तीन तलाक़ के विरोध में बोलने वालों, दहेज़ प्रथा पर क्यों साध लेते हो चुप्पी!

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हम लोग कितना भी श्रेष्ठ होने का दावा कर लें लेकिन यह सारे दावे मिथ्या हैं. यह तब तक रहेगा जब तक भारतीय समाज में महिलाओं पर पुरुष प्रधान समाज द्वारा थोपी गयी कुप्रथाओ का अंत नहीं होता है.

यह एक कटु सत्य है कि आज के ज़माने में भी, जब लोग अपने को ‘आधुनिक’ कहते हुए नहीं थकते हैं, तब भी भारतीय पुरुषों द्वारा महिलाओं को धर्म और सामाजिक संस्कारों व परंपराओं की बेड़ी में बांध कर दोयम दर्जे का एहसास दिलाने से नहीं हिचकते है.

एक तरफ हम इनके पहनावे और खुलेपन को लेकर संस्कृति और मर्यादाओं को ढाल बना कर अपनी-अपनी आलोचनाओ से वार करते हैं लेकिन वहीं पर हम पुरुष कुप्रथाओं से बंधे उन पर मौन अत्याचार करने से बाज़ नहीं आते हैं.

आज भारत में जिस कुप्रथा पर सबसे ज्यादा ज्यादा बात हो रही है, वह मुसलमानों में तीन तलाक और चार विवाह को ले कर हो रही है. इसमें कोई शक नहीं है कि यह मुद्दा एक महिला के आत्मसम्मान और उसके समाज में बराबरी के हिस्से के लिए एक प्रतीक बन गया है.

यह भारत का शाश्वत सत्य है कि तीन तलाक जैसी कुप्रथा की चपेट में आकर बेसहारा हो चुकी महिलाएं धर्म की आड़ में बलि चढाई जा रही है. यह कुप्रथा एक विरोधाभास से ग्रसित है, जहाँ निकाह के वक्त शौहर और बीवी दोनों की रजामंदी की जरूरत होती है लेकिन तलाक के वक्त, इसका पूरा अधिकार पुरुष के हाथो में होता है.

“तलाक-तलाक-तलाक” यह तीन शब्द एक ही पल में एक औरत की जिंदगी तबाह कर देते हैं, जिस पर वह अधिकारविहीन-बेबस कुछ नहीं कर सकती है, क्योंकि उसे तो कोई अधिकार ही नहीं है.

महिलाओं की इज्जत के साथ हो रहा यह खिलवाड़ इस बात का द्योतक है कि पुरुषों के लिए औरत एक चीज है, जिसे वह जब चाहे, एक ही झटके में घर से बiहर फेंक कर अंधियारे में धकेल सकता है.

महिला पर हुआ अत्यचार यहीं खत्म नहीं होता है बल्कि हलाला की घृणित व्यवस्था से उसकी इज्जत की धज्जियाँ उड़ा कर, उसकी आत्मा को ही मार दिया जाता है.

यह धर्म का मामला नहीं है, यह भारत के समाज की महिलाओं का मामला है. यह एक सुखद आश्चर्य ही है कि आज भारत में तीन तलाक और चार शादी पर परिचर्चा हो रही है और भारतीय मुस्लिम महिलाओं व मुसलमानों का एक पढ़ा लिखा वर्ग इस मध्यकालीन कुप्रथा के खिलाफ बोल रहा है.

यहां मुझे जहाँ मुसलमानो में लोगों का तीन तलाक व चार विवाह का विरोध में आना समझ में आता है वही हिंदुओं द्वारा आगे बढ़-चढ़ कर इसका विरोध करना नहीं समझ में आता है.

यह हम हिन्दू लोग जो तीन तलाक व चार विवाह को क़ानून के द्वारा समाप्त करने के समर्थन में खड़े हुए हैं, क्या अपने यहां चल रही कुप्रथा पर विजय प्राप्त कर चुके है?

आज भारतीय समाज में सबसे बड़ा सामाजिक कलंक, दहेज प्रथा है. दहेज जैसी कुप्रथा न केवल हिंदुओं को संगठित होने में बाधक है बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के विकास के मार्ग में अवरोधक है. जाति के नागपाश में बंधा हिन्दू समाज, इस कुप्रथा के कारण जर्जर होता जा रहा है.

यद्यपि प्राचीन समय से ही पिता द्वारा अपनी कन्या को उपहार, इत्यादि देने का प्रचलन था तथापि इसने कुरूपता धारण नहीं की थी, किन्तु शनै-शनै: इसने विकृत स्वरूप धारण कर लिया है और यह अब ‘दहेज-प्रथा’ जैसे कलंकित नाम से ‘अलंकृत’ हो चुकी है.

आज दहेज प्रथा में इतने विकार पैदा हो गए हैं कि समाज के लिए इस कुप्रथा को वहन करना अब असंभव हो गया है. जो सामर्थ्यवान हैं वह तो अधिक से अधिक दहेज देकर निभा लेता है, परंतु जो नहीं हैं वे या तो कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं या फिर उनकी लड़कियों का विवाह ही नहीं हो पाता.

दहेज जहाँ समाज में, लड़की का पैदा होना हीनता देती है और उनको प्रताड़ित करती है वही भ्रष्टाचार को जन्म देती है. यह दहेज कि लालसा समाज में लड़के वालो को सुरसा का मुख दे देती है जिसके परिणामस्वरूप कम दहेज लाने वाली लड़कियों को, लड़के वालो के यहाँ कई प्रकार के शारीरिक व मानसिक कष्ट उठाने पड़ते और कई घरों में बहुओं को जला दिया जाता हैं या अन्य प्रकार से उनकी हत्या कर दी जाती है.

इस भयावह अपराध से हिन्दुओं के किसी वर्ग को अछूता नहीं छोड़ा है, चाहे वह अमीर हो, गरीब हो अगड़ी या पिछड़ी जाति का हो, इसमें सभी शामिल हैं.

आज जिस तरह परदे में रह रही मुस्लिम महिलाओं ने आगे निकल कर तीन तलाक, चार शादियां और हलाला जैसी कुप्रथा के खिलाफ निकल पड़ी है, वैसे ही हिन्दू लड़कियों और महिलाओं को इस दहेज ऐसी कुप्रथा के विरुद्ध आकर ऐसे वैवाहिक प्रस्तावों को नकारना होगा.

यह हमें स्वीकार करना ही होगा कि भारतीय समाज पुरुष प्रधान है जो महिलाओं को स्वेच्छा से आत्मसम्मान और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तभी देगा जब, महिलाएं अपने ‘आत्मसम्मान और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता’ के लिए खड़ी होंगी.

हम लोगों को इन कुप्रथाओं से लड़ने वालो का समर्थन करना चाहिए ताकि हिन्दू मुस्लिम लड़कियां और महिलाएं इन कुप्रथाओं के प्रभाव से मुक्त हो कर भारतीय समाज को सशक्त बनाये और भारत को सर्वश्रेष्ठता प्रदान कर सकें.

एक बात समझ लीजियेगा कि कोई भी राष्ट्र और समाज बिना अपनी महिलाओं को सशक्त किये अपने प्रारब्ध को नहीं प्राप्त कर सकता है.

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