पहला संवाद : कभी कभी और हमेशा के बीच

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कभी कभी : कैसी हैं आप?

हमेशा : जी सुखी…

कभी कभी : मतलब अंतिम उद्देश्य सुखी होना ही है

हमेशा : पहला उद्देश्य…

कभी कभी : अदभुत उद्देश्य है..सारे प्रयोजन इसी उद्देश्य से किये जाने चाहिए?

हमेशा : हां थोड़ा सा ट्विस्ट है इसमें लेकिन…

कभी कभी  : क्या?

हमेशा : आपको पता होना चाहिए कि दुःख जैसी कोई चीज़ नहीं होती … जो दुःख दिखाई दे रहा है वो भी सुख की ओर ले जाने वाली राह है…

कभी कभी : मेरी दृष्टि अलग है. दुःख खुद को जानने परखने और आत्मबोध का सबसे सुगम रास्ता रहता है. कभी कभी उसकी तलाश भी कर लेनी चाहिए, तमाम दर्शनशास्त्री ठहाके लगाना सिखाते हैं कोई फुट फूट कर रोना नहीं सिखाता, सिखाना चाहिए.

हमेशा : क्योंकि रोना सिखाना नहीं पड़ता सही रुदन वही है जो स्वस्फुरित हो.. बाकी सुखी होने के लिए इंसान जीवन भर नकली सीन और सेट रचता रहता है

कभी कभी  : मुस्कान भी तो स्वस्फुरित होनी चाहिए, कुछ जनजातियों में रुदन का टैबू गायन से जुड़ा हुआ है। मैं मिला हूँ उनसे…

हमेशा : इसीलिए तो वो टैबू है…
मुस्कान स्वस्फुरित कैसे होगी वो तो सिर्फ है… हमेशा से है… कहीं उद्गम नहीं कहीं अंत नहीं

कभी कभी : होगी, दरअसल हम भेद खो रहे हैं. आश्चर्यजनक तौर पर हम उन बातों पर हँसते है जिन पर हमें रोना चाहिए, मैंने हत्याओं, बलात्कार पर लोगों को हँसते देखा है..

हमेशा : अब आप अपवाद पर आ गए….

कभी कभी : न अपवाद नहीं एक दिन आप मेरे साथ रह कर फिर दुनिया को देखो.

हमेशा : अब ये तो ख्वाहिश हो गई…

कभी कभी : वाह
न जाने ख्वाहिश अपेक्षाओं से इतनी विरक्ति क्यों
इंसान को खुदा बनने या बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए
जबकि हम सबका हर एक्शन ख्वाहिशों से जुड़ा हुआ है

हमेशा : हाँ सच है…. सुखी होने की ख्वाहिश….

कभी कभी   : सुखी होने की ख्वाहिश तो बड़ी है
सबसे पहले हम खुद के होने की ख्वाहिश को पूरा करते हैं। मैं बात कर रहा हूँ क्योंकि मुझे आपको बताना है कि मैं हूँ

हमेशा : खुद के होने का परम सुख….

कभी कभी   : यहाँ अपेक्षा जुड़ती है जब आपके जवाब की प्रतीक्षा करता हूँ
अपेक्षा से अनुराग, विरक्ति, आवेश, क्रोध, प्रेम जैसे भाव उपजते हैं
भावों के साथ सुख दुःख का चैनल
यह हर बोले अबोले रिश्ते में होता है
अजीबोगरीब है मगर सच, धरती आसमान से आसमान सागर से अपेक्षाएं करता है
शायद अपेक्षाओं से हम खुद का भी मूल्यांकन कर पाते हैं

बहुत भारी भारी बातें हो गई सबेरे….

हमेशा : हाँ लेकिन जी हल्का हो गया…
कभी कभी   : किस बात से
हमेशा : भारी बातों से …..

वो कभी कभी आता है और संवाद के पुल पर खडा हो जाता है, नीचे खामोशी की नदी बह रही होती है…
मैं हमेशा संवाद को वहीं छोड़ नदी किनारे आ जाती हूँ कि कहीं कोई शब्द इतना भारी न हो जाए कि संवाद का पुल टूट जाए….

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