कल्चरल न्यूरोपैथी : पूरे हिन्दू समाज को ग्रस रहा हिन्दू आइडेंटिटी का अभाव

अपने बेटे से बात करते हुए एक प्रश्न सामने आया – कोई क्या करे अगर उसे एक आइडेंटिटी की जरूरत महसूस नहीं हो?

मैंने उससे पूछा – बेटा, तुम स्कूल क्यों जाते हो?

उसने कहा – एजुकेशन के लिए…

– तो तुम्हें एजुकेशन की जरूरत महसूस होती है?

– हाँ, यह useful है…

– पर तुम स्कूल तो 4 साल की उम्र से जा रहे हो… क्या तब भी तुम्हें इसकी जरूरत महसूस हुई थी? क्या हमने इंतज़ार किया कि पहले बच्चे को एजुकेशन का महत्व पता चले तभी उसे स्कूल भेजना ठीक रहेगा? अगर तुम्हें बड़ा होकर एजुकेशन का महत्व पता चलता तो तो तुम तब स्कूल जाना शुरू कर पाते?

वह बिना तर्क-वितर्क किये, बिना खोदे, जड़ तक गए किसी बात को स्वीकार नहीं करता. तो अगला प्रश्न था – पर आइडेंटिटी की जरूरत क्यों है? क्यों मान लूँ कि यह एजुकेशन इतना ही इम्पोर्टेन्ट है?

मैंने कहा – भैंस को आइडेंटिटी की जरूरत नहींं पड़ती… उसे फर्क नहीं पड़ता कि वह भूरी भैंस है या काली. वह चारा खाती है और जुगाली करती है. आइडेंटिटी एक हायर इवॉलव्ड फंक्शन है. यह हज़ारों साल की संस्कृति का संचित फल है.

शिक्षा हमारे सर्वाइवल के लिए जरूरी है. आप लिखना, पढ़ना, जोड़ना-घटाना, पैसे गिनना, बैंक कार्ड इस्तेमाल करना, इन्टरनेट का प्रयोग करना, ट्रेन का टाईमटेबल देखना सीखते हो… इसके बिना नहीं जी सकते.

आप इसकी जरूरत महसूस करते हो, फिर इसे सीखते हो, बच्चों को सिखाते हो. फिर आप आइडेंटिटी की जरूरत नहीं महसूस करते इसका क्या कारण है? खास तौर से हिन्दू…

डायबिटीज़ के मरीज के पैर की उँगलियों और तलुवे में संवेदना नष्ट हो जाती है. उसे कट या जल जाता है, पता नहीं लगता.

मस्तिष्क को पैर की उंगलियों को पहुँचने वाली चोट या जलन महसूस ही नहीं होती. इसे न्यूरोपैथी कहते हैं.

बिना पहचान का हमारा हिन्दू समाज ऐसे ही न्यूरोपैथिक होता जा रहा है. एक पहचान के बिना, एक हिन्दू के ह्रदय में दूसरे हिन्दू के प्रति समानुभूति (empathy) नहीं होती.

कश्मीर के हिन्दू का दर्द केरल के हिन्दू को नहीं सताता, केरल के हिन्दू पर हो रहा अत्याचार आपको उत्तर प्रदेश में बड़ी बात नहीं लगती.

यह कल्चरल न्यूरोपैथी है… जो एक हिन्दू आइडेंटिटी के अभाव में पूरे हिन्दू समाज को ग्रस रहा है.

और यह आइडेंटिटी अपने आप पैदा होने वाली चीज नहीं है. इसका इंतज़ार नहीं कर सकते कि बच्चा बड़ा होगा और अपने आप एक दिन अपने आपको हिन्दू महसूस करने लगेगा, दूसरे हिन्दू के प्रति जुड़ाव, लगाव महसूस करने लगेगा.

जैसे बच्चे को स्कूल भेजते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं… वैसे ही बचपन से ही यह आइडेंटिटी भी देनी पड़ेगी… समय निकालिये… अपने बच्चों से बात कीजिये… कहीं ये ही सवाल उनके मन में भी उग रहे होंगे.

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