नागाओं का रहस्य – 7 : नागा और बुद्ध से संबंधित पौराणिक कथाएँ

0
40
The_Buddha_and_Nanda_in_the_Heaven_of_the_33_Gods,_Pakistan,_San_Diego_Museum_of_Art ma jivan shaifaly making india

जैसा कि पूर्ववर्ती अध्याय में पहले ही देखा गया है कि नागा मगध देश के साथ भी संबंधित प्रतीत होते हैं. महाभारत के अनुसार, वह बर्हद्रथ राजवंश के जरसंधा का एक देश था, जो कंस का ससुर था. देश और उसके नगर राजगढ़ में नागा संघ थे.

शिशुनाग जिसने मगध पर शासन किया, बाद के समय में भी नागा राजवंश की सदस्यता लिए हुए दिखाई दिए.  शिशुनाग जिन्होंने मगध पर राज किया, को नागा बर्हद्रथ जिससे जरसंधा संबंधित थे, से स्पष्टतया भेद करने के लिए उन्हें यह नाम दिया गया.  बुद्ध और वर्धमान महावीर उनके समय के प्रसिद्ध धार्मिक अग्रणी थे और क्षेत्र के नागा लोग बड़ी संख्या में नए धर्म में सम्मिलित होते दिखाई दिए.

मगध में बुद्ध के नागा अनुयायी के बीच नागराज मुचिलिंडा थे जिन्होंने बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को आश्रय दिया और नागराज काला जिन्होंने बुद्ध के ज्ञानप्राप्ति की भविष्यवाणी की थी. नागा उर्विला तो प्रथम उपदेश के बाद ही परिवर्तित हो गए थे. कहा जाता है नागाओं ने राजगढ़ और सरस्वती के बीच गंगा पर एक पुल का निर्माण किया था.

नागा मालवा और उसके आसपास के क्षेत्रों में फैल गए थे. हैहया राजवंश के मंधत्र (Mandhatr of Haihaya) ने मौनेया गंधर्वों का नाश किया क्योंकि वे नागाओं द्वारा अत्याचार के शिकार हुए थे. परंतु बाद में हैहयाओं ने कार्कोतक नागाओं का तख्ता पलट दिया, जिनका निवास स्थान नर्मदा क्षेत्र में कहीं था, और उनसे माहिस्मती को छीन लिया . हैहया और नागाओं के बीच शत्रुता काफी लम्बी चली.

पश्चिमी डेक्कन भागों को हस्तगत कर लेने के अतिरिक्त ऐसा लगता है कि नागाओं ने पूर्वी हिस्से को भी हस्तगत कर लिया था. कहा जाता है कि रामायण में शेषनाग नाग ने अपना सिंहासन पूर्व में हासिल किया था. सीता की खोज में जब सुग्रीव ने अपनी वानर सेना को विभिन्न दिशाओं भेजा था तब कहा था कि उन्होंने बहुत अद्भुत वस्तुएँ देखीं, जैसे दूध के समुद्र के बीच खड़ा श्वेत रसभ पर्वत, ‘घोड़ी का भयानक मुख’, और उसके उत्तर में सुनहरा पर्वत. “ओह! वानर, पृथ्वी को जो सर्प थामे हुए है, वह चन्द्रमा की तरह श्वेत है, उसके नेत्र कमल के पत्तों की तरह है और वह पर्वत की चोटी पर बैठा है, और सारे देवताओं द्वारा पूजा जाता है- हजारों सिर वाला अनंत देवता जो गहरे नीले रंग के वस्त्र पहने है. तीन सिर वाला सोने का ताड़ का वृक्ष, महान व्यक्ति का ध्वज, जो अपने आधार के साथ चमकता हुआ पर्वत की चोटी पर लगा हो.”

बौद्ध कहानियों में यह उल्लेखित है कि नागराजा, कृष्ण और गौतम का अपने अपने द्वीपों से पश्चिमी सागर बौद्ध को सप्पातक में सुनने आए. जातक ब्रोच के पास एक नागा द्वीप और उसके पास एक अन्य कारद्वीप का उल्लेख करते हैं. इसके अतिरिक्त महाग्रंथों और पुराणों में सागर पार कई द्वीपों में नागाओं की उपस्थिति बताई गई है.

सदियों बाद के समय में भी, ईसाई युग के उद्गम के तत्काल पहले और बाद में  देश के विभिन्न भागों में नागा संगठनों की जनजातियों और राजवंशों की अनेक संख्या थी. उत्तर-पश्चिम में तखी और वाहला या बहलिका के दो बड़े कबीले थे. तखी तक्षक की जनजाति के रुप में मानी गई.

पुराण के अनुसार बहिलिका ने तीस सालों तक स्वतंत्र राजाओं के रुप में राज किया. कुसाना सत्ता के पतन के बाद नागाओं ने उत्तर और मध्य भारत के बहुत से भागों पर शासन किया, साहित्यिक संदर्भ के अतिरिक्त यह शिलालेख और मुद्राशास्त्रीय साक्ष्य द्वारा बहुतायत में अनुप्रमाणित है. नागा वंश ने विदिशा, कांतिपुर, मथुरा, पद्मावती, तक्षशिला, अयोध्या और अन्य कई स्थानों से शासन किया. उनके इतिहास के बारे में आगे के अध्यायों में विस्तृत से चर्चा करेंगे.

बुद्ध साहित्य में भी शाक्यमुनि के जीवन से संबंधित पौराणिक कथाओं में, नागा ब्राह्मण विद्या में एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं. परंतु बौद्ध कहानियों में, एक पक्ष ऐसा है जो ब्राह्मण साहित्य द्वारा प्रस्तुत बातों से भिन्न है. बौद्ध परंपरा में इस तथ्य पर बल दिया है कि प्राचीन देवता, यहां तक कि ब्रह्मा और शंकर अवर और बुद्ध के अधीन थे. और वही बात नागाओं पर भी लागू होती थी.

खतरनाक नाग-राक्षस को सामान्य तौर पर बुद्ध के भक्त उपासक के रूप में प्रस्तुत किया है. न तो देवता और न ही मनुष्य और न ही जानवर एक धन्य व्यक्ति के पवित्र प्रभाव का विरोध कर सकते हैं. इस प्रकार नागा भी, जो वास्तव में इन तीन प्राणी वर्गों की प्रकृति को जोड़ते हैं, उनके शब्दों से जीत जाते हैं.

महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित कहानियों में नागा प्रमुखता से रहे हैं. उनके जन्म से लेकर अंतिम विलुप्ति तक, नागा की उपस्थिति को देखा जा सकता है. ललितविस्तार में हम पढ़ते हैं कि जब रानी माया ने लुंबिनी के बगीचे में भविष्य के बुद्ध को जन्म दिया था, वहाँ दो नागराजा नंदा और उपनंदा दिखाई दिए थे, जो अपने अर्ध-शरीर के साथ हवा में खड़े थे, जिन्होंने गर्म और ठंडे पानी की दो धाराएँ उत्पन्न करते हुए बोधिसत्व को स्नान करवाया था. वही किंवदंती हियुन सैंग ने भी पुनरावृत्ति के रुप में दोहराई. इन किंवदंतीयों के दोनों स्वरूप जो महावास्तु में भी थे, बौद्ध कला में प्रस्तुत किए गए.

शाक्यमुनि के प्राकृतिक जन्म से अधिक महत्वपूर्ण उनका आध्यात्मिक जन्म (समाधि या महाबोधि) है जिससे वह एक बुद्ध या प्रबुद्ध बने.  यह महान घटना कई किंवदंतियों का केन्द्र बना, जो साहित्य और कला में सबसे प्रिय विषय है.

ललितविस्तार में इस संबंध में बताया गया है कि, जब उरुविल्वा गाँव के मुखिया की बेटी सुजाता ने बोधिसत्व को उनके लंबे उपवास के पश्चात सोने के पात्र में खीर का भोग लगाया, तब वे अपने पद प्रक्षालन के लिए ‘नागाओं की नदी’ निरंजन की ओर गए, जहाँ नागापुत्री उनके लिए रत्न जड़ित सिंहासन लेकर आई. उस सिंहासन पर बैठकर उन्होंने सुजाता का भोग ग्रहण किया और उसके बाद उस सोने के कटोरे को लापरवाही से नदी में बहा दिया.

नागराजा सागर ने उसे हस्तगत कर लिया, परंतु इन्द्र ने गरुड़ के भेष में उसे चुराने का प्रयत्न किया और असफल रहा. इंद्र ने वह पात्र नागराजा से माँगा और उसे तैंतीस भगवान वाले स्वर्ग में ले गए और उस ‘पात्र के वार्षिक उत्सव’ का निर्माण किया. नागराजा की बेटी ने उस रत्नजड़ित सिंहासन को पूजा की वस्तु के रूप में संभाल कर रख लिया.  इस प्रकरण को बोरोबुदुर के मूर्तिकला दल में अच्छी तरह संरक्षित कर लिया गया.

बोधिसत्व की निरंजना नदी से पवित्र पेड़ की ओर प्रगति, एक विजयी मार्च के रूप में वर्णित है, जिसमें एक स्वर्गीय मेजबान जिसमें नागराज काला या कलिका सम्मिलित है, ने साथ दिया. अपनी बुद्धचरिता में अश्वघोष ने इस घटना को उल्लेखित किया है.  ललितसरिता और महावास्तु भी इस प्रकरण को सामिप्य से प्रस्तुत करते हैं. भारतीय मूर्तिकला में इस घटना को उद्भूत नक्काशियों में बहुत अच्छे से प्रदर्शित किया गया है.

विनय पिताका के अनुसार ज्ञानोदय के बाद बुद्ध ने बोधि वृक्ष के आसपास के क्षेत्रों में ध्यान करते हुए कुछ सप्ताह व्यतीत किए. दूसरे सप्ताह के अंत के पश्चात उन्होंने मुचिलिंदा वृक्ष पर आश्रय लिया, जहाँ सात दिनों तक भारी वर्षा होती रही.  बुद्ध मुचिलिंदा नागराजा द्वारा संरक्षित थे, और यह किंवदंती निदानकथा, ललितसरिता और महावास्तु और बौद्ध मूर्तिकला में बताई गई है.

नागराजा इलापत्र की बुद्ध से प्रश्न पूछने वाली किंवदंती भी महावास्तु में संरक्षित है. यह कहानी तिब्बती और चीनी सूत्र में भी है और चीनी तीर्थयात्री फा-हिएन द्वारा रेकॉर्ड की गई है. यह कई ग्रेसियो-बौद्ध मूर्तिकला में भी मौजूद है. वाराणसी के हिरण के बगीचे में अपने पहले प्रवचन के पश्चात, बुद्ध उरुविला लौटे, जहाँ उन्हें उग्र नागा को वश में करने के लिए बहुत से चमत्कार करने थे. सांची और अमरावती की उद्भूत नक्काशियों में यह किंवदंती बहुत अच्छे से प्रस्तुत की गई है.

नागा और बुद्ध से संबंधित कई पौराणिक कथाएँ विभिन्न बौद्ध साहित्यिक कृतियों में बताई गई हैं. इसलिए महावग्गा और विनय पिताका बताते हैं कि कैसे एक नागा को एक बौद्ध तपस्वी के रूप में नियुक्त किया गया था. सुत्तविभंगा बताते है कि कैसे बड़े स्वागत के अधीन आम की नौका के नागाओं(naga of mango ferry) को रहना पड़ा.

बुद्ध के महान चमत्कारों में दो नागाओं नंदा और उपनंदा की भागीदारी को दिव्यनंदा में रेकॉर्ड किया गया है. वही कार्य इस बात का उल्लेख करता है कि कैसे नागराजा, कृष्ण और गौतम का धर्मोपदेश सुनने आए थे, और कैसे नागाओं की मदद से बुद्ध ने गंगा नदी पार की थी. तिब्बत में लिखी गई ‘बुद्ध का जीवन’ में नागराज, गिरिका और विद्युज्ज्वाला को बिम्बिसारा द्वारा देश निकाला दिए जाने की कहानी मिली. महावंश और दीपवंश बताते हैं कि कैसे सीलोन के नागराजा महादरा और चुलोदरा का बुद्ध ने मिलाप करवाया.

Nagas : The Tribe and The Cult (R. K. Sharma) पुस्तक का हिन्दी अनुवाद

यह भी पढ़ें

नागाओं का रहस्य -1 : उद्गम और टोटेमवाद

नागाओं का रहस्य -2 : पुराण में नागाओं का उल्लेख

नागाओं का रहस्य -3 : बुद्ध के सिर पर नाग-छत्र

नागाओं का रहस्य – 4 : स्वदेशी और आर्यन मूल

नागाओं का रहस्य – 5 : पारंपरिक इतिहास

नागाओं का रहस्य – 6 : महाभारत की कथाओं में छुपा समृद्ध इतिहास

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY