अलक्षेन्द्र, एलेग्ज़ेंडर, सिकंदर… मौलाना आपको सच नहीं बताएँगे

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दो दिन पहले की बात है… फैक्ट्री के सिक्यूरिटी गार्ड ने मेरे केबिन में आकर एक विजिटिंग कार्ड टेबल पर रखा. मैंने कार्ड देखा और कहा – “बुलाओ उन्हें.”

एक कोट-टाईधारी महाशय थे वो, जिनके एक हाथ में एक बैग भी था… हाथ मिलाया मैंने, बैठने का इशारा भी किया.

मार्केटिंग वालों से अक्सर पाला पड़ता रहता है. बातें शुरू हुई… जिस मकसद से वो आए थे, तुरंत ही वो बात खत्म भी हो गई, क्योंकि उनके प्रोडक्ट का हमारे यहाँ कोई इस्तेमाल नहीं था. पर विजिटिंग कार्ड पर लिखा नाम पढ़कर मेरी दिलचस्पी उनमें बढ़ गई थी.

मैंने पूछा- “तो आपका नाम सिकंदर आलम है?”

उन्होंने कहा – “जी हाँ.”

मैंने सोचा कुछ टाइम पास किया जाए तो मैंने चाय के लिए भी बोल दिया.

मैंने पूछा – “आपका नाम हिन्दुओं वाला क्यों है?”

उन्होंने कहा- “अरे नहीं साहब, ये नाम मुस्लिमों का ही होता है… सिकंदर आलम एक मुस्लिम नाम है.”

मैंने पूछा – “क्या आपने किसी हिन्दू को ये नाम रखते नहीं देखा या सुना है?”

उन्होंने कहा – “सुना तो है, पर कोई क्या कर सकता है? जिसे अच्छा लगता है वो रखता ही है… पर सिकंदर तो मुस्लिम ही था.”

अब मुझे पता चल गया कि या तो वो बेवकूफ है या फिर मुझे चक्कर दे रहा है. मैंने पूछा – “क्या आपको पता है सिकंदर था कौन और कहाँ का रहने वाला था?”

उसने कहा – “जी हाँ, वो यूनान का बादशाह था जो विश्व विजय के लिए निकला था पर भारत में नहीं आ पाया था.”

मैंने पूछा – “फिर तो ये भी पता होगा कि ये बात कितनी पुरानी है?”

उसने कहा – “अब एक्जेक्टली पता तो नहीं, पर हजारों साल पुरानी बात है.”

मैंने कहा – “अरे हुजूर, सिकंदर के मरने के हजार साल बाद तो आपके पैगंबर आए जिन्होंने इस्लाम को मजहब बनाया… फिर सिकंदर मुसलमान कैसे बना?”

अब वो थोड़ा झेंप गया था, फिर भी स्वीकार नहीं किया कि सिकंदर मुस्लिम नहीं था. फिर उसने कहा – “मैंने तो तकरीरों में सुना है कि इस्लाम सबसे पुराना मजहब है.”

मैंने कहा – “आपने जरूर ज़ाकिर नाईक के मुँह से सुना होगा, वो ही ये बातें अक्सर बोलता रहता है.”

उसने कहा – “ज़ाकिर नाईक जैसे लोगों से मैं ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखता हूँ… पर हमारे नबी आखिरी पैगंबर थे, इसका मतलब पहले भी कई आए होंगे.”

अब वो इब्राहीम, ईसा, मूसा की बातें करने लगा.

मैंने पूछा – “तो ये बताएँ कि पहले के पैगंबरों को अल्लाह ने कुरान की बातें क्यों नहीं बताई थी? अरे साहब, मैं इस्लाम की शुरुआत की टाइमिंग की बात कर रहा हूँ और आप इधर उधर की बातें कर रहे हैं.”

मैंने आगे कहा – “ग्रीस (यूनान) के लोग प्रकृति पूजक थे, अपोलो यानी सूर्य की भी पूजा करते थे. ग्रीस के लोग भी आर्य ही थे जिनका मूल भारत वर्ष ही रहा है… अन्य यूरोपियनों की तरह.”

मैंने कहा, “वे अपने साथ भारतीय संस्कृति, परंपरा, भाषा आदि साथ लेकर गए थे. हजारों वर्षों के बीतने के बाद आर्य संस्कृति का लोप होता गया परंतु सिकंदर के वक्त तक भी कई बातें समान थीं.”

मैंने उसे बताया, “सिकंदर जिसे ‘एलेग्ज़ेंडर’ कहते हैं, दरअसल उसके नाम ‘अलक्षेन्द्र’ का ही अपभ्रंश है और यह नाम भारतीय मूल का है.”

अब उसे लगा कि वो ‘सिकंदर’ नाम को डिफेंड नहीं कर पाएगा तो आखिरी बार चांस लिया… और कहा – “एलेग्ज़ेंडर को अरबी में सिकंदर कहते हैं.”

मैंने कहा – “सिकंदर अरबी नहीं बल्कि फारसी शब्द है. इसका अनुवाद फारसी में ‘सिकंदर’ ही किया गया था. जब फारस (आज के ईरान) पर ग्रीकों का शासन था तब एलेग्ज़ेंडर के जबरदस्त पराक्रम की वजह से प्रभावित होकर फारसी लोग अपने बच्चों का नाम बड़े गर्व से सिकंदर रखने लगे.”

मैंने बताया, “आगे चलकर फारसी लोगों ने इस्लाम तो कबूल कर लिया परंतु इस प्रभावशाली नाम को उन्होंने नहीं छोड़ा. उन्हीं से प्रभावित होकर भारत के मुस्लिमों में भी यह नाम रखने की परंपरा बनी रही क्योंकि इन्हें लगा कि सिकंदर “मुस्लिम” था तभी वो इतना पराक्रमी था… और विश्व विजय का अधिकारी भी माना गया तो और अन्य मुस्लिम नामों के साथ इसे भी इस्लाम में आत्मसात कर लिया गया था. यह नाम रखने में भारतीय मुस्लिम भी आत्मसंतुष्टि महसूस करने लगे थे.”

अब तक सिकंदर साहब चाय पी चुके थे, बोले – “पर ये नाम आज कल ज्यादा नहीं रखा जाता है.”

मैंने पूछा – “ऐसा क्यों? क्या आप ये बात तब कह रहे हैं जब आपको पता लगा कि सिकंदर मुस्लिम नहीं था?”

सिकंदर साहब निरूत्तर थे पर मेरी बातों से संतुष्ट नहीं दिख रहे थे… बोले – “मैं किसी मौलाना से पूछूँगा इस बारे में.”

उनसे मेरा अंतिम वाक्य था – “मौलाना आपको सच नहीं बताएँगे.”

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