हिन्दुत्व में प्रकृतिवाद

0
15

यह है मेरी अगली पुस्तक का शीर्षक, जो उपन्यास ‘तीसरी पारी’ के बाद लिखना प्रारम्भ करूँगा. अधेड़ उम्र के एक जोड़े की रोमांटिक कहानी पर आधारित इस नॉवेल को इस वक्त अंतिम रूप दे रहा हूँ और जल्द ही पूरा होने वाला है.

हुआ यूं कि वामपंथ, जिसे मैं एक कट्टर धर्म ही मानता हूँ, पर एक चर्चा चल रही थी जिसे मैं एक मूक दर्शक के रूप में सुन रहा था. वहाँ जनवादी और प्रगतिशील जैसे शब्द हर बार की तरह ही खूब लिए जा रहे थे.

मुझे यह ठीक उसी तरह लगता है जैसे कि हर दूसरा धर्म अपने को शांति का धर्म कहते नहीं थकता, जबकि धर्म के नाम पर ही अब तक सबसे ज्यादा हत्यायें, बम-गोले और आदमी का गला काट कर होती रही हैं.

बहरहाल, दुनिया के सभी धर्म को ध्यान से देखे तो ये सब व्यक्तिवादी हैं, एक तरह का राजतंत्र! जहां उस धर्म-राजा, जिसे ईश्वर मान लिया जाता है, ने जो बोल दिया वो अंतिम और ब्रह्मवाक्य हो गया, यहां तक कि उस इष्ट की मृत्यु के सैकड़ों साल बाद भी!

एकमात्र हिन्दू धर्म ही है जहां कोई व्यक्तिवाद नहीं. राम हैं तो कृष्ण भी हैं, वीर हनुमान हैं तो दुर्गा माँ भी हैं.

ऐसे अनेक इष्ट हैं, हरेक भक्त के अलग-अलग, अर्थात पूरा प्रजातंत्र है. जिसे जिस पर आस्था हो उसी की पूजा कर सकता है.

मगर ये सब भी समय के साथ जुड़ते चले गए, कोई त्रेता में आये तो किसी ने द्वापर युग में जन्म लिया. सब अवतार माने गए. वर्ना सतयुग में तो सूरज चाँद अग्नि वायु जल और पृथ्वी आकाश की पूजा ही होती थी. वेद इनका ही गुणगान करते थे.

जो भी प्रकृति में हैं हमारे लिए सब पूजनीय हैं. कण-कण में भगवान, हर जीव-जन्तु में ईश्वर का रूप, आत्मा में ही परमात्मा, आदि आदि.

हमने तो अपनी इन्द्रियों को भी इंद्र बना कर पूजा. प्रकृति की परिवर्तनशीलता को भी पहचाना और उसे काल अर्थात समय नाम देकर पूजा!

महाकाल और कोई नहीं, बल्कि शिव ही हैं, जिसे हम सर्वशक्तिमान मानते हैं। और यह सच भी है समय ही बलशाली है.

जन्म से लेकर मृत्यु तक हर पल, हर सांस से जुड़ा हरेक का जीवन सिर्फ और सिर्फ प्रकृति से है, यहाँ तक कि पुनर्जन्म की बात कह कर ऊर्जा के रूप बदलने के नियम को सदियों पहले स्थापित कर दिया.

इस आदि संस्कृति ने प्रकृति की सत्ता को समझा इसलिए इस आदि सभ्यता ने जीवन के हर उत्सव को प्रकृति से जोड़ा. प्रकृति की व्यवस्था को ही सर्वोपरि माना.

सारा ज्ञान प्रकृति से ही लिया. हमारा दर्शन से लेकर रहस्य वाद, सब प्रकृति से प्रारम्भ हो कर वही समाप्त भी हो जाते हैं.

संक्षिप्त में कहें तो हमारा जीवन ही प्रकृति है और प्रकृति ही जीवन. कल्पना कीजिये, प्रकृति के बाहर जा कर अपना अस्तित्व ढूँढिये असम्भव है!

सीधे-सीधे कहें तो इस प्रकृति की महत्ता को अगर किसी ने आत्मसात किया तो वो है हिन्दू जीवनशैली. अंत में अगर यह कहूँ कि हमें हिन्दू कहना ही बेईमानी है! सच कहूँ तो हिन्दुत्व को प्रकृतिवादी नाम दे दिया जाए तो गलत नही होगा!

….बाकी विस्तार से पुस्तक में

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY