कहानी : ब्यूटी पार्लर

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BEAUTY_PARLOUR story by ma jivan shaifaly making india

जैसे ही मैंने पार्लर का दरवाज़ा खोला, सबकी निगाह एक साथ मेरी तरफ उठी. मुझे लगा जैसे कोई ज़रूरी मीटिंग चल रही थी और मैंने उन लोगों को डिस्टर्ब कर दिया.

थोड़ा सहजता का भाव चेहरे पर लाने की कोशिश कर ही रही थी कि पार्लर वाली आंटी बोल पड़ी, आओ निशा, बस दस मिनट इंतज़ार करना पड़ेगा, तब तक तुम यह मैगज़ीन देखो.

कॉर्नर टेबल पर पड़ी मैगज़ीन उठाकर पास ही लगे सोफे पर मैं बैठ गई. अब बारी मेरी थी, जैसे बोर्ड मीटिंग में बॉस का इंतज़ार हो रहा हो और बॉस  आते ही इशारे से कहे, यस…. प्रोसीड, वैसा ही कुछ भाव मेरे चहरे पर आया. मैंने उन सबकी तरफ एक बार देखा तो वे सब वापस अपनी बातों में लग गईं.

दो हमउम्र औरतें सोफे पर मेरे ही बगल में बैठी थीं उनकी बातें तो मैं सुन पा रही थी लेकिन नज़रें मैगज़ीन में गड़ाए होने के कारण उनके चेहरों पर आ रहे भावों को नहीं देख पा रही थी.

– नहीं यार, अब इस उम्र में दुबला होकर करना भी क्या है? जब दुबली पतली थी तब भी पतिदेव कौन सा आगे पीछे मंडराते ही रहते थे. वो तो शाम को उनके बॉस की पार्टी में जाना है तो कह रहे थे, थोडा थोबड़ा ही ठीक ठाक करवा लो, दोस्तों की बीवियां बड़े घरों से हैं, पढ़ी लिखी हैं तो उन्हें उठने बैठने का सलीका है.

– सुना है मिसेस अग्रवाल भी आने वाली है उस पार्टी में?

– कौन, वो परकटी? जो सब मरदों से हाथ मिलकर हाय हल्लो करती है?

– हाँ, वही.

– पता नहीं आजकल की औरतों को क्या हो गया है, उनको लगने लगा है, मर्दों से हाथ मिलाकर मिलने से उनके बराबरी की हो गई हैं.

– पर सुना है बहुत बड़ी समाज सेविका है?

– घर में झांकने जाओगी तो पता चलेगा, घर को भी ऑफिस बना रखा है. ऐसी औरतें कहीं घर संभाल पाती है?

दोनों की बातें सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुरा दी. लगा, घर में रहने वाली औरतों की दुनिया कितनी सीमित होती है. सिर्फ घर के काम को अपना कर्तव्य समझती है और बाहर काम करने वाली औरतें उनके पैमाने पर बिलकुल फिट नहीं बैठती. सुशील गृहणी की परिभाषा से परे होती हैं, इसलिए थोड़ी सी बदनाम भी होती है.

फैशन मैगज़ीन देखने में मन नहीं लग रहा था तो मैंने एक बार पूरे कमरे में नज़र दौडाई. साइड वाली कुर्सियों पर बैठी तीन औरतें ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी. उनको देखकर लगा चलो कोई तो है जो घर गृहस्थी के भार से मुक्त है और खिलखिलाना जानती है.

तभी उनमें से एक की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी – अरे क्या करोगी जल्दी जाकर, ऑफिस की पार्टीज़ में फीमेल स्टाफ को बुलाना उनकी मजबूरी होती है.

इस पर दूसरी बोल पड़ी – और वैसे भी पति के साथ ऑफिस की पार्टी में जाना यानी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है. घर लौट कर पच्चीसों सवाल – उसने तुमसे हाथ क्यों मिलाया, और किसी से तो नहीं मिलाया? मिस्टर वर्मा से ज़रा दूर ही रहा करो, वो आदमी मुझे ठीक नज़र नहीं आता. वैसे तुम्हारे कलीग्स है तुम जानो मैं तो सिर्फ इसलिए कहता हूँ. क्योंकि इन मर्दों की ज़ात को मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ. मुंह पर कुछ और, दिल में कुछ और ही होता है.

– यह तो ठीक कहती हो यार पिछली बार वाली पार्टी के बाद तो मेरे घर में ऐसा हंगामा हुआ था कि नौकरी छोड़ने तक की नौबत आ गयी थी. वो तो भला हो सासुमाँ का जिन्होंने पतिदेव को समझा दिया कि गाड़ी की किश्ते चुक जाने दो उसके बाद ही बहू का काम बंद करवाना. सोच रही हूँ कि गाड़ी की किश्तें ख़त्म होने से पहले प्लाज़्मा टीवी उठा लूं तो नौकरी बची रहेगी. वरना घर में सास को कौन झेलेगा दिन भर!

– क्यूं घर में तो बड़ी मम्मीजी मम्मीजी कहती फिरती हो, मुझे तो देख देख कर जलन होती है कि वाह क्या आदर्श जोड़ी है सास बहू की.

– अरे भई, पति की नज़रों में अच्छी बीवी, अच्छी बहू और अच्छी माँ बने रहना हो तो यह सब चोंचले करने पड़ते है. तुम भी सीख लो यह सब अगले महीने तुम्हारी भी शादी होने वाली है.

इसके बाद तीनों खिलखिलाकर हंस पड़ीं.

इस बार मेरे चहरे पर मुस्कराहट नहीं थी और उनकी बातों का विश्लेषण करने का मन भी नहीं हुआ. एक अजीब सी घुटन ने पूरे कमरे को घेर लिया था. जब बेचैनी बढ़ने लगी तो मैं उठकर खिड़की के पास जा खड़ी हुई. पार्लर दूसरी मंजिल पर था इसलिए खिड़की से आने वाली हवा थोड़ी ठंडी थी.

मैं अपनी बेचैनी को शब्दों की नाव पर बैठाकर विचारों की नदियाँ में छोड़ती, इससे पहले ही एक 20-22 साल की लड़की अन्दर आई. स्किन टाईट जींस और शॉर्ट टी-शर्ट पहने हुए थी. गॉगल्स आँखों से उतारकर सिर पर चढ़ाए हुए थे.

इस बार उन सारी नज़रों मेरी नज़र भी शामिल थी जो दरवाज़े पर आई लड़की की तरफ उठी थी. लेकिन मेरी आँखों के सामने अब तीन दृश्य थे- एक, लड़की का, दूसरा, उन दो औरतों का, जो अपनी साड़ी में से लटकती कमर और थुलथुले पेट को छुपाती हुई, लड़की के शॉर्ट टी-शर्ट से झांकती पतली कमर को देखकर नाक भौं सिकोड़ रही थी.

और तीसरा दृश्य उन ऑफिस गोइंग औरतों का, जो एक दूसरे को कोहनी से उस लड़की को देखने का इशारा कर रही थी.

कोई चौथा दृश्य मेरे मानस पटल पर उभरता इससे पहले ही उस लड़की की आवाज़ ने पूरे कमरे को घेर लिया  – आंटी आई गॉट द जॉब. ये कहते हुए उसने अपनी बाहें पार्लर वाली आंटी की कमर में डाल दी – और मज़े की बात यह है कि कल से ही ऑफिस जॉइन करना है और आज ऑफिस की पार्टी में बॉस ने मुझे इनवाइट किया है. आज ऐसा मेकओवर कर दो कि पार्टी में सबकी नज़रे सिर्फ मुझ पर हो. यू नो फर्स्ट इम्प्रैशन इज़ द लास्ट इम्प्रैशन. एक बार सबकी नज़रों में आ गयी तो 6 महीने बाद ही प्रमोशन पक्का.

आंटी ने उसे बधाई दी और मेरी तरफ सिर घुमाकर कहा, निशा चाय पियोगी न, मैं अपने लिए मंगवा रही हूँ. मुझे भी एक ब्रेक चाहिए. मैंने आंटी पर एक सुकून भरी मुस्कान लिए नज़र डाली और उनके पीछे हो ली.

अब मैं और आंटी, उनके केबिन में बैठे थे, टेबल पर दो प्याले चाय और मेरी फाइल रखी हुई थी – बोलो निशा, मिसेस अग्रवाल कैसी है? बहुत दिनों से पार्लर आई नहीं. इतना भी क्या व्यस्त रहना समाज सेवा में कि खुद का भी ध्यान नहीं रखो.

– जी, मॉम ठीक हैं. उन्हीं ने भेजा है आपसे मिलने के लिए.

– हाँ, तुम्हारी किसी थीसिस की बात कर रही थी. बोलो, मैं क्या कर सकती हूँ?

– जी, मैं विमेन लिबरेशन पर एक थीसिस लिख रही हूँ. कुछ प्रैक्टिकल एग्ज़ाम्पल्स चाहिए थे तो मॉम ने कहा था कि आपसे मिल लूं.

– अरे मैं क्या मदद कर सकती हूँ बेटा?

– जी, जिस मकसद से मैं यहाँ आई थी वो पूरा हो गया. अब मैं चलती हूँ. थैंक यू वैरी मच आंटी.

– माँ जीवन शैफाली

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