वामपंथ समझना आपके बूते की बात नहीं, खुद को हास्यास्पद मत बनाईये!

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लेखन के क्षेत्र में हूँ तो कई साहित्यकारों, पत्रकारों, संपादकों और प्रकाशकों को अच्छी तरह जानता हूँ. ये स्वाभाविक है. और चूंकि यहां वामपंथियों का कब्जा है तो इसका मतलब ही है कि इनमें से अधिकांश पक्के वामपंथी होंगे. ऐसे में जब वामपंथियों को अच्छी तरह से जानता हूँ और पहचानता भी हूँ तो इनके द्वारा वामपंथ को समझता भी होंगा.

इस पर जब कोई यह कहे कि, “वामपंथ समझना आपके बूते की बात नहीं है, अपने को हास्यास्पद मत बनाईये मनोज जी।”… तो मुझे इस पर हंसी आना भी स्वाभाविक है.

आखिरकार किसी के चरित्र को आप कैसे जानेंगे? उसके कर्मों से. व्यक्ति हो या विचार, उसके व्यक्तित्व या विचारवाद को उसके चाल चलन से ही जाना जाता है. बाकी वो अपने लिए क्या कहता है कोई मायने नहीं रखता.

वैसे ये कहना एक बड़ा हथियार है कि आप हमें नही समझते. लेकिन जब लोग आप को अच्छी तरह समझ रहे हों तो यह कह कर लोगों को भ्रमित करने की यह अंतिम चाल होती है. यह प्रयास कुछ समय तक कुछ एक पर तो शायद चल भी जाए फिर एक समय के बाद बच्चा बच्चा भी जान जाता है कि आप की हकीकत क्या है.

वैसे भी किसी को कार्ल मार्क्स के ग्रन्थ को समझने की जरूरत क्या है. यह दीगर बात है कि एक लेखक होने के नाते मैंने कोशिश की और सच में कुछ नही समझ पाया, सिवाये इसके कि यह पूंजीवाद के खिलाफ है और सर्वहारा के पक्ष में खड़ा दिखने की कोशिश करता है, साथ ही गरीब मजदूर के हक़ की लड़ाई की बात करता है.

यह सब सुनने में अच्छा लगता है कि आप गरीब के लिए संघर्ष की बात करते हैं. मगर आप का उद्देश्य सिर्फ लड़ाई लड़ना है या गरीब की गरीबी दूर करना?

क्योंकि लड़ाई तो ठीक है मगर सिर्फ लड़ कर तो गरीबी दूर नहीं हो सकती. हाँ लड़ कर सत्ता हासिल की जा सकता है मगर गरीबी दूर करने के लिए आप के पास योजना होनी चाहिए, विचार होने चाहिए, सरल शब्दो में कहें तो आप इसे कैसे हासिल करेंगे इस पर एक रोड मैप होना चाहिए. मगर वो आप के पास नही है.

इसलिए जब-जब और जहां-जहां आप सत्ता में आये वहां गरीब की गरीबी कम होने की जगह बढ़ी ही है. इस का उदाहरण आप के शासित राज्यों में देखा जा सकता है, क्योंकि आप ने मजदूरों को सिर्फ हड़ताल करना सिखाया.

ठीक है, अपने हक़ के लिए काम रोकना एक सीमा तक तो ठीक हो सकता है मगर काम रोक कर आखिर में किसका नुकसान होगा, ये आप ना समझ सके ना जान सके.

पूंजीपति तो कहीं और पैसा लगा कर मेहनत करके कमा लेगा मगर जिस मजदूर को आपने हड़ताल करना सिखा दिया वो काम करने को राजी नहीं और सिर्फ हड़ताल से किसी का पेट नही भरता. अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिये कर्म करना पड़ता है.

आप देख लीजिये, उन सारे कारखानों को जहां भी यूनियन का वर्चस्व रहा है, वहाँ क्या हालात हैं, अधिकांश कारखाने बंद हैं या बंद होने के कगार पर हैं और अगर चल भी रहे हैं तो सरकार के भरोसे, जहां नागरिकों के टैक्स का पैसा खर्च किया जाता है. मगर वो भी कब तक और एक दिन कर्ज बढ़ता चला जाता है और कारखाने के साथ-साथ राज्य भी भुगतता है.

आप ने किसान को जमींदार के खिलाफ तो किया लेकिन उसे हल जोतने के लिए कभी प्रेरित नही किया. और बिना हल जोते फसल नही लगती. आप ने कभी मेहनत करने की शिक्षा नही दी. ऐसे में खेतों में कारखानों में उत्पादन कम होता है. और ऐसा होने का सबसे अधिक असर गरीब पर ही पड़ता है.

अगर कारखाने बंद हो गए तो इसका असर मजदूर पर तो पड़ा लेकिन उन पर नहीं जो इस हड़ताल के नेता थे क्योंकि इनके बच्चे उन्ही देशों में पढ़ने रहने भेज दिए गए हैं जहां पूंजीवाद है.

यह दोगलापन है. यह दोगलापन बस इतना ही नहीं बल्कि वामपंथियों के स्वभाव में है. ये आजादी की बात करेंगे मगर कभी किसी को आजादी नहीं देंगे. इनके ट्रेड यूनियन से लेकर राजनैतिक पार्टी में देख लीजिए कितना प्रजातंत्र है? कहीं नहीं, फिर चाहे हिंदुस्तान हो या कोई और देश.

उलटे जहां-जहां भी इनकी सरकार है वहाँ तानाशाही है. जहां किसी को ना बोलने की आजादी है ना लिखने की. लेकिन ये आजादी के नारे खूब लगाते हैं. और जब सत्ता में आ जाते हैं तो सबसे ज्यादा जुल्म भी मजदूर और गरीब पर करते हैं.

काम करवाने के लिए यही लोग कैसी-कैसी यातनाएं देते हैं यह छन-छन कर ही बाहर आ पाता है क्योंकि स्वतन्त्रता की कोई भी संस्था इनके राज में नही ज़िंदा रह सकती.

ये हमेशा सत्ता विरोध की बात करते हैं लेकिन इनकी सत्ता में किसी भी तरह के विरोध करने की किसी को इजाजत नही होती. और जब ये विरोध में होते हैं तो दिन-रात विरोध करते रहते हैं. फिर चाहे कोई शासक और उसकी कोई योजना देश समाज और गरीब के हित में ही काम क्यों ना कर रही हो.

इनका अंध विरोध जब देश, समाज और मानवता के हित के विरोध तक चला गया तो लोगों में इनके विरोध में आक्रोश पनपने लगा. और ये हर जगह जनता की नजरों में तेजी से गिरने लगे.

इतिहास गवाह है, जनता के सामने कोई भी कुछ नही, एक से एक तानशाह आये और मिट्टी में मिल गए. यह इस परिस्थिति को समझ नहीं पा रहे और बौखलाहट में जाने क्या-क्या कर रहे हैं, बोल रहे हैं, कुतर्क करते हैं.

आप किसी भी वामपंथी से आराम से तर्क पूर्ण बात करने की कोशिश कीजिये वो कभी नहीं करेगा. हमेशा किसी ना किसी तरह उलझाने की कोशिश में रहेगा. और अगर अंत में उसकी बात न बन पाई तो यही कहेगा कि आप को कुछ नहीं समझ आता.

वामपंथ अमूमन हिन्दू विरोधी भी है. क्यों? क्योंकि हिन्दू व्यवस्था प्रजातान्त्रिक है. और लोकतंत्र में इन्हें विश्वास नही.

ये हिन्दू व्यवस्था की छोटी-बड़ी हर बुराइयों की बात तो करेंगे मगर उसके हल के लिए कोई रास्ता नहीं सुझाएंगे. क्योंकि समस्या का हल निकालना इनकी आदत में नही. लेकिन वही दूसरे तरफ हर उस संप्रदाय और विचार के समर्थन में खड़े पाए जाएंगे जो इनकी तरह ही कट्टर हो.

इनका विरोध यहां भी दोगला ही रहता है. यह धर्म के विरोध में अधर्म करने को तैयार रहते हैं. और व्यवस्था के विरोध में यह वहाँ तक चले जाने में भी परहेज नही करते जहां से अव्यवस्था शुरू होती है.

कानून का विरोध करते करते खुद ही गैर कानूनी काम की इजाज़त ले लेते हैं. इन सब के चक्कर में राज्य और राष्ट्र का इनका विरोध अराजक, अधर्मी और असामाजिक होते हुए अमानवीय भी हो जाता है.

जनता इतनी भी बेवकूफ नहीं, जितनी ये समझते हैं या बनाने की कोशिश मे रहते हैं. इनकी बातें जितनी अव्यवाहरिक होती हैं, उतनी ही इनकी नीतियां भी होती हैं और उतने ही ये स्वयं में अव्यवाहरिक होते हैं.

आप इन्हें लाख अपना दोस्त बनाने की कोशिश करें, यह आप के साथ किसी भी कीमत पर ना दोस्ती रखेंगे ना ही आप को और आपकी बातों को पसंद करेंगे. उनके व्यक्तित्व की यह कट्टरता उनके विचारधारा की कट्टरता के कारण है.

कॉमरेड आँखे खोल कर देखो, आप की विचारधारा अब अप्रसांगिक भी हो गई है और अब जब भी तुम किसी मज़दूर गरीब की स्वतन्त्रता और हक़ की बात करते हो तो हंसी का पात्र भी बन जाते हो. इसलिए हास्यास्पद कौन है देखो कॉमरेड, आँख खोल कर देखो.

देशी कॉमरेड, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. अपनी आंखो से देखो और समझो कि तुम कैसे एक विश्व षड्यंत्र में एक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहे हो. मज़दूर और गरीब तक समझ चुका है मगर तुम्हारी आँखें अब तक बंद हैं.

उन आँखों को खोलो, जागो, उठो और समझो, और लाल सलाम की जगह इस राष्ट्र के ध्वज को सलाम करो और नमन करो इस पावन भूमि को, जो विश्व शांति की बात करती है, जो अधर्म के विनाश की बात करती है, वो बात करती है विश्व के हर मानव के कल्याण की.

श्री कृष्ण का विरोध करते हो तो करते रहो, गीता पसंद नहीं तो कोई बात नहीं, मगर कर्मयोगी तो बन ही सकते हो, क्योंकि बिना कर्म के भोजन खा भी नहीं सकते और पचा भी नहीं सकते.

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