आक्रमण के हथियार बदल गए हैं : 12

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गतांक से आगे…

जो देश-समाज बच्चों के मानसिक विकास के पहलू पर नजर नहीं रखता, अपना नैतिक, आर्थिक, विकास खो देता है. उसकी सुरक्षा भगवान भी नही कर सकते! – बृहस्पति

चेम वाईज़मैन इजराइल के प्रधानमंत्री थे. यह 1949 की बात है. यहूदियों ने हम हिन्दुओं की तरह ही अतीत में बहुत दर्द भुगते थे. कभी समय हो तो ‘संघरर्षत इजराइल का इतिहास’ जरूर पढ़ें… कलेजा काँप उठेगा.

हिटलर तो केवल बदनाम ज्यादा हो गया. उसके अलावा भी सारी दुनिया में उन पर बहुत अत्याचार हुए हुए हैं. इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, रोमन, अरब, ईरानी सभी ने उन्हें सताया है. हिन्दुओं के अलावा लगभग सभी ने उनको हर तरह के दुःख-दर्द दिए थे.

फ़िलहाल 1948 में यूएनओ ने उन्हें इज़रायल दे दिया. यहूदियों के दो हजार साल के संघर्ष के बाद उन्हें बंजर, उजाड़ जमीन दी गई थी. हजारों साल के 14 दुश्मन देशों के बीच में वह बसा दिए गए. वहां पानी की बड़ी समस्या थी. लेकिन दुनिया भर से अपनी भाषा तक भूल चुके यहूदी बसने आ रहे थे.

30-35 लाख तो शुरुआत में ही आ गए. उन्होंने हिब्रू भाषा खोज निकाली और पुनः बोलना शुरू किया. वह इज़रायल बनाने में लग गए. 1952 ‘आइतजक बेंजामिन’ चेयरमैन बने उन्होंने उसी नीति को आगे बढ़ाया. वह 1962 तक रहे. उन्होंने अपना ‘हैवी-स्टाइल टाइम’ छोटे-छोटे बच्चो को दिया.

उनके बारे में पूरे यूरोप-अमेरिका-रशिया के कम्युनिस्ट पत्रकार एक से एक गन्दी-घटिया बातें लिखते थे. वह 7 से 15 आयुवर्ग के बालकों के साथ सुबह-शाम मैदान में गुलाटी, कुश्ती, दौड़, उछल-कूद खेलते थे.

देखा-देखी देश भर में सारे यहूदी प्रौढ़ यही कर रहे थे. वे बच्चों के साथ बातें करते, उनको-तरह के कार्टून, कॉमिक्स बना कर दिए जाते, और फ़िल्में भी जो उनके महान पूर्वजों के संघर्ष से सम्बंधित होतीं.

कम्युनिस्ट लेखक-पत्रकारों ने उन्हें जाने क्या-क्या नवाजा है. बिलकुल आज के ट्रम्प की तरह ही उनको विलेन बना दिया. रूस से आने वाली फिल्मों में वाइज़मैन को विलेन दिखाया जाता. वैसे पहले कभी अंग्रेज, फ्रांसीसी, जर्मन, स्पेनिश सभी अपने साहित्य में उन्हें विलेन ही रखते थे. इसलिए यहूदियों ने इसे सीरियसिली नही लिया.

अचानक 15 साल बाद दुनिया को एक ताकतवर देश दिखा. महान और शक्तिशाली. दुनिया की इकोनॉमी का 8 प्रतिशत वाला देश जिसकी जनसँख्या केवल 50 लाख थी. दुनिया की आबादी में 1 प्रतिशत से भी कम जनसंख्या वाला इज़रायल. उद्योग, कारोबार, एजूकेशन, विज्ञान, और ज्ञान से लबालब शक्तिशाली इज़रायल.

असल भौचक तब रह गए जब 12 दुश्मन देशों ने एक साथ आक्रमण कर दिया और यहूदी बच्चों ने केवल सबको हराया ही नहीं सबकी कुछ न कुछ जमीन भी दबा ली, निशानी के लिए.

यह वही बच्चे थे जो युद्ध, पैंतरे, नीतियां, जासूसी और ‘टिट फॉर टैट’ की नीति सीख रहे थे. उस एक-आँख वाले आइज़मैन और बेंजामिन के साथ. हर बच्चा उनके साथ कभी न कभी मैदान में लड़ा था. सबने उनको हराया था. पढ़ें – ‘डायरी ऑन थॉट’.

पता है न इज़रायल कितना ताकतवर है?

कैसे बना?

घाघ ‘चाचा’ ने भी इसे 1955 में सीखा, और वामियों-सामियों-कामियों के साथ लग गए.

‘मैं रूपइया लूटूं, तुम सनातन राष्ट्र प्रवाह मिटाओ’ का समझौता.

टारगेट थे नौनिहाल… परिणाम सामने है.

बच्चे किसी भी राष्ट्र, समाज का भविष्य होते है. उनका मनोरंजन. उनके खेल, उनके हंसने, उनके सोचने, बोलने, चलने का तरीका तय करता है. यदि विकसित देश चाहिए तो पीढ़ियों के निर्माणकर्ता को उल्लास-उत्साह-उमंग से भरे मनोरंजन दें. उनमें से उचित शिक्षा वे खुद ही लेंगे. यही वास्तविक रचनात्मकता होगी. किसी भी देश के विकास की जमीनी धुरी, वहां के नौनिहाल होते हैं.

निश्चित ही हममें से कुछ ने ही ‘प्लानेट एप्स’ – वन, टू या थ्री नहीं देखी होगी. विभिन्न प्रकार के जानवरों से बातें करने वाले ‘डॉक्टर डूलिटिल’ पर लगातार आने वाली सीरीज 1-2-3 तो देखी होगी?

ये हॉलीवुड की बाल फ़िल्में हैं. अब जब आपने नहीं देखी हैं तो बच्चों को भला कहां दिखाने वाले. वैज्ञानिक तरीके से सोचने, समझने और दुनिया को देखने का मानवीय तरीका विकसित होने लगता है.

जब ‘होम अलोन’ – 1, 2, 3 के छोटे बच्चे का कामेडी से भरा चालाकी पूर्ण संघर्ष देखते है. डैडी डी डे कैम्प या फ्री विली के बारे में हम सोच सकते हैं क्या? बच्चे ‘चॉकलेट फैक्टरी’ के माध्यम से अपनी हसरतें पूरी करते हैं .नार्निया -1, 2, 3 का काल्पनिक जादुई संसार बच्चों को एक ख्याली किन्तु व्यक्तित्व के प्रति आत्मविश्वास जगाता है.

हैरी-पाटर, ननी-मफी, स्टुअर्ट-लिटिल, किंडर-गार्डन और कार्टून-फिल्मे श्रेक, एलिस इन वंडर लैंड, डंस्टन चेक, जथूरा, जुमांजी, पीटर पान, कास्टेलो मीट फ्रैन्क्स्ताइन, बिग, बैक टू फ्यूचर, मेडा-गास्कर, आइस-एज,… रिंगल वेल,.. स्पाइडर-विक़, जैसी हजारों मूवी ऐसी हैं जिनकी सीरीज पर सीरीज बनती जा रही है.

केवल छोटी लड़कियों के लिए हैरिस, बिग फेयरी टेल, बार्बी- 1 से 8, टिन्कर बेल, जैसी हजारों फ़िल्में हॉलीवुड ने केवल बच्चियों के लिए बनाईं.

उपरोक्त फिल्में दुनिया भर के सभी देशों की भाषाओं में डब हुईं और अरबों-खरब डॉलर की कमाई की और अभी भी कर रहे हैं.

‘बेबी डे आउट’ की कहानी इतनी ही है कि एक साल के बच्चे का अपहरण होता है. वह छोटा किड गुंडों को बहुत पकाता है.

‘बेब’ एक बेबी पिग की कहानी है. ‘पुसी गारफील्ड’… एक बिल्ली के संघर्षो की गाथा है, असम्भव चीजों को घटनाक्रमों और रोचकता से ऐसा पिरोया गया है कि बड़े भी बच्चों के साथ मजे लेने लगते हैं. सोचिये उनकी रिसर्च कितनी बड़ी मेहनत से भरी रही होगी!! उस फिल्म ने तब 80 करोड़ डॉलर कमाए थे, आज से 20 साल पहले.

इन फिल्मों का कुल कारोबार जोड़ने पर किसी बड़े देश के बजट से भी ज्यादा निकलता है…. ये तो छोड़ दीजिये!

उनमें मनोरंजन के साथ-साथ गहरे मानवीय सन्देश होते हैं जो उत्साह, उल्लास के साथ सकारात्मक, समझपूर्ण संघर्ष को प्रेरित करते हैं.

लगभग हरेक फिल्म का मैंने ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया. उसमें पूरा साल लगा. वे हमारे फिल्मकारों की तरह आपके बच्चों में काइयांपन से भरे डिप्रेसिव थॉट (कम्युनिज्म) नहीं भरते, न बेवजह का रोना-धोना. इसलिए वे विकसित, सक्षम देश बने रह सके.

40 के दशक से बन रही इन फिल्मों ने आत्मशक्ति से भरपूर, दिमागी व शारीरिक स्वस्थ और विकसित देश के मजबूत नागरिक तैयार किये. एक ऐसी समझ जो मनोरंजन के माध्यम से ज्ञान, तकनीक, सूचनाएं और संस्कार अगली पीढ़ी में डाल देती है.

रूस, चीनी कम्युनिस्ट फिल्में और कूड़ा साहित्य के सहारे बच्चों में कट्टरता बोना चाहते थे. सोवियत रूस का हश्र पता ही है. चीन और अन्य कम्युनिस्ट देश और उनके बच्चे बार-बार उस सड़ांध से छुटकारे का उपाय खोजते दुनिया को दिख ही रहे हैं. जल्द ही छुटकारा मिल भी जाएगा.

इस तरह के शिक्षण के बारे हमारे यहाँ पता ही नही चलता. अपने यहाँ प्राय: बाल फ़िल्में उनसे चुराकर ‘रीमेक’ हुई हैं या फिर बोझिल सी एक-दो कहानियों के दुहराव करके बार-बार बनी हैं.

बिलकुल ‘मैच फिक्सिंग’ की तर्ज पर. बच्चों को पता होता है कि अगला सीन या एक्शन क्या हो सकता है…न रोमांच, न एडवेंचर, न सस्पेंस, न थ्रिल और न ही रोचकता.

बस वही रोना-धोना, ओवर एक्टिंग से भरे सीन और चलताऊ सी सिनेमैटोग्राफी, उबाऊ, बासीपन से भरे निराशा भरे गाने.

जब हम ‘फ्लाई-अवे होम’… बीयर या अपोलो, या ई-टी फिल्मों को अपने यहाँ किसी अन्य नाम से पुन: बनाते है तो वह ओरिजनलिटी नहीं आ पाती है, न सहज संतुलन बैठता है.

जॉकीमान, पंगा गैंग, बम-बम बोले, महक, ब्ल्यू अम्ब्रेला, स्टैनले टिफिन बाक्स, दो-दूनी चार, राक फ़ोर्ड, हवा-हवाई, जजंतरम-ममन्तरम जैसी फ़िल्में बना कर आप भविष्य के नागरिकों क्या जताना-दिखाना-सिखाना चाहते थे?

और कॉमेडी या मनोरंजन… तभी तक अच्छा लगता है जब तक बेहतर नहीं मिलता… जैसे ही हॉलीवुड की मूवी हाथ लगती है बच्चे उसे प्राथमिकता देते हैं. मैं अपने बच्चो से जैसे ही कहता हूँ आज हम घर में मुंबईया फिल्म (चिल्लर पार्टी, राजू चाचा, मकड़ी टाइप) देखेंगे… 7 साल की सुमि, 10 साल की रिद्धिमा एकमत होकर तुरंत जवाब देती हैं, ‘पापा आप अकेले झेलिए. वे पता नहीं क्या दिखाते हैं! मैं तो मिकी-माउस देखूँगी या फिर माउन्स हन्ट देखूँगी’.

‘कैस्पर’ उनकी पसंदीदा फिल्मों में से एक है या फिर बाल गणेश, वीर हनुमान, लिटिल कृष्णा भी देख लेती हैं.

हम तो अभी ‘तारे जमीन पर’ ढो रहे हैं वह भी ‘अक्लरहित नकल’… ‘परियों और जादू की सुनहली दुनिया’ भी एक पिछड़ी सुनिश्चित विचारधारा का कूड़ा दिमाग में डालती रही है.

बच्चे अब फालतू रोने-धोने से मुक्ति चाहते हैं. अमूमन उनकी फिल्में ‘वाम-पंथी कर्म-काण्ड’ जैसी थी… अब अक्षत डाल दो… अब प्रसाद चढ़ा दो.

हालांकि बाल-फिल्मों से खूब पैसे बनाये गये. उसका कारण यह है कि अन्य देशों की तुलना में हमारे यहाँ दर्शकों का एक विशाल हुजूम सहज ही उपलब्ध रहा है, न कि उत्कृष्टता.

इन वर्षो में सिनेमा ही एकमात्र मनोरंजन का साधन रहा. कुछ भी कूड़ा-कर्कट परस दो, कुछ न कुछ दर्शक मिल ही जाते है. इस देश की जनता का अभाग्य कि किसी को भी लूटने का मौका बस मिल जाए…..!

मुम्बईया सिनेमा उद्योग के कब्जेदारों ने बच्चों से मनोरंजन के नाम पर केवल पैसे ऐंठे. भविष्य के प्रति कोई जिम्मेदारी न निभाई. क्या करें दुर्भाग्य गत हजार साल से पीछा नहीं छोड़ रहा.

इन समय के सत्तादारों ने इन्हें इनाम-विनाम भी बाँट दिए ताकि समय आने पर ‘वापसी’ का कर्मकाण्ड कर कार्यकर्ता का दायित्व पूरा कर सकें…. साहित्यिक कार्यकर्ताओ की तरह.

जंबो… चूरन गोली… अकबर-बीरबल… वीर अभिमन्यु… जलपरी… ग्रीन चीक… छोटा भीम… घटोत्कच आदि जैसी कुछ फ़िल्में इधर के एक-दो साल में बननी तो शुरू हुई हैं किंतु उनमें वो बात नहीं आ पा रही है… महज औसत दर्जे की चलताऊ सी लगती हैं!

1957 में बनी फिल्म ‘हम पंछी एक डाल के’ तक कुछ कोशिशे दिखती हैं. उसके बाद तो नेशनल अवार्ड वाली फिल्में भी जाने क्या बताना चाह रही हैं. फूल और कलियाँ, डेलही की कहानी, नन्हे-मुन्ने सितारे, सावित्री, राजू और गंगाराम, पाँच पुतलियां, सफेद हाथी, आज़ादी की ओर, अंकुर, मैना और कबूतर, कभी पास-कभी फेल, गोल, चुटकन का महाभारत, देख इंडियन सरकस, इन सभी ने मनोरंजन तो नहीं ही किया, शिक्षा और संस्कार क्या दिए…शोध का विषय है…!

ये फ़िल्में प्रामाणिक रूप में दुनिया की अन्य भाषाओं में नही देखी जाती… भारत के बॉक्स-आफ़िस पर असफल रहीं, फिर पुरस्कृत क्यों की गयीं… यह भी जाँच का प्रश्न है.

इन वर्षो में बनी सभी फिल्मो का तुलनात्मक-शोध-अध्ययन-विश्लेषण किया जाए तो इन सत्तर सालों में हमारे फिल्मकारों ने निहायत ही गैर-जिम्मेदाराना तरीके से फ़िल्में बनाई.

उनको अपनी फिल्मों के निर्माण का उद्देश्य भी नहीं पता रहता था. अगर वह मनोरंजन के लिए बनती थी तो निहायत फूहड़, घटिया और बेवकूफाना थी. उगाही ही उनका उद्देश्य था. कंफ्यूजियाना ही उनका उत्पाद था.

इतने सालों से हमारे सो-कॉल्ड फिल्मकार जाने किस लोक-या युग में रहते रहे थे.

सांस्कृतिक सन्देश देती पौराणिक, वैदिक और सांस्कृतिक आदर्श कहानियां तो खैर सेकुलर-वामी सोच के खिलाफ थीं, इसलिए बनाना ही नही था… ऊपर से सरकार के नाराज होने का खतरा.

अपनी कोई काबिलिलियत नही थी… पंचतंत्र… वृहतकथा संहिता… अमरकथा… गोपाल भांड. तेनाली रामन के देश में अच्छी कहानियों और पटकथाओं का अभाव न था बल्कि… इन वर्षो में फिल्मकार, साहित्यकार और सरकार वामी-सेकुलारिया (प्रो-ईसाई-इस्लामिक) दिमागी दरिद्रता का शिकार हो गयी थी… अच्छी दिशा में जा रही कई फिल्मो को सेकुलरिज्म घुसेड़ने के चक्कर में कबाड़ होते देखा है.

अधिकाँश बाल फिल्मों में फालतू का रूदन, दुःख, शोषण, उदासी, निराशा से भरे भयावह नकारात्मक चित्रण किये गये हैं…. बचा/खुचा काम बेसुरे गीतों ने कर दिया है… ऊपर से रुदाली टाइप का संगीत! वह भी किसी वेस्टर्न म्यूजिक से मारा हुआ.

आज के नेट-सोशल मीडिया के युग में छोटे-छोटे बालक तुरन्त बता देते है, मोजार्ट है कि बीथोवन! या रीमेक… किसी फ़िल्म का मारा हुआ है! यह बच्चों में चैलेंज स्वीकारने की क्षमता घटाने का काम करता था.

यही सब हमारे देश के लगातार पिछड़े रह जाने, व गरीबी के कारणों में से एक बना… जब उत्साह-उमंग व ऊर्जा से लबालब युवक ही न तैयार हुए तो रचनात्मकता पूर्ण निर्माणक कहाँ से बनते. इन फिल्मों ने दिमाग से लाचार, नौकरीपेशा वर्ग तैयार करने में बड़ी भूमिका निभायी. ऐसे ही तो नहीं ‘राजवंश’ लगातार सत्तर सालों तक बना रहता!

और उनमें भी मनोरंजन के माध्यम से किसी संदेश के बजाय वही कम्युनिस्टिक प्रशिक्षण करने की कोशिश दिखती है. फिल्मकारों की इस गैर-जिम्मेदाराना अयोग्यतापूर्ण सोच ने पूरे पांच पीढियों के बाल मन को अवसादी बना डाला.

उसका प्रभाव यह रहा कि स्वतंत्र और विकासवादी सोच विकसित होने की जगह पूरा देश लगातार सत्तर सालों तक द्वन्द में जीता रह गया. उल्लास-उल्लास से भरा निर्द्वन्द बचपन एक राष्ट्र का मूल-भूत विकास कारक तत्व होता है.

उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी गुलाम चाहिए थे इसीलिये फिल्म प्रशिक्षण संस्थान में गजेन्द्र सिंह अखरते हैं. क्योंकि सोच और साजिशों मे दखलंदाजी का खतरा मँडराता रहता है. साल दर साल देश की जनता को अपनी कट्टरता तले ठगते वे रहे और असहिष्णु हम हैं!

अब ज़रा इन सौ सालों में बनी विश्व की टॉप पचास बाल-फ़िल्मों पर निगाह दौड़ाईये. ये मुंबइया फिल्म उद्योग की हक़ीकत खोलती हैं… यह लिस्ट लेख के अंत में देखिए… ये मेरी बनाई लिस्ट नहीं है… ये दुनिया भर के सैकड़ो विशेषज्ञों के पैनल ने, ‘ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट’ ने लगातार नजर रखकर व तुलनात्मक अध्ययन करके यह लिस्ट बनाई है. लिस्ट जरूर देखें. समय मिले तो फिल्मे भी.

हमारी एकमात्र…. एक फ़िल्म 1955 में बनी ‘पाथेर-पांचाली’ उसमे शामिल है.मैं उसे बच्चों की नहीं बल्कि बड़ों की फ़िल्म कहता हूँ.

अपने बच्चे को इतनी गहरी निराशा-हताशा, असफल, कमजोर भारत की तस्वीर मुझे नहीं दिखानी, जैसी उस ‘रे’ ने दिखाई है.

इस तरह लेखन, कार्टून, कॉमिक्स, पत्र-पत्रिकाएँ, बाल-साहित्य, गेम, इन्स्ट्रुमेंट सभी एक घातक हथियार की तरह यूज की जाती हैं. आपकी पीढ़ियों के सोच, विचार और संस्कार में बदलाव के लिए फिर वे रहन-सहन, जीवन शैली सब बदलने लगते है.

ऋषियों-मनीषियों के संस्कार उन्हें बेगाना लगने लगता है. कुछ दिनो बाद ही यही बच्चे उनके लिए तर्क गढ़ रहे होते है. अगली पीढ़ी बोलती है… ‘ये हिन्दू लोग अपने मुरदे जलाते क्यों हैं?’ बस उसका नाम अर्पण सिंह, मिश्र, खन्ना, आर्य आदि होता है, किन्तु वह खुद को ‘वे’ बोल रहा होता है.

जड़ों से काटने का यह प्रयास पूरी योजना-रचना से किया गया है. यह शिक्षा-पद्दति केवल भगवान ही नहीं अपनी ठगी-पूर्ण सामी सोच के अलावा माँ-बाप, देश, संस्कृति, जीवन शैली, आचार-विचार, आस्थायें, अपने पूर्वज, पितर, महापुरुष आदि सब कुछ हल्का कर देती है. पूरी तरह कैज़ुअल, स्वाभिमान नष्ट करने की स्लो प्रक्रिया है!

एक धीमा ज़हर जो मानसिक विकलांग समाज तैयार करता है. वह खुद के पूर्वजों की चीजों को गालियां देकर खुद को सेकुलर समझ संतुष्टि महसूस करता है.

यह कभी नहीं सोचता कि ये इसाई, मुस्लिम अपनी आस्थाओं को लेकर क्यों इतना कट्टर हैं. वे क्यों नहीं अपनी किताब, अपने पैगम्बर को गरियाते और सेकुलरिज्म का लबादा दिखाते.

वामी-सामी-कामी-झामी की साजिशों की यही सफलता है…. और पिछले 150 साल से मिल रही मिशनरीय-शिक्षा का तो कहना ही क्या?

इस शिक्षा के लिए लालायित रहे, अपनी लापरवाही की कीमत 74 लाख से अधिक वृद्धजन गार्जियन देश भर में चुका रहे हैं. वे या तो बड़े बंगले में अकेले हैं या फिर वृद्धाश्रम में. इनके बच्चे मिशनरी स्कूल शिक्षित हैं. आप अपने शहर में जांच सकते हैं. पश्चिमी देशों के लिए यह आम है, हम भारतीयों के लिए नई चीज.

जो अपने बाप का न हुआ, जिसमें स्वाभिमान नहीं है, उसी को ‘जन्तु’ कहते है..!

ये नव-प्रशिक्षित जन्तु अपने माँ-बाप के भी नही होते. पूर्वजों के प्रति उनका स्वाभिमान क्रमश: समाप्त किया जाता है. धीरे-धीरे उनके अंदर अपनी आस्थाओं, श्रद्धा और मान-बिन्दुओं की हंसी उड़ाने की प्रवृत्ति तैयार की जाती है. अपनी पूजा पद्धतियों के प्रति एक नकारात्मक भाव भरा जाता है.

सनातन के प्रति स्वाभिमान तो छोडिये, यह प्रवृत्ति अपने पैदा करने वालों के प्रति भी वास्तविक सम्मान नहीं रहने देती. नकारात्मकता इनकी चेतना में निहित हो जाती है. मनोवैज्ञानिक शोधों से एक खूंखार तथ्य सामने आया है कि ‘वे खुद नहीं जानते वे क्या चाहते हैं’.

पता कर भइए! इनके ही माँ-बाप आज बड़े बंगलों में अकेले सड़ रहे हैं. वृद्धाश्रम में भेजे जा रहे हैं. बेटा करिअर संवार रहा है, बड़े शहरों या विदेश में. बीच-बीच में हाल-चाल ले-लेते हैं. पैसा भेजते रहते है.

तलाक़-वलाक अब आम बात है… शुरुआती पीढ़ी वाले गहरे डिप्रेशन और अकेलेपन से पीड़ित होकर मरे… बाद वाले जो खुद को बड़े ‘बुद्धिजीवी’ कहते/ समझते थे, उनमें से दो-चार को खोजो… या तो अब पूजा-पाठ में डूबे पश्चाताप कर होंगे या फिर अवसाद के साथ अन्य बीमारियों का इलाज कराते किसी अस्पताल मे अकेले पड़े मिल जाएँगे…

सकारात्मकता नहीं है तो दोस्त-साथी, हित, नातेदार कोई नहीं बच रहता… विशेषकर कम्युनिस्ट और सेकुलारिस्टों का बुढ़ापे में बड़ा बुरा हाल दिखता है. थोड़ा अगल-बगल घूम आओ… मिल जाएँगे.

ईसाई कांग्रेसियों, वामियों, मुस्लिमों के गठजोड़ ने तरीके से सनातन संस्कृति को अपने मूल स्थान से पूरी तरह निपटाने की ठानी थी! 1947 के बाद सारे फ़िल्मकारों ने पूरी योजना के साथ उनका सहयोग किया था… एकाध छोटे-मोटे निर्माता आगे भी आए तो वे सरकारों द्वारा नीति के तहत बुरी तरह हतोत्साहित किए गये…

वो तो भला हो साउथ की फिल्मों और टेलिविजन के छोटे पर्दे का, नहीं तो अपना गोबर सभी के दिमाग़ में भरने में कोई कसर न छोड़ी. अब टेलीविजन पर आ रहे बाल सीरियल और कार्टून-सीरियल- फिल्में भी हिंसा-सेक्स और सेकुलर कुत्सा की राह पर हैं.

फिल्मों के माध्यम से सनातन जीवन शैली की विरोधी सोच को ग्लैमराईज़ किया… हज़ारों साल की संस्कृति को दिमागी तौर पर पिछड़ा व्यक्त किया, ऐसे ही फ़िल्मकारों को सरकारों द्वारा प्रोत्साहन दिया जाता था जो सेकुलरिज़्म के नाम पर पूर्वजों की थाती को घटिया, पिछड़ा, अविकसित साबित करें…!

जब मैसेंजर, पैंगम्बर, बेनहर, टेन कमांडमेंट, जीजस, मोजेज, टाइटन, हरकुलिस, ट्राय, स्पार्टकस, मरियम आदि जैसी 3-4 सौ डॉलर लागत से पौराणिक-गाथाओं पर फिल्में बना कर हॉलीवुड वाले अपनी धार्मिक सामाजिक आस्थाओं को गौरव से दिखा सकते हैं… खूब कमा सकते हैं, तो हमारे फिल्मवाले हजारों-हज़ार महागाथाओं पर क्यों नही बनाते थे? जबकि उन गाथाओं मे इस दुनिया के लिए अपनी तरह के स्वतंत्र और संप्रदाय-रहित संदेश छुपे थे..!

दिमाग़ में सेकुलरिज़्म का कूड़ा जो भरा हुआ था… प्रो-ईसाई-मुस्लिम सेकूलरिज़्म! ऊपर से सरकार का ‘हिन्दू-हतोत्साह प्रोजेक्ट’!

शिक्षा और पाठ्यक्रमों के माध्यम से सरकारों ने भी धीमा जहर भरा… दुष्परिणाम खुद भुगतो. क्योंकि अपनी चीज़ों का अपमान और भोगवाद, शिक्षा और मनोरंजन के माध्यम से डाला है, उसका दंश तुम्हें खुद ही सहना होगा.

क्रमश: 13

पिछले सौ साल में बनीं दुनिया की श्रेष्ठ 50 बाल फ़िल्में

The Adventures of Robin Hood (Michael Curtiz/William Keighley, 1938, USA)
Au revoir les enfants (Louis Malle, 1987, France/W.Germany)
Back to the Future (Robert Zemeckis, 1985, USA)
Beauty and the Beast (Gary Trousdale/Kirk Wise, 1991, USA)
Bicycle Thieves (Vittorio De Sica, 1948, Italy)
Billy Elliot (Stephen Daldry, 2000, UK/France)
A Day at the Races (Sam Wood, 1937, USA)
E.T. the Extra-Terrestrial (Steven Spielberg, 1982, USA)
Edward Scissorhands (Tim Burton, 1990, USA)
Etre et Avoir (Nicolas Philibert, 2002, France)
Finding Nemo (Andrew Stanton/Lee Unkrich, 2003, USA)
It’s a Wonderful Life (Frank Capra, 1946, USA)
Jason and the Argonauts (Don Chaffey, 1963, UK/USA)
Kes (Ken Loach, 1969, UK)
The Kid (Charles Chaplin, 1921, USA)
King Kong (Merian C.Cooper/Ernest B.Schoedsack, 1933, USA)
Kirikou et la sorcière (Michel Ocelot, 1998, France/Belgium/Luxembourg)
La Belle et la bête (Jean Cocteau, 1946, France / Luxembourg)
Le Voyage dans la lune (Georges Melies, 1902, France)
Les Quatre cents coups (Francois Truffaut, 1959, France)
Monsieur Hulot’s Holiday (Jacques Tati, 1953, France)
My Life as a Dog (Lasse Halstrom, 1985, Sweden)
My Neighbour Totoro (Hayao Miyazaki, 1988, Japan/USA)
The Night of the Hunter (Charles Laughton, 1955, USA)
Oliver Twist (David Lean, 1948, UK)
The Outsiders (Francis Ford Coppola, 1983, USA)
Pather Panchali (Satyajit Ray, 1955, India)
Playtime (Jacques Tati, 1967, France/Italy)
The Princess Bride (Rob Reiner, 1987, USA)
Rabbit-Proof Fence (Phillip Noyce, 2002, Australia)
Raiders of the Lost Ark (Steven Spielberg, 1981, USA)
The Railway Children (Lionel Jeffries, 1970, UK)
The Red Balloon (Albert Lamorisse, 1956, France)
Romeo + Juliet (Baz Luhrman, 1996, USA)
The Secret Garden (Agnieszka Holland, 1993, UK/USA)
Show Me Love (Lukas Moodysson, 1998, Sweden/Denmark)
Singin’ in the Rain (Stanley Donen/Gene Kelly, 1952, USA)
Snow White and the Seven Dwarfs (Disney, 1937, USA)
Some Like it Hot (Billy Wilder, 1959, USA)
The Spirit of the Beehive (Victor Erice, 1973, Spain)
Spirited Away (Hayao Miyazaki, 2001, Japan)
Star Wars (George Lucas, 1977, USA)
To Kill a Mockingbird (Robert Mulligan, 1962, USA)
Toy Story (John Lasseter, 1995, USA)
Walkabout (Nicholas Roeg, 1971, UK)
Whale Rider (Niki Caro, 2002, New Zealand)
Where is the Friend’s House? (Abbas Kiarostami, 1987, Iran)
Whistle Down the Wind (Bryan Forbes, 1961, UK)
The White Balloon (Jafar Panahi, 1995, Iran)
The Wizard of Oz (Victor Fleming, 1939, USA)

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