स्वयं की ज्योति को अखंड रखकर ही एक दीपक प्रज्जवलित कर सकता है दूसरे दीपक को

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एक शिक्षक वास्तव में कभी भी नहीं पढ़ा सकता यदि वह स्वयं आज न पढ़ रहा हो, एक दीपक दूसरे दीपक को कभी भी प्रज्जवलित नहीं कर सकता यदि वह स्वयं अपनी ज्योति को जलती हुई न रखें- रविंद्रनाथ ठाकुर.

शिक्षण एक प्रक्रिया है जो आवश्यक नहीं कि कक्षा में ही घटित हो. यह तो कहीं भी घटित हो सकती है यदि शिक्षा के तीन आवश्यक पक्ष उपस्थित हो- पहला सीखने वाला, दूसरा सिखाने वाला और तीसरा जो सिखाया जा रहा है.

कभी भी किसी भी दशा में जब भी शिक्षण किया जाता है तो उसके पीछे कोई  न कोई उद्देश्य अवश्य होता है. फिर चाहे वह ज्ञानात्मक हो, भावनात्मक हो, क्रियात्मक हो, शारीरिक, सामाजिक या सांस्कृतिक हो.

हम समाचार पत्रों में, पत्र पत्रिकाओं में बच्चों में पढाई के प्रति रूचि, उनके बौद्धिक एवं चारित्रिक विकास के बारे में निरंतर लेख पढ़ते रहते हैं. शिक्षा के विभिन्न आयामों एवं उन्नत शिक्षा के विकास के बारे में भी बहुत कुछ पढ़ते रहते हैं. अर्थात शिक्षा के तीन आवश्यक पक्षों में से हम छात्र एवं शिक्षा सामग्री पर ही ध्यान देते हैं, परन्तु यदि त्रिभुज की दो भुजाएं बढ़ती जाए और तीसरी भुजा न बढ़े तो समबाहु त्रिभुज के आकार को बनाए रखना बहुत कठिन हो जाएगा. इसलिए बढ़ते समय के साथ सिर्फ छात्र एवं शिक्षण ही नहीं बल्कि शिक्षक को भी अपने बहुआयामी विकास के बारे में सोचना प्रारम्भ कर देना चाहिए.

आजकल के बच्चों के बढ़ते बौद्धिक स्तर के साथ यदि शिक्षक भी अपने बौद्धिक स्तर को बढ़ाने के लिए प्रयत्न करें तो शिक्षा नए आयामों को स्पर्श कर सकती हैं. जैसे-

1. शिक्षण के प्रस्तुतीकरण में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है सशक्त भाषा. इसलिए शिक्षकों को अपनी भाषा और प्रस्तुतीकरण पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जिसके माध्यम से वह तार्किक तारतम्यता से विषयवस्तु को, तथ्यों, प्रत्ययों एवं सिद्धांतों को संतुलित ढंग से प्रस्तुत कर सकें.

2. हम बच्चे की तुलना मिट्टी से तथा शिक्षक की तुलना कम्हार से करते आये हैं. जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी को चाक पर रखकर जैसा चाहे वैसा बर्तन बना सकता है, वैसे ही शिक्षक भी बच्चों को जैसा चाहे वैसा बना सकते हैं, परन्तु वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि बात ऐसी नहीं है.

हर बच्चे में विशेष शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक गुण होते हैं. बच्चे की अपनी रुचियाँ, इच्छाएं, मनोवृत्तियाँ, निर्णय क्षमता, विचार एवं आदतें होती हैं. इसलिए शिक्षक की शिक्षा पद्धति एवं छात्र के साथ तारतम्य कुछ यूं होना चाहिए कि विद्यार्थी का शरीर, मन तथा आत्मा का सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वांगीण विकास हो सके.

अरस्तु के अनुसार – “शिक्षा व्यक्ति की शक्ति का और विशेष रूप से मानसिक शक्ति का विकास करती है, जिससे वह परम सत्य, शिव और सुन्दर के चिन्तन का लाभ उठाने में सक्षम हो सके. ”

3. वातावरण बालक के विकास की दिशा निश्चित करता है. इस प्रकार की जानकारी रखने वाले शिक्षक विद्यालय में समुचित वातावरण का निर्माण कर उन्हें विकास की दिशा में अग्रसर करने में सक्षम होते हैं.

4. किशोरवय विद्यार्थियों में विभिन्न विषयों के बारे में जानने की जिज्ञासा अधिक होती है. इसके अतिरिक्त उनके दैनंदिन जीवन में भी कुछ न कुछ समस्याएँ होती हैं, चाहे पारिवारिक हो, मित्रों की ही या सामाजिक स्तर पर हो. अध्यापकों को ध्यान रखना चाहिए कि यदि उदाहरणार्थ प्रस्तुत समस्याएं बालकों की निजी आवश्यकताओं, उद्देश्यों, रुचियों और जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए वे गलत मार्गों पर जाने से भी बच सकें.

5. अध्यापकों को अपने छात्रों में सृजनात्मक कार्यों से सम्बंधित नवीनतम सूचनाओं को संकलित करने की प्रवृत्ति विकसित करनी चाहिए. बालकों में सृजनात्मकता का विकास करने के लिए यह आवश्यक है कि उनके अध्यापक भी सृजनात्मक प्रवृत्ति के हों.

6. शिक्षा द्वारा किये गए अर्थ, व्याख्या आदि सरल, सीधे और सुस्पष्ट हो और उसे सुविधाजनक सभी उपकरण, चार्ट, चित्र उदाहरण, दृष्टांत एवम दृश्य-श्रव्य सामग्री का उपयोग करना चाहिए. अर्थात बालक को सीखने में अधिकतम इन्द्रियों का प्रयोग करना पड़े, जो उन्हें जीवंत और विकासोन्मुख बनाने में सहायता करें.

7. सभी बालकों को यह अनुभव होना चाहिए कि अध्यापक उनसे प्यार करते हैं. उनमें रूचि रखते हैं. कमज़ोर बालक अपनी कमजोरी के कारण सामान्यत: अध्यापक से तिरस्कार और अपमान ही पाते हैं. अध्यापकों को चाहिए कि वे उन्हें उच्च बुद्धि वाले छात्रों के साथ सहकारी, सामूहिक गतिविधियों में भाग लेने को प्रोत्साहित करें, ताकि उनके सानिध्य एवं संपर्क से उन्हें क्षतिपूर्ति एवं त्रुटिपूरक उपलब्धि एवं संतोष प्राप्त हो.

ऐसे बालकों की समय समय पर प्रशंसा करें, उन्हें सफल होने के अवसर प्रदान करें. इससे उनमें आगे और अधिक सफलता प्राप्त करने की दिशा में आकर्षण एवं उत्साह बढेगा.

8. शिक्षा-संस्थाओं में शिक्षक तथा छात्रों की संख्या में असंगत अनुपात होने के कारण कई व्यक्तिगत निर्देशन असंभव-सा हो जाता है. सामान्यत: एक अध्यापक पर 50 से भी अधिक छात्र आते हैं. इसलिए शिक्षण संस्थाओं में अध्यापक-छात्र अनुपात को कम करने की आवश्यकत पर भी जोर दिया जाना चाहिए.

शिक्षा के द्वारा वर्तमान पीढ़ी अपनी संतति के सर्वांगीण, समरस, स्वाभाविक तथा अधिकतम विकास को सुनिश्चित करती है. इसलिए शिक्षा के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के प्रयासों में रत व्यक्तियों का शिक्षा के शास्त्र से परिचित होना नितांत आवश्यक है. परन्तु इसके लिए अध्यापक को यह स्वीकार करना होगा कि वे ऐसे दीपक की भांति हैं जिसे सदा प्रज्ज्वलित रहे के लिए ज्ञान रूपी तेल की निरंतर आवश्यकता है.

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