वैचारिक धूर्तता है समलैंगिकता की पैरोकारी

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समलैंगिकता एक बार फिर चर्चा में है. गत वर्ष उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकता पर क्यूरेटिव (भूल-सुधार) याचिका को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंप दिया था.

तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर, न्यायमूर्ति ए.आर. दवे और न्यायमूर्ति जे. एस. खेहर की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि चूंकि ये महत्वपूर्ण मसला संविधान से जुड़ा है इसलिए इसे पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ को ही भेजना उचित होगा. हालांकि कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी करने से इंकार कर दिया.

इसका मतलब है कि पीठ पहले यह तय करेगी कि यह याचिका सुनवाई योग्य है अथवा नहीं? पहले इस मामले में 02 जुलाई 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता (आई. पी. सी.) की धारा 377 को गैर संवैधानिक बताते हुए यह निर्णय दिया था कि यदि ऐसे संबंधों के खि़लाफ़ किसी प्रकार की कार्रवाई होती है तो इसे मौलिक अधिकारों का हनन माना जायेगा.

बाद में, 12 दिसम्बर 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले को रद्द करते हुए कहा था कि आई. पी. सी. की धारा 377 को हटाने का अधिकार संसद के पास है और जब तक यह लागू है इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता है.

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि यह फै़सला समलैंगिकता को सही अथवा गलत नहीं ठहराता है और न ही किसी धार्मिक संगठन की उन दलीलों से ही इत्तेफ़ाक़ रखता है कि समलैंगिकता, संस्कृति और नैतिकता के खि़लाफ़ है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में कहा गया है कि यदि कोई वयस्क स्वेच्छा से किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करता है तो उसे आजीवन कारावास या दस वर्ष का कारावास और जुर्माने की सज़ा सुनाई जा सकती है.

कानून में अप्राकृतिक सेक्स संबंधों के लिए कड़ी सज़ा के प्रावधानों के बावजूद समाज में एक ऐसा वर्ग हमेशा से मौजूद रहा है, जो समलैंगिक है. केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दी गयी जानकारी के मुताबिक इस समय देश में समलैंगिकों की अनुमानित संख्या बीस लाख के क़रीब है, जिनमें सात प्रतिशत एच.आई.वी. संक्रमित हैं.

यहां सवाल यह उठता है कि समलैंगिकता जैसे चिकित्सीय और मनोवैज्ञानिक विषय को क्या सिर्फ़ कानूनी तर्कों के आधार पर समझा जा सकता है? कानून के अनुसार भले ही यह मामला मौलिक अधिकारों के हनन का बनता हो लेकिन इस बात से भी कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि धारा 377 के विलोपन से अवांछनीय गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हो सकती है.

कानून भले ही दोहरी जिंदगी जी रहे ऐसे मुट्ठी भर लोगों को स्वीकार कर ले, लेकिन क्या समाज उन्हें स्वीकार कर पायेगा? क्या अप्राकृतिक चीजें कभी प्राकृतिक हो सकती हैं? क्या ऐसे आचरण की ग्राह्यता हममें होगी जो हमारे नैतिक मूल्यों के साथ-साथ हमारी सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करता है?

निश्चित रूप से समलैंगिक संबंध अधिसंख्य भारतीयों के गले नहीं उतर रहा है और वे इसे मानसिक दिवालियापन तथा वैचारिक धूर्तता से अधिक मानने की स्थिति में नहीं है.

ऐसा भी नहीं है कि समलैंगिकता आधुनिक समय की कोई समस्या हो. हर देश-काल में यह मौजूद रहा और दुनिया भर में इस पर बहसें भी होती रही हैं. भारत की बात करें तो वात्स्यायन के कामसूत्र में समलैंगिकता की विशद चर्चा है. खजुराहो और अजन्ता-एलोरा की गुफाओं में उकेरे गये मूर्तिशिल्प में भी समलैंगिक संबंधों की छाप हैं.

यानि हमारे देश में ऐसे संबंध प्राचीन काल से ही मौजूद रहे हैं. बावजूद इसके, भारतीय परंपराओं में कभी भी समलैंगिक संबंधों को स्वीकार्यता नहीं मिली. समाज में हमेशा से ही स्त्री-पुरुष संबंधों को ही स्वस्थ और स्वीकार्य माना गया. हिन्दू धर्म ग्रंथ मनुस्मृति भी समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखता है.

बेशक, आज निजी स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को लेकर वैश्विक परिदृश्य में तेजी से बदलाव और खुलापन आया है. ब्रिटेन, बेल्जियम, स्वीडन, कनाडा, नीदरलैंड्स, पुर्तगाल और डेनमार्क जैसे कई देशों ने समलैंगिकता को कानूनी रूप से स्वीकार किया है. संयुक्त राष्ट्र संघ के 90 सदस्य देश समलैंगिक संबंधों के पक्ष में हैं.

ऐसे में सवाल उठना लाजि़मी है जब एक और कई देश समलैंगिकता को मान्यता दे चुके हैं या दे रहे हैं तो भारत में इस पर आपत्ति क्यों? समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग इसे नैतिकता और संस्कृति के नाम पर मौलिक अधिकारों का हनन बताते हैं. उनके लिए यह जीवन शैली से जुड़ा मसला भर है.

दरअसल समलैंगिकता की पैरोकारी करने वाले ये वो लोग हैं, जिनके लिए आयातित मानसिकता ही सब कुछ है. पश्चिम के देशों ने ऐसा किया तो हमारे यहां क्यों नहीं… यही इनके तर्क का मूल होता है. लेकिन यहां बात सिर्फ़ नैतिकता, संस्कृति और सामाजिक मान्याताओं की नहीं है. समलैंगिक व्यवहार प्रकृति विरूद्ध आचरण है. यह मनोविज्ञान और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या है. अगर ऐसा नहीं होता तो भारत की आबादी के मात्र 0.2 फीसदी लोग ही क्यों समलैंगिक होते?

वस्तुतः समलैंगिकता एक जन्मजात प्रवृति नहीं है. यह तो उस असामान्य सामाजिक ताने-बाने का एक हिस्सा है, जिसकी पीठिका में कहीं न कहीं ‘यौन-उत्पीड़न’ होता है. यह व्यवहार, निर्दोष बचपन का वह संत्रास है, जो बाद में आदत का एक हिस्सा बन जाता है.

निस्संदेह यौन सुखों की लिप्सा हर किसी में होती है और जब यह लोगों को प्राकृतिक रूप से प्राप्त नहीं होता है तब वह वैकल्पिक योनिकर्ता की भूमिका में आता है. और यहीं से शुरू होता है – यौनउत्पीड़न.

पूछिए समलिंगियों से कि क्या वे स्वेच्छा से समलिंगी बने या फिर उन्हें भी यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा? क्या उन्होंने पहली बार जो यौन उत्तेजना महसूस की वे समान लिंगी के लिए थी या फिर विपरीत लिंगी के लिए? शायद सारा सच आपके सामने होगा.

यहाँ ग़ौर करने वाली बात है कि ऐसे संबंधों की शुरूआत वहीं से होती है जहां समान लिंगी लोगों की बहुलता होती है और उनमें विपरीत लिंगियों से संवादहीनता की स्थिति होती है. संवादहीनता की यह स्थिति समान लिंग वालों को एक-दूसरे के नजदीक लाती है और धीरे-धीरे यह नजदीकी आकर्षण में बदल जाती है और अंततोगत्वा समलैंगिक संबंधों में.

और, जब विक्रम सेठ जैसे नामचीन लोग यह स्वीकार करते हैं कि वे एक समलैंगिक हैं तब उन्हें इसमें कुछ भी गलत नहीं नज़र आता और वे इस दलदल में धँसते ही चले जाते हैं. अपनी उपस्थिति समाज में दर्ज कराने के उद्देश्य से गे-परेड जैसे भद्दे आयोजन करते हैं, अपनी माँगों के समर्थन में जनहित याचिकाएँ दायर करते हैं और हद तो ये कि कभी-कभी अपनी माँगें मनवा भी ले जाते हैं.

अब ज़रा गौर कीजिए दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर, जिसमें ‘आपसी सहमति’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था. शायद फै़सला देने वाली खंडपीठ ने इन शब्दों के इस्तेमाल से पूर्व इसकी व्यापकता को भी परखना मुनासिब नहीं समझा.

अगर आपसी सहमति ही किसी अपराध के होने या न होने को निर्धारित करने लगे तो सामाजिक कुरीतियों के निवारण हेतु बनाए गए सभी कानून बेमानी हो जायेंगे.

होने दीजिए प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण और मरने दीजिए बेटियों को कोख में, चलने दीजिए दहेज प्रथा को, मत लगाम लगाइये वेश्यावृति पर, होने दीजिए बालश्रम, मत रोकिए घूसखोरी को… क्योंकि ये सब भी तो आपसी सहमति से ही होते हैं.

दुर्भाग्य हमारा कि हमारी न्यायपालिका भी अधिसंख्यकों के हितों की उपेक्षा कर, उन मुट्ठी भर लोगों के साथ खड़ी दिखती है जो आधुनिकता के नाम पर भौंडी पाश्चात्य सभ्यता, संस्कृति और जीवन-मूल्यों की तरफ़दारी करते नज़र आते हैं.

बेशक यह स्थिति हमें भोगवाद और उन्मुक्तता की उस सीमा तक ले जाएगी, जहाँ रिश्ते-नाते, सामाजिक व्यवस्थाएँ, परंपराएँ, संस्कार, मान्यताएँ और धारणाएँ मूल्यहीन हो जायेंगी, भारतीयता के संदर्भ औचित्यहीन हो जायेंगे.

स्थिति शोचनीय है. समय रहते सरकार को इस मुद्दे का सर्वमान्य हल निकालना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट भी अपने पूर्व के फ़ैसले में यह कह चुका है कि सरकार चाहे तो धारा 377 को लागू रखे अथवा इसे समाप्त कर दे.

अब यहां एक सवाल यह भी पैदा होता है कि यदि न्यायपालिका और विधायिका दोनों ही समलैंगिकता को मान्यता दे देती है तो क्या भारतीय समाज इस स्वीकार कर पायेगा? शायद नहीं.

इसलिए आज जरूरत है समलैंगिक अधिकारों की वकालत करने वाले लोगों द्वारा पूरे परिदृश्य पर एक सकारात्मक चिंतन की… प्राकृतिक और अप्राकृतिक चीजों के भेद को समझने की… सत्य को उसकी वैध जगह प्रतिष्ठापित करने की और इन सब से ऊपर एक ऐसे जीवन दर्शन को अपनाने की जिसमें सात्विकता हो और जिसके सामाजिक निहितार्थ हों.

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