तेजोमहालय-6 : एक झूठ को छुपाने के लिए बोले गए हज़ारों झूठ

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भाग -1, भाग – 2, भाग – 3, भाग -4, भाग – 5  से आगे —

अन्य विदेशियों ने क्या देखा?

आपने पढ़ा कि कुरान के लेखक अमानत खाँ शीराजी ने कुरान लेखन सन्‌ 1639 में पूरा कर लिया था. अर्थात्‌ ताजमहल सन्‌ 1631 तक कम से कम कुरान लेखन की ऊँचाई तक तो बन ही चुका था. उसके पश्चात्‌ ताजमहल  के चारों ओर बनाया गया ईंटों का मचान हटा दिया गया होगा, क्योंकि इसके ऊपर जाने के लिये भवन के अन्दर ही जीना बना हुआ है.

इसके लगभग एक वर्ष बाद टैवर्नियर इस देश में आया था. उस समय तक ताजमहल पूरा हो चुका था अथवा कम से कम कुरान लिखे भाग तक तो पूरा हो ही चुका था. मचान हटाया ही जा चुका था. उसने सुना कि मचान बनाने पर जितना व्यय हुआ उतना सम्पूर्ण कार्य (कुरान लेखन) पर भी नहीं हुआ, अस्तु उसके द्वारा ‘कहा जाता है’ लिखना स्वाभाविक ही था. (इट इज सेड दैट दि स्काफोल्डिंग एलोन कॉस्ट मोर दैन दि एनटायरवर्क).

यदि टैवर्नियर ने सन्‌ 1640 में मचान बना हुआ स्वयं देखा होता तो उसकी लेखन शैली कुछ इस प्रकार होती ‘मैंने देखा कि’ (उसे) इतना बड़ा मचान बनाना पड़ा कि उस पर आया व्यय मुख्य भवन से भी अधिक था’. मुख्य भवन इसलिये कि टैवनिर्यर के भक्तों के अनुसार टैवर्नियर का तात्पर्य पूरे ताजमहल के बनने से था, और सही भी है. 22 वर्ष में पूरा ताजमहल ही तो बनेगा. कुरान लेखन तो 8 वर्ष में ही हो गया था.

पर यह सत्य नहीं है कि टैवर्नियर ने पूरा ताजमहल बनते देखा था. सत्य यह है कि ताजमहल को टैवर्नियर ने बना बनाया कुरान युक्त देखा था. ऊपर के आख्यान से सिद्ध है कि कुरान लेखन टैवर्नियर के आगमन से एक वर्ष से भी पूर्व समाप्त हो चुका था. कुरान लेखन की ऊँचाई के ऊपर मुख्य गुम्बज है, परन्तु इस गुम्बज का बनना कुरान लेखन के बाद प्रारम्भ नहीं हुआ था अपितु उससे पहले, बहुत पहले बन चुका था. कैसे?

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इस बादशाहनामा पर ध्यान दीजिए. पृष्ठ 403 की पंक्ति क्र. 36, 37 तथा 38 के अनुसार ‘उस आकाश चुम्बी बड़ी समाधि के अन्दर’ ……… ‘उस महान्‌ भवन में गुम्बज है’………’जो आकार में बहुत ऊँचा  है’……….’वा इमारत ए आलीशान वा गुम्बजे’…. आदि आदि. अर्थात्‌ जिस समय सम्राज्ञी के शव को दफन किया गया उस समय ‘आकाश चुम्बी उस महान भवन पर गुम्बज था जो आकार में बहुत ऊँचा था.’ तथा रानी के शव को दफन कब किया गया था?

अगले वर्ष. देखिये उसी पृष्ठ की पंक्ति 35 अर्थात्‌ सन्‌ 1042 हि. तदनुसार सन्‌ 1632  की जुलाई या उसके बाद.टैवर्नियर ने मात्र 20 सहस्र कार्मिक कार्यरत बताये हैं, परन्तु कितने कर्मचारी क्या-क्या काम कर रहे थे, यह नहीं बताया है. इसके विपरीत सेबेस्टियन मनरिक का कथन अधिक स्पष्ट, सटीक एवं अधिकार पूर्ण प्रतीत होता है.

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कार्मिकों में उसे, अधिकारी, ओवरसियर एवं कारीगर मिले वे बगीचे, मार्ग, जल आदि के कार्य में लगे थे. इस प्रकार सन्‌ 1940 में मनरिक ने ताजमहल देखा तो उस समय ताजमहल के बाहर (मुख्य भवन से दूर) कार्य चल रहा था. कारीगरों में कोई भी फूल पत्ती बनाने वाला, पत्थर की कटाई या बेल बूटा बनाने वाला या कुरान लिखने वाला या राजमिस्त्री मनरिक को नहीं मिला था. इसके साथ ही मनरिक ने मुख्य भवन तो क्या किसी भी भवन को बनते हुए नहीं देखा.

पाठकों की जिज्ञासा को शान्त करने के लिये यह स्पष्ट कर दूं कि से बेस्टियन मनरिक एक पुर्तगाली मिशनरी था तथा वह आगरा 24 दिसम्बर 1640 को आया था तथा यहाँ पर 20 जनवरी 1641 तक रहा था. एक अन्य जर्मन यात्री अक्टूबर सन्‌ 1638 में आया था, परन्तु उसे ताजमहल के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है. उसका नाम जे. ए. डी मैनडेल्सलो था. इसने किले का विस्तृत वर्णन किया है. आगरा नगर तथा यहां की गतिविधियों का भी उसने विस्तार से वर्णन किया है.

एक अन्य अंग्रेज जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी का कर्मचारी था, पीटर मुण्डी, वह सन्‌ 1631-1633 में आगरा आया था. वह 1 जनवरी 1631 से 17 दिसम्बर 1631; 16  जनवरी 1632 से 6 अगस्त 1632 तथा 22 दिसम्बर 1632 से 25 फरवरी 1633 तक आगरा में रहा. 17 जून सन्‌ 1631 को महारानी का देहान्त बरहानपुर में हुआ था. इस वर्ष वह आगरा में ही था, परन्तु रानी के देहान्त का समाचार आगरा आने के बारे में अथवा किसी राजकीय शोक के बारे में कुछ ने कुछ नहीं लिखा है.

8 जनवरी 1632 को रानी का पार्थिव शरीर आगरा लाया गया था. 16 जनवरी 1632 को मुण्डी पुनः आगरा आ गया था,परन्तु इस बारे में भी वह मौन है. पीटर मुण्डी के अनुसार शाहजहाँ आगरा में 1 जिल्हाज सन्‌ 1041 हिजरी तदनुसार 1 जून सन्‌ 1632 को आया था. यह 1041 हि. का अन्तिम मास था और बादशाहनामा में लिखे अगले वर्ष के अनुसार रानी के शव को जुलाई में अथवा उसके बाद दफनाया गया होगा.

पीटर मुण्डी के बारे में विशेष बात यह है कि वह लिखता है कि आगरा में देखने योग्य वस्तुएं हैं, अकबर का मकबरा, किला, ताजमहल तथा बाजार. है न आश्चर्यजनक. पीटर मुण्डी 25 फरवरी 1633 को आगरा से चला गया था, परन्तु साथ में ताजमहल की मधुर स्मृति भी ले गया था. अध बने नहीं, पूरे बने ताजमहल की स्पष्ट सिद्ध है कि ताजमहल 25 फरवरी 1633 तक बन चुका था. बनने का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि 1 जनवरी 1631 से 25 फरवरी 1633 तक लगभग कुछ मासों को छोड़ कर वह आगरा में ही था. इस बीच ताजमहल के बनने की कोई कार्यवाही यदि हुई होती तो वह अवश्य लिखता.

20 जून 1631 को सम्राज्ञी के देहान्त के पश्चात्‌ 25 फरवरी 1633 तक के 1 वर्ष 8 मास के समय में ताजमहल बन कर खड़ा हो गया, ऐसा तो केवल अलादीन के चिराग से ही सम्भव है, अन्यथा आज के मशीनी युग में भी 20 हजार तो क्या 20 लाख व्यक्ति लगाने पर भी इतने कम समय में ताजमहल का निर्माण सम्भव नहीं है. बादशाहनामा के अनुसार जुलाई 1632 में (1 जून 1632 को शाहजहाँ के आगरा आगमन के बाद) रानी के शव को ‘बने हुए भवन में’ दफन किया गया था जिसे पीटर मुण्डी ने भी बनी हुई दशा में देखा था. बाद में सन्‌ 1640 में टैवर्नियर ने भी देखकर लिखा ‘कहा जाता है’… आदि.

इस प्रकार स्पष्ट है कि ताजमहल को शाहजहाँ ने बनवाया नहीं था अपितु राजा  मानसिंह के भवन में दफनाया था जो उसने उनके पोते राजा जयसिंह से लिया था. अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि सन्‌ 1631-32 के बाद तो अनेक विदेशियों ने ताजमहल देखा जिसमें से कइयों ने तो उसे बनते हुए भी देखा, चाहे उसे मैं कुरान लिखना मात्र मान रहा हूँ. यदि ताजमहल रानी के देहान्त के पूर्व भी था तथा इसी दशा में था तो किसी अन्य विदेशी यात्री ने भी देखा होता अन्यथा यही सिद्ध होगा कि ताजमहल को सम्राज्ञी का शव दफन करने के बाद ही बनाया गया था.

आइये डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का लेखा देखें. फ्रांसिस्को पालसेर्ट उनका मुख्य अधिकारी आगरा में सन्‌ 1620 से 1627 तक था. वह स्थानीय भाषा में पारंगत था. उसने सन्‌ 1626 में एक रिपोर्ट बनाई थी. इस रिपोर्ट में वह आगरा का वर्णन निम्न प्रकार से करता है- इस नगर की चौड़ाई-लम्बाई का अनुपात बहुत कम है. इसका कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति नदी के किनारे ही बसना चाहता है. फलतः नदी के सामने अनेक भवन उच्चाधिकारियों के बने हैं, जिसके कारण यह भाग अत्यन्त सुन्दर एवं मनोरम हो गया. इसका विस्तार 6 कोस व 3 1/2 हालेन्ड किमी अथवा 10 1/2 ब्रिटिश मील है.

मैं इनमें से मुख्य भवनों का वर्णन क्रमानुसार कर रहा हूँ. उत्तर दिशा की ओर से प्रारम्भ करते हुए जो महल हैं, वे हैं बहादुर खान, राजाभोजराज 1, इब्राहिम खान, रुस्तम कन्धारी, राजा किशनदास, इतिगाद खान 2, शहजादाखानम 3, गौलजेऱ बेगम, खवाजा मुहम्मद थक्कर, खवाजा बन्सी, बजीर खान, योग फोरा (एक विशाल बाड़ा जिसमें स्वर्गीय सम्राट अकबर की विधवायें निवास करती हैं)  एहतिबारखाँ, बागड़ खान, मिर्जा अबू सगील, आसफ खान, इतिमादउद्‌दौला, खवाजा अब्दुल हसन, रुचिया सुल्तान बेगम के.इसके पश्चात्‌ किला है.

किला पार करने के पश्चात्‌ नक्खास है, जो बड़ा बाजार है इसके आगे के भवन ऊँचे ओहदेदारों के हैं जैसे, मिर्जा अब्दुला, आगरा नूर, जहान खान, मिर्जा खुर्रम, राजा बेतसिंह4, स्वर्गीय राजामान सिंह, राजा माधौसिंह 5. नदी के दूसरे छोर पर स्थित है नगर सिकन्दरा. सुन्दर बना हुआ जिसमें अधिकांश बनिया व्यापारी रहते हैं. क्या अब किसी को शंका रह जाती है कि सन्‌ 1626 में किले से आगे राजा मानसिंह का महल था, जो शाहजहाँ के राज्याभिषेक से 2 वर्ष पूर्व तथा सम्राज्ञी के देहान्त के 5 वर्ष पूर्व की रिपोर्ट में उल्लिखित है. 1 से 4 : यह नाम शाहजहाँ के फरमानों में आये हैं.

अगले भाग में हम आपको शाहजहाँ द्वारा जारी फरमानों के सबूत दिखाएंगे… जिससे आपको उपरोक्त सारी बातें सुस्पष्ट हो जाएँगी.

जारी …
– प्रतुल वशिष्ठ जी के ब्लॉग से साभार

(आगरा निवासी पंडित कृष्ण कुमार पाण्डेय जी जो अब 80 (लेख 2010-11 में लिखे गए हैं) वर्ष से अधिक आयु के हैं. उनके ‘ताजमहल’ विषयक शोध को क्रमवार देने का मन हो आया जब उनके विचारों को पढ़ा. सोचता हूँ पहले उनके विचारों को ज्यों का त्यों रखूँ और फिर उनके जीवन पर भी कुछ प्रकाश डालूँ. जो हमारी सांस्कृतिक विरासत पर से मिथ्या इतिहास की परतों को फूँक मारकर दूर करने का प्रयास करते हैं प्रायः उनके प्रयास असफल हो जाया करते हैं. इसलिए सोचता हूँ उनकी फूँक को दमदार बनाया जाए और मिलकर उस समस्त झूठे आवरणों को हटा दिया जाए जो नव-पीढ़ी के मन-मानस पर डालने के प्रयास होते रहे हैं. तो लीजिये प्रस्तुत है पंडित कृष्ण कुमार पाण्डेय जी के शब्दों में ….. ताजमहल की असलियत … एक शोध –  प्रतुलजी)

तेजोमहालय-1 : और जब ताजमहल के बंद दरवाज़े खुले तो सामने आई ये असलियत

तेजोमहालय – 2 : बादशाहनामा में शाहजहाँ ने खुद दिए थे प्रमाण, राजा मानसिंह के भवन में दफनाया था मुमताज़ को!

तेजोमहालय-3 : शाहजहाँ ने कभी नहीं कहा उसने बनवाया ताजमहल, फिर किसने की इतिहास से छेड़छाड़?

तेजोमहालय-4 : टैवर्नियर की मनगढ़ंत कहानी

तेजोमहालय-5 : पढ़िए शाहजहाँ द्वारा ताजमहल पर किये खर्चे का विस्तृत हिसाब और जानिये सच्चाई

(नोट: लेख में दी गयी जानकारियाँ और फोटो प्रमाण राष्ट्रहित के लिए एवं भारत की जनता को अपने वास्तविक इतिहास के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से अन्य websites से साभार ले रहे हैं. यदि इनके उपयोग से सम्बंधित वेबसाइट मालिक को आपत्ति हों तो कृपया सूचित करें. हम उसे तुरंत हटा लेने के लिए वचनबद्ध हैं. धन्यवाद ) 

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