चमत्कार दिखाने अब कोई नहीं आएगा, स्वयं बनना होगा अपना कृष्ण

भारत के इतिहास में… अगर प्रथम वैदिक इंद्र अर्थात कश्यप पुत्र “पुरंदर” के बाद कोई ऐसा व्यक्ति है जिसके शौर्य, बाहुबल, सूझबूझ, और राजनैतिक तथा सैन्य अभियानों की सफलता तत्कालीन विश्व में अभूतपूर्व थी तो… वो व्यक्ति एक ही है.

और वो है….. “वासुदेव कृष्ण”.

मनु वंशजों “मानवों” पर लगभग देव जाति के 3-4 हजार साल नियंत्रण के बाद… अब मानवों की शक्ति में उल्लेखनीय प्रगति हो चुकी थी. मानव राजाओं के पास कई-कई करोड़ की सेना थी…

पृथ्वी अत्यधिक जनसँख्या के कारण उपलब्ध संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से काँप रही थी. महाविनाश के हथियार देव जाति के हाथों से निकल कर मानवों को प्राप्त हो चुके थे….

निरंकुशता को प्राप्त मनुष्य अनीति के मार्ग पर चलने लगे थे. और हर तरफ अधर्म का बोलबाला था. ऐसे में जरुरत थी… “युद्ध” की. एक विश्वव्यापी युद्ध, जो शक्ति संतुलन को स्थापित करे और विश्व का पुनः वैदिक सिद्धांतों में सूत्रपात किया जा सके.

पर हिमालय पर निवास करने वाली देव जाति स्वयं पतन के आखिरी दौर में थी और विष्णु संस्था अपना अलग “वैकुंठ” लोक बसा के तटस्थ हो गई थी और देवों का संरक्षण बंद कर चुकी थी. तथा… पतन के अंतिम दौर में रूद्र साफ़ तौर पर देवों के विरोधी असुरों, दानवों, दैत्यों के पक्षधर हो चुके थे.

और… तत्कालीन इंद्र अपने पूर्वजों की शौर्य परम्परा संभाल पाने में नाकाम रहे थे… ऐसे में देव जाति को तलाश थी एक निमित्त की… जो शक्ति संतुलन के उनके कार्य में साधन बन सके.

….और इन्तजार की घडियां ख़त्म हुई. भाद्रप्रद माह के कृष्ण पक्ष में यदुकुल वंशी “वासुदेव” के यहाँ “कृष्ण” का जन्म हुआ. कृष्ण से पूर्व की संतानों को उनका मामा कंस किसी ज्योतिषी की सनक के कारण मरवा चुका था.

पर… नियति को कुछ और मंजूर था और कृष्ण के जन्म के साथ वासुदेव अपने मित्र नन्द और महल के अपने वफादार नौकरों की सहायता से कृष्ण तथा दूसरी पत्नी से उत्पन्न कृष्ण के सौतेले भाई बलराम को गोकुल भिजवाने में कामयाब रहे… जहां कृष्ण बलराम के साथ बड़े होने लगे.

कृष्ण में कोई ख़ास बात तो थी जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी… कृष्ण नाम का वो बालक बाल्यकाल में लात मार के बैलगाड़ी उलट देता था… तो हंसी-हंसी में बाहुबल से पेड़ उखाड़ देता था.

बचपन में हँसते-हँसते खतरनाक जानवरों को मार डालता था… बांसुरी बजाता था तो पूरा ब्रज उसकी मधुर तान में खो जाता था. और जब ये कृष्ण युद्ध करता था तो… एक हाथ मार के मस्तक काट देने या मुक्के के प्रहार से मस्तक खील-खील कर देने जैसे अद्भुत कारनामे अंजाम दे देता था.

लड़ने की इस रहस्यमयी विद्या “मार्शल आर्ट” का प्रथम उपयोग कृष्ण द्वारा ही मिलता है. पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते है… बादल फटने के कारण हुई प्रलयंकारी बाढ़ में समस्त ब्रज जीवन की आस छोड़ चुका था.

तो उसी समय कृष्ण ने ना जाने कैसे चमत्कारिक पुरुषार्थ कर… “गोवर्धन पर्वत” को खोखला कर… “गुफाएं बना कर” समस्त ब्रज वासियों की उसमें शरण दे कर उनके जीवन की रक्षा करते हैं.

कृष्ण की इन लीलाओं पर इंद्र की ख़ास नजर थी. वे समझ गए थे कि यही एकमात्र इन्सान है जो विष्णु के समान देव जाति को संरक्षण दे सकता है. और विश्व में शक्ति संतुलन स्थापित करने के देव जाति के मंसूबो को अंजाम दे सकता है और…कृष्ण को उसी समय उनके गायों के प्रति अनुराग को देखते हुए “गायों का अधिपति” घोषित कर उन्होंने दोस्ती निभाने की शुरुआत कर दी.

कृष्ण का सफ़र अब शुरू हो चुका था. ब्रज से निकल कर बाल्यकाल में विश्व प्रसिद्ध पहलवानों मुष्टिक और चाणूर का वध कर समस्त मथुरा वासियों के हृदय पर उन्होंने वो छाप छोड़ी कि सबके सामने बाल पकड़ के घसीट-घसीट कर उन्होंने अत्याचारी राजा कंस की जान ले ली पर किसी की चूँ करने की हिम्मत नहीं हुई.

कृष्ण की सफलता का ये प्रथम अध्याय था. कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन अनीति के खिलाफ संघर्ष को समर्पित रहा… अंतिम वर्षों को छोड़ ये महामानव द्वारिका में कभी 6 महीने से ज्यादा ना रहा.

अपने जीवन में उन्होंने कई सैन्य अभियान चलाये पर कभी राजपाट की इच्छा ना की. जरासंध का वध करा के जहाँ उन्होंने उसके बेटे सहदेव को राज्य सौंप दिया तो महाभारत के युद्ध के बाद युधिष्ठिर को…

कृष्ण के जीवन को एक लेख में सहेजा नहीं जा सकता. पर उनकी सबसे ख़ास बात जो मुझे पसंद थी वो ये कि…”वो बेपेंदी के लोटे थे” अर्थात लकीर के फ़कीर नहीं थे. अपनी मान्यताएं स्वयं स्थापित करते थे.

कृष्ण का जीवन अभूतपूर्व ढंग से विरोधाभासी तत्वों का संगम है. जहाँ वे एक तरफ गीता का महान ज्ञान दे कर अर्जुन को धर्म मार्ग पर चलने को प्रेरित करते थे. तो वहीं… युद्ध में आतताइयों को मारने के लिए सबसे बड़े अधर्मी बन जाते थे.

इंद्र के अनुरोध पर उस समय के सबसे शक्तिशाली और दूसरों की लडकियों को उठा के अपने हरम में रखने वाले “नरकासुर” का वध कर देवलोक जा के… इंद्र द्वारा “उपेन्द्र” अर्थात विष्णु पद पर सुशोभित होने का सम्मान प्राप्त करते है.

और सम्मान प्राप्त करने के दस मिनट बाद… देवलोक के गार्डन में टहलते हुए… अपनी सबसे प्राणप्यारी पत्नी “सत्यभामा” के एक पेड़ को देख उसे द्वारिका ले जाने की इच्छा प्रकट करने पर… पेड़ को “अनैतिकतापूर्ण” ढंग से उखाड़ के रथ में रख लेते है… और पत्नी की ख्वाहिश पूरी करने के लिए दस मिनट पहले सम्मान देने वाले समस्त देवलोक से लड़ के इंद्र को भी पराजित कर देते है.

ये कृष्ण ही तो थे जो अपनों का साथ देने के लिए… मात्र अपने पोते अनिरुद्ध के प्रेम… “बाणासुर” पुत्री उषा के लिए… इतिहास के सबसे शक्तिशाली रूद्र कुल द्वारा संरक्षित बाणासुर से टकरा के… विश्व का प्रथम रासायनिक जैविक हथियारों का युद्ध कर “महादेव” को भी पराजित कर देते हैं…

और महादेव तक को पराजित कर देने वाला कृष्ण… मौका पड़ने पर “कालयवन” के विरुद्ध रणनीति के तहत पीठ दिखा के भाग कर “रणछोड़” की उपाधि भी कमा लेता था.

पर अफ़सोस विजेताओं का इतिहास जितना स्वर्णिम होता है अंत उतना ही दुःखद. अपने यदुकुल के लिए देवलोक तक के सभी ऐश्वर्य जुटा देने वाले कृष्ण… अंत में यादवों की निरंकुशता और शराब पीने की प्रवृत्ति से दुखी होते चले गए.

और अंत में…. एक दिन जब आपस में शराब पी कर लड़ते हुए… नशे में यादवों ने कृष्ण पुत्र “प्रद्युम्न” को ही मार डाला. तो कृष्ण के सब्र का बाँध टूट पडा और उन्होंने क्रोधवश स्वयं वहाँ मौजूद झगड़े में शामिल मुख्य यादव योद्धाओं का वध कर डाला.

और अंत में दुखी हो के एक पेड़ के नीचे ध्यान मुद्रा में बैठे हुए एक बहेलिये के भूलवश चलाये तीर का शिकार होके अंत गति को प्राप्त हुए.

समाज की वर्जनाओं के खिलाफ कृष्ण का संघर्ष अभूतपूर्व है… नरकासुर को मार कर उसके “हरम” से छुड़ाई गई जब 16108 देव, ऋषि, गन्धर्व कन्याओं और उनकी “नाजायज संतानों” को किसी ने भी आश्रय देने से मना कर दिया तो वो कृष्ण थे… जिन्होंने उन कन्याओं को द्वारिका में आश्रय प्रदान कर उनकी नाजायज संतानों को पिता का नाम प्रदान किया.

बाहुबल और बुद्धि का अद्भुत संगम थे कृष्ण, जो एक समय में कंस वध के बाद “जरासंध” के प्रकोप के भय से अन्य राज्यों द्वारा भारत की राजनीति में अलग थलग कर दिए गए थे.

और कुछ ही वर्षों के अन्दर कृष्ण के बाहुबल से “यदु कुल” उस समय का सबसे शक्तिशाली गणराज्य… और “वासुदेव कृष्ण” नाम… विजय का पर्याय बन चुका था. और इसी योद्धा ने बुद्धिबल से बिना हथियार उठाये विश्व के प्रथम विश्व युद्ध में पांडवों की विजय सुनिश्चित की…और विश्व में शक्ति संतुलन को स्थापित किया.

पर निरंकुशता को समाप्त करने और धर्म स्थापना के जिस प्रयोजन से वो महायुद्ध हुआ था… वो भाग्यवश पूर्ण नहीं हो पाया…. कृष्ण ने अपना कार्य कर दिया था. पर उनके वंशज अपनी जिम्मेदारियां ना संभाल पाए और देव जाति का आखिरकार पतन हो गया. और… काला युग (कलियुग) शुरू हो गया.

नेतृत्व के अभाव देव जाति के पतन और पुरोहित पाखंडवाद के परिणाम स्वरुप हर तरफ अँधेरे बादल छा गए. युग बीते… बुद्ध आये… महावीर आये… लोगों को आशा की किरण बंधी पर स्थिति नहीं सुधरी.

फिर समय बीता… विदेशी आक्रान्ता आये… लूट पाट का दौर शुरू हुआ… औरतों के बलात्कार हुए. मासूम बच्चों को साम्राज्यवाद की तलवार की नोक पर उछाला गया पर “जब जब धर्म की हानि होती है… तब तब मैं जन्म लेता हूँ”… कहने वाले कृष्ण… लोगों के महानायक नहीं आये.

आतंक के इन स्याह अंधेरो के बीच…पंडो के फैलाए “अवतारवाद” में फंसे पुरुषार्थ हीन निरीह लोग अक्सर पंडो पुजारियों से पूछते थे कि…. “कृष्ण कब आएँगे” और “कृष्ण आएँगे”…के आश्वासन के साथ जिन्दगी… आतंक के स्याह पन्नो के खत्म होने का इन्तजार करती रही. पर… कृष्ण नहीं आये.

महाभारत का युद्ध हुए आज हजारों साल हो चुके हैं… पर कृष्ण की एक नायक के रूप में जनमानस पर छाप बदस्तूर चली आ रही है… और कृष्ण के चरित्र से भरपूर छेडछाड भी हुई.

“कृष्ण राधा की फर्जी प्रेम कहानियां” और गोलोक के अविश्वसनीय प्रसंग कृष्ण के जीवन के साथ वल्लभ मार्गियों द्वारा ब्रह्म वैवर्त पुराण बना के ठूंसे गए… और अतिरंजित कहानियो का जन्म हुआ.

और कृष्ण के “पुरुषार्थ के मन्त्र” को भूल… हर विपत्ति में व्याकुल मन “कृष्ण आएंगे” के शिगूफे में कर्महीन होता चला गया. संसार में आज हर तरफ कितना दुःख है. क्या कृष्ण दुःख हरने आएँगे? नहीं….कृष्ण कभी नहीं आयेगे. कृष्ण जा चुके हैं.

अपने बाहुबल को पहचान जब मनुष्य अन्याय के विरुद्ध उठ खडा होता है… तो सम्पूर्ण प्रकृति उसके कार्य सिद्धि के प्रयोजन में सहयोग करने लगती है. मानव संकल्प और प्रकृति के सहयोग से हुए कार्य ही चमत्कार कहलाते है… और अब चमत्कार दिखाने कृष्ण नहीं आएगा. अब आपको स्वयं “कृष्ण” बनना होगा.

अर्थात…
जब जब धर्म की हानि होगी
तब तब कोई कृष्ण नही आयेंगे
जिन्हें स्वर्ग जाने की इच्छा है
मरना भी उन्हीं का अनिवार्य है.

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