तुम महिला हो और इनको ललकार भी रही हो, फिर भी सम्मान की आशा!

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‘फ़तेह का फ़तवा’ के पिछले एपिसोड में एक मौलाना आये थे, मुफ्ती एज़ाज़ कासमी. ये ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य भी है. तारेक फ़तेह ने जैसे ही इनसे कुछ सवाल किया, ये बजाये उस सवाल का जवाब देने के तारेक फ़तेह की बेटी नताशा फ़तेह पर बेहूदा कमेंट करने लगे.

कहने लगे कि तुम्हारी बेटी गैर-मुस्लिम शख्स ‘क्रिस’ के साथ बिना शादी के रह रही है और उससे बच्चे पैदा कर रही है और तुम यहाँ मुस्लिम मआशरे में इस्लाह की बात कर रहे हो.

उस मुफ़्ती द्वारा तारेक फ़तेह की बेटी का जिक्र इस बेहूदे तरीके से करने के बाद मेरी दिलचस्पी बढ़ गई कि नताशा के खिलाफ ये गुस्सा क्या सिर्फ उसके गैर-मुस्लिम से शादी करने की वजह से है या इसके साथ और भी वजहें जुड़ी हैं?

मेरी आशंका सही निकली, तारेक फ़तेह की बड़ी बेटी नताशा भी अपने पिता की तरह पत्रकार है और अपने मज़हब के कट्टरपंथ पर खूब लिखती और बोलती हैं.

2009 में अपने कुछ साथियों के साथ अर्जेंटीना घूमने गई नताशा ने ब्यूनस आर्यस के किंग फहद मस्जिद देखने के बाद अपने अनुभवों को CBC न्यूज़ नेटवर्क पर साझा किया और उसे साझा करते ही अपने बाप की तरह कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गई.

किंग फहद मस्जिद के अपने अनुभव बयान करते हुए नताशा ने बताया था कि कैसे ये जानने के बाद कि वो मुस्लिम है, उसे हिजाब पहनने पर मजबूर किया गया, उससे कहा गया कि अगर उसके पांव की अंगुली भी दिखेगी तो उसे मस्जिद में घुसने नहीं दिया जायेगा.

नताशा लिखतीं हैं कि उसने बहुत सभ्य और संस्कारित वस्त्र धारण किया हुआ था पर तब भी ये वहां के इमाम को नागवार गुजरा. नताशा अपने 50 से 60 साथियों के ग्रुप में थीं.

उसके अलावा वहां सब गैर-मुस्लिम था पर हिजाब पहनने के लिये सिर्फ उसे बाध्य किया गया और उसके साथ ऐसा सिर्फ इसलिये किया गया क्योंकि वो मुसलमान थी. नताशा के लिये अपने उन साथियों के बीच ये सब सहना बेहद अपमानजनक था.

ऐसा ही अपमानजनक व्यवहार उसके साथ इंडोनेशिया में भी हुआ जहाँ उसे हिजाब के लिये बाध्य किया गया. अपने दर्द को जिन पंक्तियों के साथ नताशा ने साझा किया, उसे यहाँ बताना जरूरी है ताकि पता चला कि बाध्यकारी परदे के पीछे की वेदना क्या होती है.

वो लिखतीं हैं – “Don’t make an example out of me in front non-Muslims just because you think you can. Treat me as somebody who is on your side, on your team. Let my behaviour and conduct dictate how you treat me, not whether you can see my hair or feet. Surely, the measure of a Muslim woman cannot be reduced simply to her appearance. So, I ask of these men: Let me dress the way I want and pray the way I want, and shake my hand when I extend it. And please keep your black, itchy cloaks for yourselves.”

तारेक फ़तेह तो मर्द हैं उनकी गुस्ताखी के लिए उन्हें कट्टरपंथी दो मिनट के लिये माफ़ भी कर सकते हैं पर नताशा तुम महिला हो और इनको ललकार भी रही हो, आईना भी दिखा रही हो और फिर उम्मीद भी कर रही हो ये तुम्हें सम्मान देंगे… ऊपर से तब, जब तुमने किसी काफिर ‘क्रिस’ से निकाह किया हुआ है?

मुफ्ती एज़ाज़ कासमी ने तो तुम्हारे बारे में खुलकर अपने ख्यालों का इजहार कर दिया था, बाकी वहां तुम्हारे अपमान पर खामोश बैठे दो उलेमाओं ने तुम्हारे बारे में कुछ बोला भले न हो, पर यकीन जानो वो भी तुम्हारे बारे में वही ख्याल रखते हैं जो एजाज़ कासमी का था.

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