तेजोमहालय-7: शाहजहाँ के राजा जयसिंह के नाम फरमान के साक्षात सबूत

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शाहजहाँ का राजा जयसिंह के नाम फरमान

(२०.९.१५३२)
हिन्दी अनुसाद

मुहर
अबुल मुजफ्फर शिहाब अलदीन मुहम्मद साहिब ए किरान सानी, शाहजहाँ पादशाह गाज़ी सुपुत्र नूरअलदीन जहाँगीर पादशह गाज़ी सुपुत्र अकबर पादशाह सुपुत्र हुमायूँ पादशाह सुपुत्र बाबर पादशाह सुपुत्र उमर शेख मिर्जा सुपुत्र सुल्तान अबू सईद सुपुत्र सुल्तान मुहम्मद मिर्जा सुपुत्र मीरान शाह सुपुत्र अमीर तैमूर साहिब ए किरान.

तुगरा
अबुल मुजफ्फर शिहब अलदीन मुहम्मद साहिब ए किरान सानी शाहजहाँ पादशाह गाजी का समानों में उत्तम और भद्र, गर्वित कुलीनता से तथा समकालीनता का ध्यान देने योग्य एवं अनुग्रह का पात्र, सच्चा, राजभक्त, अनुरक्त सेवक राजा जयसिंह के नाम राजकीय आदेश पत्र (फरमान)

प्रतिष्ठित किया गया तथा राजकीय अनुग्रह के द्वारा पदोन्नत को ज्ञात हो कि हमने मुल्कशाह को नई खानों (कान ए जुदीद) से सफेद संगमरमर लाने के लिये आमेर भेजा है. और हम एतद्‌द्वारा आदेश देते हैं कि आवश्यक संखया में पत्थर काटने वाले (संगबर) और किराये की गाड़ियाँ (अराबा ए किराया) पत्थर लादने के लिये जिनकी उपरोक्त मुल्कशाह को आवश्यकता पड़े, को राजा उपलब्ध करायेगा.

और पत्थर काटने वालों का वेतन तथा गाड़ियों के किराये की व्यवस्था वह राजकीय कोषागार (तहवीलदार) की राशि के करेगा.

यह आवश्यक है कि कुलीनता का गर्वित समकालीन (राजा) मुल्कशाह को इस मामले में हर प्रकार से सहायता करे और वह इसे अति आवश्यक समझे तथा इस आदेश (के परिपालन) में भूल न करें.

लिखा गया तारीख २८ शनिवार, इलाही वर्ष ५, ५, रवि अल अव्वल १०४२ हिजरी

तदनुसार २० सितम्बर सन्‌ १६३२

राजस्थान राज्यलेखागार बीकानेर क्र. २६ (पुराना ३८)

शाहजहाँ का राजा जयसिंह के नाम दूसरा फरमान

(३ फरवरी सन्‌ १६३३)
भगवान महान है.

मुहर
अबुल मुजफ्फर शिहाब. अलदीन मुहम्मद साहिब ए किरान सानी, शाहजहाँ पादशाह गाजी सुपुत्र नूर अलदीन जहाँगीर पादशाह गाजी, सुपुत्र अकबर पादशाह सुपुत्र हुमायूँ पादशाह सुपुत्र बाबर पादशाह सुपुत्र उमर शेख मिर्जा सुपुत्र सुल्तान अबू सईद सुपुत्र सुल्तान मुहम्मद मिर्जा सुपुत्र मीरान शाह सुपुत्र अमीर तैमूर साहब ए किरान

तुगरा
अबुल मुजफ्फर शिहाब अलदीन मुहम्मद साहिब ए किरान सानी शाहजहाँ पादशाह गाजी की समानों में उत्तम और भद्र, कुलीनता से गर्वित तथा समकालीनता का ध्यान देने योग्य एवं अनुग्रह का पात्र सच्चा, राजभक्त अनुरक्त सेवक राजा जयसिंह के नाम राजकीय आदेश-पत्र (फरमान).

प्रतिष्ठित किया गया तथा राजकीय अनुग्रह द्वारा पदोन्नत को ज्ञात हो कि इस्लाम के साम्राज्य स्थल अकबराबाद तक इमारतों (बा इमारत हा) के लिये सफेद संगमरमर लाने के लिये बड़ी संख्या में गाड़ियों की आवश्यकता है, और इससे पूर्व भी एक प्रतिष्ठित एवं कल्याणकारी राजकीय आदेश जो समानों में श्रेष्ठ के नाम भेजा गया था, इस सम्बन्ध में.

इस समय अधिक महत्व देने के लिये हमने सय्ययद इलाहादाद को आमेर तथा अन्य स्थानों को जाने के लिये, जिनका विवरण इसके पृष्ठ पर टिप्पणी (दिम्न) में दिया है, तथा आवश्यक संख्या में किराये पर गाड़ियाँ (अराबा ए किराया) सूची में दिये गये प्रत्येक जिले के लिये नियोजित करने के लिये नियुक्त किया है और राजा ने पहले जितनी गाड़ियों का उन स्थानों से सफद संगमरमर मकराना की खानों से लाने के लिये प्रबन्ध किया हो, उनका पूर्ण योग में नियोजन कर वह शेष (गाड़ियों) को उपरोक्त (सय्यद इलाहादाद) को उपलब्ध करा दे जिनको वह मकराना खानों तक सुरक्षित ले जायेगा.

और यह अति आवश्यक है कि यदि किसी विषय पर उपरोक्त (सय्यद इलाहादाद) कुलीनों में श्रेष्ठ के पास जाय तो राजा हर प्रकार की सहायता और सहयोग देते हुए, कठोर परिपालन दर्शाते हुए और इस विषय में सभी सम्भव सावधानी बरते और न तो इस आदेश की अवज्ञा करें और न भूल.

लिखा गया १५ बहमन, इलाही वर्ष ५
२३ रजब१०४२ हिजरी
राजस्थान राज्य-लेखागार बीकानेर क्र ३५ (पुराना ४६)

आदेश-पत्र के (पिछले) पृष्ठ पर टिप्पणी

प्रशासनिक जिले……………………………………………………………………………………………………………….. ९

गाड़ियों (अराबा) की संखया २३०

परगना :-

१. आमेर-उपरोक्त राजा जयसिंह की जागीर १०
२. मुइज्ज़ाबाद-उपरोक्त राजा जयसिंह की जागीर २५
३. फगुई-उपरोक्त राजा जयसिंह की जागीर २५
४. झाग-उपरोक्त राजा जयसिंह की जागीर २५
५. नरैना-उपरोक्त राजा जयसिंह की जागीर ४०
नरैना-राजा भोजराज की जागीर ३०
नरैना-रारजा गिरधर दास की जागीर १०
६. रोशनपुर-राजा बेंतमल की जागीर १०
७. जाबनेर-राजा चेतसिंह की जागीर १०
८. महरोत-रोजा बेथलदास की जागीर ३०
९. परबतसर-राजा गजसिंह सुपुत्र बिहारीदास कछवाहा की जागीर १५

शाहजहाँ का राजा जयसिंह के नाम तीसरा फरमान

(२८.१२.१६३३)
हिंदी अनुवाद
हजरत-ए-आला

इस प्रतिष्ठित आज्ञा-पत्र (फरमान) द्वारा ज्ञात हो, जो प्रसन्नता से अंकित है, जिसे प्राप्त हुआ है सम्मान प्रकाशित होने का तथा प्रतिष्ठा घोषणा की, कि वह हवेलियाँ जिनकी व्याखया पृष्ठांकन (दिम्न :पृष्ठ के पीछे) में है, अपने साथ की परिसम्पत्तियों सहित, जो प्रतिष्ठित राजकीय सम्पत्ति हैं, को प्रस्तावित किया जाता है, राजा जयसिंह को, एक गर्वित सरदार एवं इस्लाम के शासक के दास, और इन्हें उनको दिया जाता है, उस हवेली के बदले में जो पहले राजा मानसिंह की थी, जिसे उस कुलीन भद्र पुरुष ने स्वयं की सहमति एवं इच्छा से प्रेरित हो महारानी, जो संसार की भद्रतम महिला थी, जो अपने समय की श्रेष्ठ महिलाओं की महिला थी, जिसे आदम एवं हौआ की सुपुत्री होने का सम्मान प्राप्त था, जो अपने समय के सतीत्व के विशाल आकार को रक्षक थी, वह संसार की राबिया, वह शुद्धता संसार की तथा धर्म की, दैवी दया एवं क्षमा की प्राप्त करने हारी, मुमताज महल बेगम के मकबरे के लिये दान कर दिया.

और यह (फरमान) प्रभवी होगा सभी वर्तमान तथा भविष्य के शासकों, अधिकारियों (आमिल), अधीक्षकों (मुतसद्दियान) प्रतिनिधियों तथा निरीक्षकों (मुशरिफ) पर। इस प्रतिष्ठित महान आदेश को पूर्ण रूप से परिपालन कर उनके स्वामित्व में वर्णित हवेलियाँ दे दें। तथा उस उदारता के योग्य को उसके परिपूर्ण स्वामित्व के बारे में सूचित करें। इसके अतिरिक्त वे किसी प्रकार अथवा किसी रूप में कोईभूल या बाधा खड़ी न करें ओर न ही उन्हें किसी आदेश-पत्र अथवा विधिपत्र की आवश्यकता पड़े और वे न भटकें और न इस आदेश को भूलें ओर न ही इसके सही रूप से परिपालन में असफल हों.

आज की तारीख में लिखा गया, ७वाँ दिन दाय के मास का, इलाही वर्ष ६, तनदुसार २६ जुमादिल आखिर १०४३ हिजरी.

आदेश पत्र का पीछे का पृष्ठ

रविवार दाय मास की २८ तारीख, इलाही वर्ष ६,

तदनुसार १४ रजब १०४३ हिजरी। (लगभग १५ जनवरी सन्‌ १६३४) यह रिसाला जुमलात उल मुल्क का…… सरकार का तथा राज्य के पोषण का, महानता का विश्वास ….. और राज्य कार्यों का व्यस्थापक, राज्य का सर्व समर्थ कार्यवाह (जुमलत अल मुल्क) विशिष्ट मामलों के प्रधान आधार (मदार अल महम : प्रधान मंत्री) अल्लामी फाहमी अफजल खान; और वह मन्त्रिपद का आश्रय तथा उत्तम भाग्य एवं खयाति का आधार मीर जुमला और वह मंत्रि पद का आश्रय मकरामत खान और दीवानी का अधिपति, नौकरी में सबसे छोटा मीर मोहम्मद,

सदा मान्य आदेश-पत्र (फरमान), सूर्य के समान तेजस्वी और आकाश के समान ऊँचा, जारी किया गया.

वह हवेलियाँ, अपनी परिसम्पत्तियों सहित जो प्रतिष्ठित राजकीय सम्पत्तियाँ हैं, बदले में उस हवेली के जो राजाजयसिंह की है, जिसे राज्य के उस स्तम्भ (उमदार अल मुल्क) ने द्युतिमान मकबरे की खातिर अपनी इच्छा एवं आकांक्षा के वशीभूत हो उपहार स्वरूप दान कर दिया (पेश कश नामूदन्द), उस राजा को हमारी ओर से दिया जाता है और उनके पूर्ण स्वामित्व को स्थापित किया जाता है.

प्रमाणीकरण के रूप में यह प्रस्ताव (याददाश्त) लिखित में किया जा रहा है और टिप्पणी (शराह) जुमलात अल मुल्की मदान अल महामी अफजल खान (की हस्तलिपि में) ‘इसे समाचार पुस्तक में लिखा जाय।’ एक ओर टिप्पणी जुमलात अलमुल्की की हस्तलिपि में ‘स्वर्गीय शाहजादा खानम की हवेली जो उक्त राजा को दी गई थी की पुष्टि की जाती है.

मन्त्रिपद के आश्रयदाता तथा उत्तम भाग एवं खयाति के प्रधान आधार मीर जुमला (की हस्तलिपि में टिप्पणी) ‘जैसा विशेष रूप से जुमलात अल मुल्की मदार अल महामी के अनुस्मारक (बारी साला) में कहा गया है, ‘इसे घटना (वाकिया) पुस्तक में लिखा जाय।’ घटना लेखक (वाकिया नवीस) की हस्तलिपि में हाशिये पर टिप्पणी, ‘इसे घटना पुस्तक में दर्ज कर लिया गया.’

एक और टिप्पणी जुमलात अलमुल्की मदार अल महामी अल्लामी फाहमी (की हस्तलिपि), ‘इसे पुनः प्रस्तुत किया जाये.’

एक टिप्पणी राज्य दरबार के प्रियपात्र हकमी मुहम्मद सादिक खान (की हस्तलिपि में), ‘इसको मंगलवार को पूज्यनीय की सूचना के लिये प्रस्तुत किया जाय.’

एक अन्य टिप्पणी राज्य दरबार के उस प्रिय पात्र शासन गुरगानी के आधार,न्याय नियम के बांधने हारे, उच्चपदस्थ सामन्तों के आदर्श, संसार के शिष्टजनों मेंउत्तम, जुमलात अल मुल्की मदार अल महामी अल्लामी फाहमी अफजल खान (की हस्तलिपि में), ‘एक उच्च-मान प्रतिष्ठायुक्त आज्ञा-पत्र जारी किया जाये.’

परिसम्पत्तियों की सूची
१. राजा भगवान दास की हवेली।
२. राजा माधौसिंह की हवेली
३. रूपसी बैरागी की हवेली मुहल्ला अतगा खान के बाजार में स्थित।
४. चाँद सिंह सुपुत्र सूरज सिंह की हवेली अतगा खान के बाजार में स्थित।

मौलिक सत्य प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित।
मुहम्मद के धार्मिक संहिता का चाकर।
अबुल बरकात।
सत्यापन तथा मुहर
जयपुर सिटी पैलेस कपाट द्वार का संग्रह
के. डी. क्रमांक १७६/आर. कपाट द्वार संग्रह जयपुर के अभिलेखों की सूची देखें। राष्ट्रीय रजिस्टर निजी अभिलेख क्र. १ भाग १. (भारत के राष्ट्रीय लेखागार दिल्ली १९७१)
जी. एन. भूरा एवं चन्द्रमणि सिंह, ऐतिहासकि अभिलेखों का सूचीपत्र कपाट द्वार जयपुर।
(जयपुर-जयगढ़ पब्लिकचैरिटेबल ट्रस्ट १९८८ ई.)

शाहजहाँ का राजा जयसिंह के नाम फरमान
(१ जुलाई सन्‌ १६३७)
हिन्दु अनुवाद
भगवान्‌ महान है।

मुहर

अबुल मुजफ्फर शिहाब अलदीन मुहम्मद साहिब ए किरान सानी शाहजहाँ पादशाह गाजी सुपुत्र नूर अलदीन जहाँगीर पादशाह गाजी सुपुत्र अकबर पादशाह सुपुत्र सुल्तान मुहम्मद मिर्जा सुपुत्र मीशन शाह सुपुत्र अमीर तैमूर साहिब ए किरानं

तुगरा

अबुल मुजफ्फर शिहाब अलदीन मुहम्मद साहब ए किरान सानी शाहजहाँ पादशाह गाजी का समानों में उत्तम और कुलीन, ध्यान देने एवं अनुग्रह के योग्य, सच्चा, राजभक्त, अनुरक्त, उच्च वंश (खाना जाद), सेवक जो इस्लाम का आज्ञाकारी है के नाम राजकीय आज्ञा पत्र (फरमान).

प्रतिष्ठित कियागया तथा राजकीय अनुग्रह के लिये आशान्वित को ज्ञात हो कि हमारे प्रशंसित एवं पूजनीय ध्यान में लाया गया है कि अति कुलीन के कर्मचारी आमेर तथा राज नगर क्षेत्र में पत्थर काटने वालों को एकत्र कर रहे हैं, फलस्वरूप मकराना में कोई भी पत्थर काटने वाला नहीं पहुँच रहा है, फलतः वहाँ पर कम काम हो रहा है.

अस्तु हम आदेश देते हैं कि समकालीनों में श्रेष्ठ एवं भद्र अपने आदमियों पर कठोर प्रभाव डालें कि वे किसी प्रकार भी आमेर एवं राजनगर मेंपत्थर काटने वालों को एकत्र न करें और जो भी पत्थर काटने वाले उपलब्ध हों उन्हें राजकीय प्रतिनिधियों (मुत्सदि्‌दयान) के पास मकराना भेज दें और इस विषय में जैसी भी आवश्यकता हो निश्चित कार्यवाही करें और इस आदेश की न अवज्ञा करें और न ही भूलें और इसे अपना दायित्व समझें.

लिखा गया आज के दिन, तीर के नवें महीने में, इलाही वर्ष १०, तदनुसार ७ वाँ दिन सफर मास का। इसकी समाप्ति सुन्दर ढंग तथा विजय से हो-हिजरी का १०४७ वर्ष।

राजस्थान राज्य लेखागार बीकानेर क्र. ३५ (पुराना) ४६

शाहजहाँ के फरमान

अब तक आपको भली-भाँति ज्ञात हो चुका है कि बादशाहनामा के अनुसार हिज़री १०४१ में सम्राज्ञी का शव बुरहानपुर से आगरा लाया गया था. उसी पुस्तक के अनुसार उसे अगले वर्ष हिजरी १०४२ तदनुसार सन्‌ १६३२ में मिर्जा राजा जयसिंह से प्राप्त हुए ‘भवन’ में दफन कर दिया गया था. इस भवन (ताजमहल) को पीटर मुण्डी ने २५/०/१६३३ को आगरा से प्रस्थान करने से पूर्व देखा था तथा आगरा के उस समय के दर्शनीय स्थलों यथा अकबर का मकबरा, किला आदि की श्रेणी में भी रखा था. मनरिक ने भी ताजमहल सन्‌ १६४० में देखा था तथा मजदूरों को सड़क बनाते, बाग में काम करते एवं स्वच्छ जल की व्यवस्था करते पाया था. परन्तु अधिक विश्वसनीय कहे जाने वाले टैवर्नियर ने सन्‌ १६४० में ताजमहल को पाया ही नहीं तथा सौभाग्य से उसके सामने ही इस भवन (ताजमहल) का बनना प्रारम्भ हुआ था.

टैवर्नियर अपनी छः यात्राओं में अन्तिम पाँच में भारत आया था. यह यात्राएँ उसने निम्न रूप में की थीं –
१. सन्‌ १६३१-३३ इस्पहान-बगदाद-सिकन्दरिया-माल्टा-इटली
२. सन्‌ १६३८-४३ अलेप्पो-परशिया-भारत (आगरा-गोलकुण्डा) (नवम्बर १६४० में आगरा आया)
३. सन्‌ १६४३-४९ भारत-जावा-केप आदि (आगरा नहीं आया)
४. सन्‌ १६५७-६२ भारत (आगरा नहीं आया)
५. सन्‌ १६६४-६८ भारत (नवम्बर १६६५ में आगरा आया)

ऊपर लिखित आधार पर स्पष्ट है कि टैवर्नियर आगरा में सन्‌ १६४० में पहली बार तथा सन्‌ १६६५ में दूसरी बार आया था. यदि टैवर्नियर पर विश्वास करने वाले सत्य हैं तो ताजमहल के बनने का काल सन्‌ १६४० से सन्‌ १६६५ हुआ अर्थात्‌ २५ वर्ष. यदि यह काल सत्य हो तभी यह स्वीकार किया जा सकता है कि टैवर्नियर ने ताजमहल का बनना, प्रारम्भ होना तथा परिपूर्ण होना स्वयं देखा था. इसके लिये एक ही वाक्य कहना पर्याप्त होगा कि सन्‌ १६५८ में ही शाहजहाँ को उसके क्रूर पुत्र औरंगजे़ब ने बन्दी बना लिया था तथा वह सन्‌ १६६५ तक तो क्या अपनी मृत्यु-पर्यन्त कारागार में ही रहा था. अतः शाहजहाँ द्वारा सन्‌ १६६५ तक ताजमहल बनाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

शाहजहाँ द्वारा ताजमहल बनाये जाने के पक्ष में एक अन्य अत्यन्त पुष्ट प्रमाण दिया जाता है, उसके द्वारा जारी किये गये ‘फरमान’. यह फरमान सम्राट्‌ शाहजहाँ ने मिर्जा राजा जयसिंह के नाम जारी किये थे तथा इन फरमानों की फोटोप्रति ताजमहल स्थित संग्रहालय (नक्कारखाना) में रखी हुई हैं. पुरातत्व विभाग के प्रकाश में इनका विस्तृत विवरण लिखा हुआ है.

शाहजहाँ द्वारा जारी किये गये मात्र चार फरमान आज उपलब्ध हैं (जिनमें से तीन का विवरण यहाँ पर दो अध्यायों में दिया जाएगा). इन फरमानों को पढ़ने से ज्ञात होता है कि यह फरमान अपने में परिपूर्ण हैं तथा इनके अतिरिक्त सम्भवतः कोई अन्य फरमान जारी नहीं किया गया था. वास्तवकिता यह है कि यदि शाहजहाँ ने स्वयं ताजमहल बनवाया होता जैसा कि कहा जाता है, उस दशा में शाहजहाँ द्वारा सैकड़ों फरमान जारी किये गये होते, यथा ताजमहल के लिये अभिकल्प मांगने के लिये, किसी एक अभिकल्प की स्वीकृति का, ताजमहल बनाने के लिये अधिकारी की नियुक्ति, अनेक देशों से बहुमूल्य रत्नों के आयात सम्बन्धी आदि-आदि. प्रतिदिन की क्रय की गई सामग्री का विवरण आदि अनेक पर्चियाँ जारी हुई होतीं तथा उनका विवरण तत्कालीन साहित्य में
मुल्ला अब्दुल हमीद लाहोरी,
मुहम्मद अमीना काजबिनी (पादशाह नामा),
मुहम्मद सलीह कम्बू (अमल-ए-सलीह)
इनायत खान (शाहजहाँनामा)
मुहम्मद वारिस (बादशाह नामा)
मुहम्मद सादिक (शाहजहाँनामा)
मुहम्मद शरीफ हनफी (मजलिस-उस-सुल्तान)
द्वारा अपने ग्रन्थों में अवश्य लिखा जाता. परन्तु सम्पूर्ण रूप से प्राप्त, विषय में परिपूर्ण इन फरमानों के अतिरिक्त कोई अन्य अभिलेख अथवा पुर्जा भी जारी न होना आश्चर्यजनक ही नहीं शाहजहाँ द्वारा ताजमहल का निर्माण न किये जाने के पक्ष में प्रबल प्रमाण है.

उपयुक्त तीन फरमान शाहजहाँ ने राजा जयसिंह, जो आमेर (आधुनिक जयपुर) के शासक थे तथा जिनके राज्य के अन्तर्गत मकराना नामक स्थान पर सफेद पत्थर (संगमरमर) की खाने हैं, के नाम जारी किये गये थे. इन तीनों का मूल विषय मकराना से ताजमहल के लिये संगमरमर भेजने की व्यवस्था करना है.

जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि इस पूरे घटनाक्रम की तिथियों पर विद्वान एक मत नहीं है. यद्यपि तिथियों के व्यतिक्रम के कारण हमारे लेखन का विषय-वस्तु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है, परन्तु इन फरमानों की तिथियों की गड़बड़ी के कारण एक बहुत बड़ा भ्रम उत्पन्न हो गया.

मुगल दरबार की परम्परा के अनुसार फरमानों पर तारीख मुसलमानी महीने तथा हिजरी दिये गये हैं. इन तारीखों का ईसवी महीना तथा सन्‌ इतिहासकारों ने गणना करके निकाला है. इस गणना में कहीं पर भारी भूल हुई जिसके कारण पहला फरमान दूसरा हो गया तथा दूसरा फरमान पहला स्वीकार कर लिया गया. यद्यपि दोनों फरमानों की भाषा लगभग एक ही है. इस कारण इस भूल से कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ना चाहिए था, परन्तु दूसरे फरमान में शाहजहाँ ने लिखा था, ‘और इससे पूर्व भी एक प्रतिष्ठित एवं  कल्याणकारी राजकीय आदेश (शाही फरमान) जो समानों में श्रेष्ठ (राजा जयसिंह) के नाम इस सम्बन्ध में भेजा गया था.’

इस प्रकार दूसरे फरमान को पहला मान लेने के कारण उपरोक्त भाषा इस तथाकथित पहले फरमान में होने के कारण यह मान लिया गया कि इन तीनों फरमानों से पहले भी शाहजहाँ द्वारा एक अन्य फरमान भी इस विषय पर राजा जयसिंह को भेजा गया था. पर्याप्त खोज के पश्चात्‌ भी जब चौथा (पहला) फरमान नहीं मिला तो उसे लुप्त हो गया मान लिया गया.

जब मैंने इस विषय पर खोज की तो फारीस तारीखों के अनुसार यह सिद्ध हो गया कि वास्तव में दूसरा मान लिया  गया फरमान ही पहला है तथा पहला फरमान वास्तव में दूसरा है. इस प्रकार दूसरे फरमान में यह सत्य ही लिखा है कि इससे पूर्व भी आपको इस विषय पर लिखा जा चुका है. इस सत्य खोज के पश्चात्‌ हिन्दी में पहली बार इन फरमानों का अक्षरशः अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ.

tajmahal_pharman shahjahan to raja jaisingh Agra
शाहजहाँ के राजा जयसिंह के नाम फरमान के साक्षात सबूत

प्रथम फरमान
‘……….ज्ञात हो कि हमने मुल्कशाह को नई खानों से सफेद संगमरमर लाने के लिये आम्बेर (आमेर) भेजा है. और हम एतद्‌ द्वारा आदेश देते हैं कि आवश्यक संख्या में पत्थर काटने वाले और किराये की गाड़ियाँ पत्थर लाने के लिये जिनकी उपरोक्त मुल्कशाह को आवश्यकता पड़े, को राजा उपलब्ध करायेगा. और पत्थर काटने वालों का वेतन तथा गाड़ियों के किराये की व्यवस्था वह राजकीय कोषागार की राशि से करेगा. यह आवश्यक है कि राजा मुल्कशाह को इस मामले में हर प्रकार से सहायता करे और वह इसे अति आवश्यक समझे तथा इस आदेश के परिपालन में भूल न करें.’
लिखा गया तारीख २८ शनिवार, इलाही वर्ष ५
४ रवि अल अव्वल १०४२ हिजरी. दि २० सितम्बर सन्‌ १६३२.

दूसरा फरमान
‘…. ज्ञात हो कि अकबराबाद तक इमारतों के लिये सफेद संगमरमर लाने के लिए बड़ी संख्या में गाड़ियों की आवश्यकता है, और इससे पूर्व भी एक प्रतिष्ठित एवं कल्याणकारी राजकीय आदेश …………………… ………. आपके नाम भेजा गया था; इस सम्बन्ध में, इस समय अधिक महत्व देने के लिये हमने सय्यद इलाहादाद को आमेर तथा अन्य स्थानों को जाने के लिये जिनका विवरण इसके पृष्ठ पर टिप्पणी में दिया है तथा आवश्यक संख्या में किराये पर गाड़ियाँ सूची में दिये प्रत्येक भवन के लिये नियोजित करने के लिये नियुक्त किया है, और राजा ने पहले जितनी गाड़ियों का उन स्थानों से सफेद संगमरमर मकराना की खानों से लाने के लिये प्रबन्ध किया हो, उनका पूर्ण योग में नियोजन कर शेष (गाड़ियों) को उपरोक्त (सय्यद इलाहादाद) को उपलब्ध करा दे जिनको वह मकराना खानों तक सुरक्षित ले जाएगा.

और यह अति आवश्यक है कि यदि किसी विषय पर उपरोक्त (सय्यद इलाहादाद) राजा के पास जाये तो राजा हर प्रकार की सहायता और सहयोग देते हुए, कठोर परिपालन दर्शाते हुए ओर इस विषय में सभी सम्भव सावधानी बरते और न तो इस आदेश की अवज्ञा करें और न भूल.’
लिखा गया १५ बहमन, इलाही वर्ष ५
२३ रजब १०४२ हिजरी दिनांक ३ फरवरी सन्‌ १६३३.

[इस दूसरे फरमान के पृष्ठ पर नौ प्रशासनिक जिलों यथा आमेर, मुइज्जाबाद, फगुई, झाग, नरैना, रोशनपुर जाबनेर, महरोत तथा परबतसर से २३० गाड़ियों की व्यवस्था का विवरण है. साथ ही दिये गये जिले राजा जयसिंह की जागीर के अतिरिक्त राजा भोजराज, राजा गिरधर दास, राजा बेंत मल, राजा चेत सिंह, राजा बेथलदास तथा राजा राजसिंह सुपुत्र बिहारी दास की जागीरों के हैं.]

तीसरा फरमान
‘…….ज्ञात हो कि हमारे ध्यान में लाया गया है कि आपके कर्मचारी आमेर तथा राजनगर में पत्थर काटने वालों को एकत्र कर रहे हैं. फलस्वरूप मकराना में पत्थर काटने वाले नहीं पहुँच रहे हैं. फलतः वहाँ पर कम काम हो रहा है. अस्तु.

हम आदेश देते हैं कि आप अपने आदमियों पर कठोर प्रभाव डालें कि वे किसी प्रकार भी आमेर एवं राजनगर में पत्थर काटने वालों को एकत्र न करें और जो भी पत्थर काटने वाले उपलब्ध हों उन्हें राजकीय प्रतिनिधियों के पास मकराना भेज दें. ओर इस विषय में निश्चित कार्यवाही करें और इस आदेश की न अवज्ञा करें और न ही भूलें और इसे अपना दायित्व समझें.’
लिखा गया आज के दिन तीर के नवें महीने में, इलाही वर्ष १०
७वां दिन सफर मास का, इसकी समाप्ति सुन्दर ढंग से तथा विजय से हो-हिजरी १०४७ वर्ष. १ जुलाई सन्‌१६३७.

उपरोक्त फरमानों को पढ़कर मेरे वह पाठक मित्र अवश्य ही रोमांचित हो उठे होंगे जिनका अभी भी यह विश्वास है कि ताजमहल का निर्माता शाहजहाँ ही था. क्यों न हो? इन फरमानों में मकराना की खानों से संगमरमर पत्थर लाने के लिये दो अधिकारियों की नामित नियुक्ति की बात कही गई है. ताजमहल संगमरमर से बना है, तथा इन फरमानों में संगमरमर को राजधानी अकबराबाद (आगरा) लाने की बात ही कही गई है.

आइये इन फरमानों की सूक्ष्म समीक्षा करें.
फरमानों की समीक्षा के लिए अगले अंक का इंतज़ार करिए….

जारी …
– प्रतुल वशिष्ठ जी के ब्लॉग से साभार

(आगरा निवासी पंडित कृष्ण कुमार पाण्डेय जी जो अब 80 (लेख 2010-11 में लिखे गए हैं) वर्ष से अधिक आयु के हैं. उनके ‘ताजमहल’ विषयक शोध को क्रमवार देने का मन हो आया जब उनके विचारों को पढ़ा. सोचता हूँ पहले उनके विचारों को ज्यों का त्यों रखूँ और फिर उनके जीवन पर भी कुछ प्रकाश डालूँ. जो हमारी सांस्कृतिक विरासत पर से मिथ्या इतिहास की परतों को फूँक मारकर दूर करने का प्रयास करते हैं प्रायः उनके प्रयास असफल हो जाया करते हैं. इसलिए सोचता हूँ उनकी फूँक को दमदार बनाया जाए और मिलकर उस समस्त झूठे आवरणों को हटा दिया जाए जो नव-पीढ़ी के मन-मानस पर डालने के प्रयास होते रहे हैं. तो लीजिये प्रस्तुत है पंडित कृष्ण कुमार पाण्डेय जी के शब्दों में ….. ताजमहल की असलियत … एक शोध –  प्रतुलजी)

तेजोमहालय-1 : और जब ताजमहल के बंद दरवाज़े खुले तो सामने आई ये असलियत

तेजोमहालय – 2 : बादशाहनामा में शाहजहाँ ने खुद दिए थे प्रमाण, राजा मानसिंह के भवन में दफनाया था मुमताज़ को!

तेजोमहालय-3 : शाहजहाँ ने कभी नहीं कहा उसने बनवाया ताजमहल, फिर किसने की इतिहास से छेड़छाड़?

तेजोमहालय-4 : टैवर्नियर की मनगढ़ंत कहानी

तेजोमहालय-5 : पढ़िए शाहजहाँ द्वारा ताजमहल पर किये खर्चे का विस्तृत हिसाब और जानिये सच्चाई

तेजोमहालय-6 : एक झूठ को छुपाने के लिए बोले गए हज़ारों झूठ

(नोट: लेख में दी गयी जानकारियाँ और फोटो प्रमाण राष्ट्रहित के लिए एवं भारत की जनता को अपने वास्तविक इतिहास के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से अन्य websites से साभार ले रहे हैं. यदि इनके उपयोग से सम्बंधित वेबसाइट मालिक को आपत्ति हों तो कृपया सूचित करें. हम उसे तुरंत हटा लेने के लिए वचनबद्ध हैं. धन्यवाद ) 

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