मेकिंग इंडिया गीतमाला : चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजरे वाली मुनिया…

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मन्ना डे को आम तौर पर हिंदी फिल्मों में हीरो वाले गाने नहीं मिलते थे. जब हीरो के बदले कोई और गा रहा होता था तब उनकी आवाज़ होती थी. इस गाने में भी राजकपूर और वहीदा रहमान बैठे सुन रहे हैं. राजकपूर गा रहे होते तो शायद इसे भी मुकेश ने गाया होता. जो कलाकार गाता दिख रहा है, उनका नाम कृष्ण धवन है. लोक संगीत है, शैलेन्द्र का लिखा हुआ, कोई गुलज़ार जैसे भारी-भरकम मतलब वाली लाइनें भी नहीं है. अक्सर ऐसे गीत खुशनुमा होते हैं तो ये भी खुशनुमा है, संगीत में वाद्ययंत्र, बहुत कम है. शंकर-जयकिशन ने हारमोनियम और ढोलक की थाप इस्तेमाल की है. हर पैराग्राफ के अंत में और गाने के अंत में संगीत तेज होता है.

सफ़र पे निकले हुए इंसान का गाना है तो यादें तो हैं गाने में. किसी आयातित घुमावदार जलेबी की बात नहीं होती, सीधी सादी, देसी बर्फी की मिठास है. कपड़ों की दुकान वाले बजाज का जिक्र है, पहले होते थे, अब के शहरों में बजाज भी कहीं खो गए हैं. जिस इलाके का गीत है, वहां पान का बड़ा महत्व होता है. वो भी खोता जा रहा है. अब बड़े काम का कोई बीड़ा नहीं उठाता, पान का थाल आने पर भोज की समाप्ति भी नहीं समझी जाती. साठ के दशक की मशहूर फिल्म थी “तीसरी कसम” जिसका ये गाना है. उस दौर में भी ये गाना नोस्टालजिया जगा देता होगा.

गाने में सिर्फ एक वाक्य है जो दोहराया जाता है : “पिंजड़े वाली मुनिया”. “तीसरी कसम” एक गाड़ीवान की कहानी है जो एक नाचने-गानेवाली, नौटंकी वाली, या सीधा कहें तो तवायफ को गावं के किसी मेले तक ले जा रहा है. स्टेशन से जाने और ले कर आने के रास्ते में उस से कई गलतियाँ होती हैं. सीधा सा कम बोझ सर पर लेने वाला गाड़ीवान है, हर गलती से वो सीखता जाता है. शिकायतें नहीं पालता. गाने का “चलत मुसाफ़िर” वो गाड़ीवान है जो सफ़र पर होता है.

उसे मोहने वाली “पिंजड़े वाली मुनिया”, वो तवायफ है जिसका किरदार वाहिदा रहमान निभा रही हैं. मुनिया गाने वाली चिड़िया होती है, लेकिन पिंजड़े में है, तो सबको मोहेगी, मगर गाएगी तो गाना सिर्फ मालिक के हुक्म पे होगा. सबके लिए नहीं. सीधा सादा सा गाड़ीवान पूरे रास्ते अपनी सरलता से तवायफ को अचरज में डाले होता है. उसकी आखरी यानि तीसरी कसम थी कि अगली बार कभी किसी नाचने वाली को अपनी गाड़ी में नहीं बिठाएगा.

कुछ कुछ प्रेयसी-प्रियतम जैसा गाना है. क्या ख़ास है ये बताया नहीं जा सकता. बस ख़ास है, पसंद भी…

चलत मुसाफिर मोह लिया रे
पिंजरे वाली मुनिया

उड़ उड़ बैठी हलवईया दुकनिया
बर्फी के सब रस ले लिया रे
पिंजरे वाली मुनिया…

उड़ उड़ बैठी बजजवा दुकनिया
अरे कपड़ा के सब रस ले लिया रे
पिंजरे वाली मुनिया…

जियो जियो पलकदास जियो

उड़ उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया
अरे बीड़ा के सब रस ले लिया रे
पिंजरे वाली मुनिया…
हाँ चलत मुसाफिर मोह लिया रे…

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