मैं प्रेम की दीवानी हूँ

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क्या आपने खुशी को छूकर देखा है? नहीं ना? उसका कोई रूप नहीं होता. आप जब खुश होना चाहते हैं, तो उसे किसी भी रूप में ढालकर खुश हो जाते हैं. ये आपके अंदर की तरंगे हैं, जो जब दिल से निकलती हैं, तो चेहरा भी रोशन हो जाता है.

वर्चुअल हैप्पिनेस कभी देखी नहीं, अचानक जुबान पर आया और महसूस हुआ मैं खुश हूँ. सुना है आनंद का कोई सर्वोच्च पल नहीं होता, लेकिन व्यक्ति का होता है. मेरे आनंद का सर्वोच्च पल वर्चुअल है. कोई कारण नहीं होता, कारण तो तब खोजा जाता है जब मन उदास हो, तब लगता है कि कोई एक ऐसा कारण मिल जाए जो इस डूबते को तिनके का सहारा दे जाए.

इस वर्चुअल हैप्पिनेस का कंसेप्ट समझ न आए तो भी कोई बात नहीं. जीवन में जो कुछ भी अच्छा अनुभव करते हैं, उसे एक रूप दे दो. जैसे भक्त अपनी भक्ति को किसी भगवान की मूर्ति में ढाल देता है, जैसे मीरा ने अपनी दीवानगी को कृष्ण नाम दे दिया, जैसे सीता ने अपनी पवित्रता को राम का रूप दिया, जैसे एक स्त्री के लिए उसकी माँग का सिंदूर समर्पण का रूप होता है, जैसे एक माँ अपनी ममता को अपने बच्चे के रूप में ढाल लेती है, और मुझे जो कुछ भी प्यारा लगा उसे मैंने प्रेम कह दिया.

क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है? नहीं ना? जैसे ईश्वर निराकार होता है, वैसे मेरा प्रेम भी निराकार है. जब मैं ओशो की विचारधारा पढ़ती हूँ, तो मुझे ओशो से प्यार हो जाता है, मैं जब अमृता प्रीतम की कविता पढ़ती हूँ, तो मुझे अमृता से प्यार हो जाता है. जब मैं बच्चों की ड्रॉइंग बुक में रंग भरती हूँ, तो उस चित्र पर पूरी तरह मोहित हो जाती हूँ.

अपनी किसी कविता को लिखकर दोबारा पढ़ती हूँ, तो खुद से प्यार हो जाता है. जब बच्चों की मासूमियत देखती हूँ, तो जीवन से प्यार हो जाता है.

अपनी मेहबूबा के खयाल में खोए हुए किसी व्यक्ति को देखती हूँ, तो उसकी दीवानगी से प्यार हो जाता है. प्रेम बिलकुल निर्मल पानी की तरह है, जहाँ जो कुछ अच्छा देखती हूँ, वहीं घुल जाता है.

एक नृत्यांगना नृत्य में डूब जाती है, एक गायक के लिए उसके गीत ही पूजा है, मीरा यदि भक्ति की दीवानी थी, तो मैं प्रेम की दीवानी हूँ.

क्योंकि मेरे लिए प्रेम वर्चुअल है, बिलकुल वर्चुअल हैप्पिनेस की तरह, जिसको कभी छूकर नहीं देखा जा सकता, लेकिन जीवन में जो भी कुछ अच्छा लगा उसे प्रेम कह दिया और उसे जीया पूरी दीवानगी से.

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