगा? केवल घटनाक्रम का वर्णन शेयर करती तो ठीक था.. चलिए आपकी फेसबुक वाल आपका मन…

मैं- हाउ…

वो- जी सच कह रहा हूँ ।। हम रोज हत्याएं, रोज लाशें रोज जीवन के वीभत्स चेहरे को देखते हैं, लेकिन एक सेल्फ मेड गाइड लाइन है ऐसे दृश्यों को या तो छापते नहीं या ब्लर कर देते हैं..

मैं- वीभत्स जीवन को देखकर ही करुणा उपजती है..

वो- आप पूरी तरह से गलत हैं…

मैं- क्यों नहीं? दिखा सकते क्रूरता कर सकते हैं तो क्रूरता देखने में ये हिचक क्यों?

वो- वीभत्सता से करूणा उपजती तो दुनिया में मांसाहार बंद हो गया होता..

मैं- मांसाहार और विभत्सता दो अलग वस्तु है… बाद में बताती हूँ… मैंने मांसाहार क्यों छोड़ा था…. अभी कहीं जाना है..

वो- अब छोड़िये, ये मत बताइयेगा… यह ज़रूर बताइयेगा आपने क्या क्या छोड़ा…
……………………………………………………………………………….

फिर एक गहरी खामोशी कई दिन तक पसरी रही……….. क्योंकि मैं सच में हिसाब नहीं लगा पा रही थी कि मैंने क्या क्या छोड़ा …
सोचा था आज वो किस्सा लिखूँगी कि बचपन से ऊँगलियाँ चाट चाट कर मटन, कबाब, क्रेब और prawns तक खाने वाली मैं एक दिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि जीवन में कभी दोबारा इन सब चीज़ों की तरफ हाथ नहीं बढ़ा सकी …

लिखने बैठी ही थी कि न जाने क्यों अचानक मेरे कमरे की लाइट एक पल को झपकी … मेरे लिए ये हमेशा से एक संकेत रहता है जब बिना किसी कारण के मेरे कमरे की लाइट पल भर के लिए झपकती है तो कोई मुझे ये सन्देश देने की कोशिश करता है कि कुछ ऐसा घटित हुआ है जिस पर मुझे ध्यान देने की आवश्यकता है…

मैं पल भर को रुकी और अचानक मैं अपने सबसे छोटे भाई के प्रोफाइल पर चली गयी जिसका 19 जनवरी को जन्मदिन गया… फेसबुक पर मित्र होने के बावजूद कभी हम दोनों के बीच संवाद नहीं होता था….
उनकी नाराज़गी सर आँखों पर …. उनके जन्मदिन पर उनकी वाल पर दो पंक्ति लिखकर आई थी….
कि मैं तो हर जन्म में आप ही को अपना भाई चाहूंगी आप मुझ जैसी बहन चाहते हैं या नहीं ये फैसला मैं आप पर छोड़ती हूँ… .
और फिर जब दोबारा उनकी वाल से होकर आई तो पता चला… उन्होंने मुझे अनफ्रेंड कर दिया है…

पहले तो मैं मुस्कुराई लेकिन मुस्कुराने पर आँखों से आंसू तो नहीं आ जाते ना…
मैं उनके इनबॉक्स में सिर्फ इतना लिख पाई – भैया मुझे जवाब मिल गया…. God bless you…

*********************************************
हाँ तो मित्र तुम कहते हो- “हम रोज हत्याएं, रोज लाशें रोज जीवन के वीभत्स चेहरे को देखते हैं, लेकिन एक सेल्फ मेड गाइड लाइन है ऐसे दृश्यों को या तो छापते नहीं या ब्लर कर देते हैं”.

देखो, मैं आज भी ब्लर नहीं कर सकी जीवन के इस वीभत्स चेहरे को…..
सबकुछ दिख रहा है दुनिया को… देखो ये है मेरा असली चेहरा….
तुम पूछते हो मैंने क्या क्या छोड़ा …. हां मैंने सबकुछ छोड़ दिया है… मैं खाली हो गयी हूँ …

ताकि मेरे अन्दर खालीपन न भर जाए….

समय की विपरित धारा में जैसे कृष्ण ने पूरा पर्वत अपनी एक उँगली पर उठा रखा था, मुझे लगता है मैंने भी अपनी दुनिया को उसी तरह एक उँगली पर उठा रखा है. जो आस्था और विश्वास का चौगा पहने उसके नीचे आता गया, मैं उसे अपने आँचल में छुपाती गई.

मैंने उसे पूरे शिद्दत से थामे रखा है, जिसे अपने अंदर के अंतरिक्ष का एक तारा भी मेरे आँसू से मिलता जुलता लगता है, जिसे अपने अंदर के समन्दर का एक मोती भी मेरी मुस्कुराहट-सा लगता है वो चला आता है, देखता है, परखता है और मेरी दुनिया में अपनी जगह ढूँढता है.

जिसे मेरी ताकत पर शक होता है वो वहाँ से लौट जाता है, अपने पैरों के निशान मेरी आँखों में छोड़कर. जब भी उन लोगों को देखती हूँ, आँखें चमक उठती है. उनको पुकारती नहीं, क्योंकि उनका डर उनकी आँखों में साफ दिखाई देता है. क्योंकि उन्हें कोई एक जगह नहीं मिल पाई, उन्हें मेरी पूरी दुनिया में विचरना पड़ा, कोई भटकन कहकर लौट गया, कोई निर्वात कहकर. किसी को लगा शायद मैं अपनी दुनिया को बहुत दिनों तक थामे नहीं रख सकूँगी और वे सब उसके नीचे दबकर मिट्टी हो जाएँगे.

कुछ आए जिन्होंने ऊपर भी देखा और मेरे विश्वास की तरफ अपना हाथ बढ़ाकर मेरी दुनिया को उसी शिद्दत से थाम लिया, जिस शिद्दत और विश्वास से मैंने थाम रखा था. ऊपर की ओर हाथ बढ़ते गए और मेरी दुनिया सुरक्षित होती गई. क्योंकि जिनके हाथ ऊपर उठे, उनके पैर इश्क की ज़मीन पर किसी पेड़ की जड़ों की तरह अपना अस्तित्व फैलाते गए….

फिर जीवन से यही सबक मिला कि आप मिट्टी रह गए या बन गए सोना, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आपने उन पलों को कैसे जिया है, जो आपके अनुकूल नहीं थे..

– माँ जीवन शैफाली

पहला संवाद : कभी कभी और हमेशा के बीच

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY