वैलेंटाइन डे : मटर-पनीर से आलू-पालक होने की राह पर प्रेम

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वैलेंटाइन डे आ रहा है… मुझे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का वह प्रसिद्ध लेख याद आ रहा है – “वसंत आ गया है”.

तब प्रेम ने लंबा चलना होता था, एक पूरी ऋतु की जरूरत पड़ती थी… अब सिर्फ एक स्पेशल डे से काम चल जाता है. लोग व्यस्त हैं.

पर भारत में लोग अभी भी तसल्लीबख्श काम करना पसंद करते हैं, फुर्सत से. तो वहाँ अभी भी डे नहीं, पूरा वीक मनाया जाता है.

वसंत का क्या है, आए या न आए… या क्लाइमेट चेंज के इस दौर में आके कब चला जाये आप नोटिस भी न कर पाएं. पर प्रेम जैसे अति आवश्यक कार्य को ऐसी अनिश्चितता के भरोसे कैसे छोड़ दें…

जब हम सोलह साल के थे तो पता भी नहीं था कि वैलेंटाइन डे क्या होता है. आज हमारा बेटा सोलह साल का है, तो वह हमारा सोशल विकिपीडिया है. भारत में यह रोज़ डे, टेडी डे, चॉकलेट डे मनाया जा रहा है…

बेटे से पूछा, तुम्हारा क्या चल रहा है?

उसने पूछा, यह क्या बला है? वैलेंटाइन डे तो सुना है, पर यह रोज़ डे, प्रोपोज़ डे… यह यहाँ कोई नहीं जानता… यह भारत की ही विशेष बीमारी है…

फिर उसने रैशनलाइज़ किया – भारत में लोगों को सेलिब्रेशन अच्छा लगता है, हर चीज को खूब सेलिब्रेट करते हैं… अच्छा है…

हमारा समय कुछ और था. छुप छुप कर प्रेम करते थे… जो मिल गया उसी से कर लेते थे. ज्यादा चॉइस नहीं थी.

कई बार तो इतना छुप छुपा कर करते थे कि आधे समय जिससे प्रेम करते थे, उसे ही पता नहीं होता था.

फिर अगर किसी सहेली से, किसी अफवाह से, या क्लासरूम की बेंच पर शरारती मित्रों द्वारा ब्लेड से खुदे दिल की शक्ल में लिखे नाम से अगर उसे पता चल भी गया तो वह पहले यह जानने की कोशिश करती थी कि जिसके साथ उसका नाम जोड़ा जा रहा है, उसकी शक्ल कैसी है…

और प्रेम के इतिहास में अमिट अक्षरों में लिखे अपने नाम की शोहरत से ज्यादा उसे अपने चचेरे-ममेरे भाइयों को पता चलने, और खानदान की इज्जत पर लगे दाग को मिटाने के उनके उत्साह से होने वाले लफड़े की फ़िक्र होती थी.

और इन सारे भय और शंकाओं से पार पा सकने वाली साहसी लड़की के पास भी प्रेम के नाम पर उन बचकानी चिट्ठियों और कविताओं के अलावा और कुछ नहीं होता था जो तीन विश्वस्त हाथों से गुजरते हुए उसके बैग के कोने में शरण लेते थे…

काहे का रोज़, और काहे की टेडी… मिल भी जाती तो रखती कहाँ… चॉकलेट तो कैसे भी भकोस कर खा कर ख़तम कर लेती…

कुल मिला कर प्रेम हमारे जनरेशन का बड़ा ही डेंजरस उपक्रम था… साहसी लोग ही करते थे. उससे भी साहसी उसे बयान कर पाते थे… और उसे निभा पाने का साहस तो किसी अश्वमेघ यज्ञ से कम नहीं था…

आज प्रेम सहज सुलभ हो गया है. जहाँ बीएसएनएल का सिग्नल नहीं मिलता, वहाँ भी मिल जाता है. फिर भी यह एक लक्ज़री ही है.

आज भी प्रेमिका मटर-पनीर और बटर-चिकन जैसी ही है… हर किसी को और रोज़- रोज़ नहीं मिलती…

पर जिस रास्ते चल रहे हैं, जल्दी ही प्रेम की औकात आलू-पालक और बन्द गोभी होने वाली है…

जब सबके पास नोकिया की मोबाइल की तरह एक प्रेमिका भी हुआ करेगी, तो यह वैलेंटाइन डे, टेडी डे, हग डे, मूत डे नहीं मना करेगा…

खुद ही खुद इसकी चमक चली जायेगी… इस लिए हे बजरंगी मित्रों… यह लट्ठास्त्र संभाल कर रख दो… किसी और अवसर पर काम आएगा…

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