अभिव्यक्ति डॉ अव्यक्त की: ऐसे अपना EQ बढ़ाइए और जीवन में जादुई परिवर्तन लाइए

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EQ (इमोशनल qotient) या भावनात्मक बुद्धिमता की प्रमुख बात ये है कि इसे किसी भी उम्र में व्यक्ति बढ़ा सकता है.

IQ स्थिर है, जिसे जैसा मिला वैसा ही रहेगा. EQ को प्रयास, अभ्यास एवं मार्गदर्शन से बढ़ाया जा सकता है. IQ का पूरा और रचनात्मक उपयोग अच्छे EQ के बिना संभव नहीं. रिसर्च कहती हैं कि 90 प्रतिशत अच्छा परफॉर्म करने वालों या सफल लोगों का EQ ज़्यादा होता है.

EQ बढ़ाने के उपायों पर बड़ी बड़ी किताबें लिखी गयी हैं. विदेशों में तो सेमिनार और कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं. इसलिए इस लेख को छोटा, सरल और रोचक रखते हुए मैं कितनी गहराई से इस विषय पर सन्देश दे पाऊंगा पता नहीं. लेकिन आप सब के प्यार और इस जटिल विषय पर उत्सुकता की वजह से EQ बढ़ाने के कुछ उपायों पर लिख रहा हूँ.

1. Self awareness स्वयं को जानना :

EQ के ज़्यादा होने की पहली सीढ़ी है अपनी भावनाओं और उससे उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियों पर आपकी स्वयं की नज़र.

दिन भर में सिर्फ 20 मिनट रोज़ दीजिये स्वयं को. आत्मावलोकन. देखिये मन की गहराइयों में कि आप खुश हैं, ऊर्जावान हैं, चिंतित हैं, उद्वेलित हैं, अनिर्णय की स्थिति में हैं, गुस्सा हैं, या ठेस लगी हुई महसूस कर रहे हैं.

भावनाएं यूँ ही नहीं रह जातीं वे हमारे हाव भाव, बातचीत, शब्द चयन, शारीरिक भाषा, कार्यक्षमता, नींद, भूख सब पर प्रभाव डालती हैं.
भावनाओं पर नज़र रखने की आदत धीरे धीरे उन पर हमारा नियंत्रण हासिल करवा सकती हैं.

कैसा हो जब भावनाएं हमें नहीं हम भावनाओं को नियंत्रित कर सकें.
ज़्यादा EQ वाले लोग ये कर सकते हैं.

खुशी और दुःख का ऑन एंड ऑफ स्विच मस्तिष्क में बनाना संभव है. वो भी एक controller बटन के साथ जहाँ आप ये तय कर सकें कि कब, कितना और कितनी देर दुःख को महसूस करना है. खुशी हमारे भीतर समा जाती है. बाहरी व्यक्ति और घटनाएं क्षणिक प्रभाव ही फिर डाल पाते हैं.

भावनाओं से उत्पन्न हमारी प्रतिक्रियायें ही हमें लोकप्रियता दिलवाती हैं. जिन्हें हम बाद में सफलता कहते हैं.

तो पहला कदम है स्वयं की भावनाओं पर नज़र.

दूसरा कदम :

सकारात्मक भावनाओं को पोषित करना. उन्हें स्विच ऑन करना है. साथ ही जैसे ही नकारात्मक भाव उत्पन्न हों उन्हें स्विच ऑफ कर देना है.
नकारात्मक भाव के कुछ उदाहरण घृणा, भय, घमंड, क्रोध, ईर्ष्या, शक, लालच, साजिश, निराशा, उदासी, हिंसा.

सकारात्मक भाव के उदाहरण (जिन्हें पोषित करना है):
खुशी, ऊर्जा, आशा, मदद, देखभाल, सीखने की इक्छा, शांति.

तो आत्मावलोकन, मेडिटेशन से EQ के उस स्तर को पाया जा सकता है जहां हमारे पास भावनाओं और उनसे उत्पन्न अपनी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने का स्विच होगा.

2. Empathy संवेदनशीलता

ज़्यादा EQ वाले लोग दूसरों को बहुत तेज़ी से पढ़ पाते हैं. इसकी वजह उनका स्वयं अपनी भावनाओं को गहराई से समझने के साथ ही दूसरा कैसा महसूस कर रहा होगा इसे भी समझ पाना है.

अपने आस पास के व्यक्तियों, जानवरों, पौधों, पक्षियों, सभी के सुखों या तकलीफों के प्रति संवेदनशीलता. या उनके दुःख को महसूस करने की लगातार कोशिश हमें ये क्षमता दे देती है कि हम हाव भाव, शब्द, और प्रतिक्रियाओं से सामने वाले व्यक्ति का चरित्र और मंशा पहचान सकते हैं. और यह क्षमता पारिवारिक सामाजिक और व्यावसायिक रिश्तों में जादुई असर करती है.

किसी के अंतर्मन को यदि आप पढ़ सकते हैं तो उसे अपना बनाने में वक़्त नहीं लगेगा।या आप किसी बुरी मंशा वाले व्यक्ति से सतर्क भी हो सकते हैं.

पहले तो ये समझ लें कि संवेदनशील व्यक्ति सिर्फ दुःख ही नहीं महसूस करता. खुशी भी पूरी शिद्दत से महसूस करता है. संवेदन शीलता बढ़ाने का आसान उपाय हमारे सोचने के तरीके में छुपा हुआ है.

पहला तरीका तो ये कि हमें उस सच को स्वयं को फिर से और बार बार याद दिलाना होगा जिसे हम ज़िन्दगी के नशे में भूले हुए होते हैं.

वो सच ये है कि हम सिर्फ और सिर्फ इस वृहद प्रकृति के एक बिंदु से भी छोटे हिस्से मात्र हैं. जैसे प्रकृति के फूल हैं, जानवर हैं, पक्षी हैं, हम भी वैसा ही कुछ हैं. हम एक नश्वर जटिल रासायनिक प्रक्रिया से ज़्यादा कुछ भी नहीं. हम परमाणुओं के एक गुच्छे से ज़्यादा कुछ भी नहीं. इस नश्वर पृथ्वी के नश्वर लेकिन जीन्स और परमाणुओं के रूप में कभी न नष्ट होने वाले प्राणी हैं. नश्वर भी और अमर भी. फिर डर कैसा. नफरत कैसी. घमंड कैसा.

जब हम एकात्मकता हासिल करते हैं अपनी सोच में प्रकृति के प्रति तो प्रकृति हो या व्यक्ति हों सब आपके ही हो जाते हैं. सारी प्रतियोगिता ख़त्म घृणा ख़त्म और भावों में प्रेम उपजता है. फूल भी और आप भी दोनों ही परमाणुओं के गुच्छे. लोग (परमाणुओं के दूसरे गुच्छे) पढ़ लेते हैं इस प्रेम और उससे उत्पन्न भावों को.

3. मुश्किल व्यक्तियों से सामंजस्य:

हम सभी को कभी न कभी मुश्किल व्यक्तियों के संपर्क में रहना होता है. दरअसल इन मुश्किल व्यक्तियों का EQ बेहद कम होता है. इसलिए वे अपने और औरों के दुःख का कारण बनते हैं.

ये एक ऐसी समस्या है जो कि हम में से अधिकांश लोगों के जीवन का हिस्सा है. किसी के जीवन में ये मुश्किल व्यक्ति पति है, पत्नी है,बहू है, सास है, कोच है, छात्र है, बॉस है, आपका कर्मचारी है या साथ में काम करने वाला व्यक्ति.
ज़्यादा EQ वाले लोग बेहतर ढंग से इनसे पार पा लेते हैं. और अपने लिए मानसिक शांति रचनात्मकता, लोकप्रियता और तरक़्क़ी ला सकते हैं.

क्या करें इन मुश्किल व्यक्तियों के रहते भी शांत और सुखी रहने के लिए मै कुछ आसान उदाहरण से समझाता हूँ:

आपने कुछ फिल्में ऐसी देखी होंगी जहाँ आपको किसी विलेन जैसे काम करने वाले चरित्र से भी सहानुभूति हुई हो. जैसे शाहरुख़ खान, सनी देओल और जूही चावला की फ़िल्म डर.

उसकी वजह ये है कि फिल्मों में हमें उस विलन का पूरा बैकग्राउंड, बचपन, तकलीफें सब कुछ दिखता है. हमें justification पता होता है कि वो क्यों बुरा बना. और ये justification हमारी नफरत को सहानुभूति में बदल देता है.

लेकिन असल जीवन में हम सिर्फ उस व्यक्ति के उस कर्म या उस अन्याय या दुर्व्यवहार को देख पाते हैं जो वो हम से कर रहा है. बैकग्राउंड या फ़्लैश बेक तो होता नहीं. और फिर हम कोसते हैं उसे और स्वयं को भी कि क्यों इसी से शादी कर ली, क्यों ये जॉब ज्वाइन कर लिया वगैरह.

करना ये है कि यदि मुश्किल व्यक्ति जीवन का हिस्सा ही हो और उससे अलग न हुआ जा सकता हो तो जब वो दुर्व्यवहार करे तो बस इतना सोचें कि वो पीड़ित है खुद अपने दिमाग और अपनी ज़िन्दगी से. उससे सहानुभूति रखिये नफरत नहीं.

4. दिनचर्या:

EQ बढ़ाने के उपायों का अहम् हिस्सा है व्यायाम एवं खेल कूद. इससे मस्तिष्क में खुशी के रसायन स्त्रावित होते हैं. जिन्हें endorphins कहा जाता है.

साथ ही आपका जो भी व्यवसाय हो उससे निकल कर बीच बीच में मस्तिष्क की बैटरी को चार्ज कीजिये अपनों के साथ समय बिताकर. रचनात्मक होना अच्छे EQ वाले व्यक्ति की आदत होती है.

कुछ न कुछ सीखते रहना, कुछ बनाना, कुछ रचना, कुछ बांटना, ज़िंदगी का अर्थ स्वयं से ऊपर जा कर औरों के लिए समझना ज़्यादा EQ होने के लिए ज़रूरी है.

5. अच्छी पुस्तकें, कोई रचनात्मक व्यक्ति, प्रेरक वक्ता, एक अच्छा शिक्षक, सेमिनार भी EQ बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं.

6. Perfection:

मैं अपने दोस्तों से हमेशा कहता हूँ क़ि मैं perfectly imperfect हूँ.

हर काम में या अपने इर्द गिर्द हर वक़्त perfection मत तलाशिये या अपेक्षा रखिये. थोड़ी सी गलती, थोड़ी सी कमी की अपनी सुंदरता होती है. जो लोग perfectionist होते हैं वे अपने और अपने आसपास के लोगों के लिए तनाव/stress का कारण बन जाते हैं. हर गलती पर रियेक्ट मत करिये.
जाने भी दो यारों एक अच्छा जुमला है.

7. focus : लक्ष्य निर्धारित करना और सतत प्रयास करना.

स्वयं की भावनाओं पर सतत नज़र की वजह से ज़्यादा EQ वाले लोग अपना लक्ष्य निर्धारित कर पाते हैं. ये जानना ही अपने आप में सफलता की पहली अहम् सीढ़ी होती है कि हम क्या चाहते हैं. क्या करना या क्या बनना चाहते हैं. या किस लिए बने हैं.

और ये जान लेने पर वे स्वतः प्रेरणा से, ज़्यादा लगन से उस लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए सफलता पाते हैं.

लेकिन सबसे अहम् बात EQ बढ़ाने के लिए जो है वो ये है कि – ये निर्णय लिया जाये कि मुझे अपनी भावनात्मक बुद्धिमत्ता में सतत् इजाफा करना है. मार्ग खुद मिल जायेंगे चलने की इच्छा का होना ज़्यादा ज़रूरी है.

आपका
।।डॉ अव्यक्त।।

Reference: दुनिया की सारी किताबें जिस किताब से ली गयीं उसी किताब से निकली हैं ये बातें.

‘ज़िंदगी की किताब’

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