यात्रा आनंद मठ की – 3 : यात्रा जारी है

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MA JIVAN SHAIFALY ANAND math YATRA 3

यात्रा किसे कहेंगे आप वो जिसके लिए आप तयशुदा दिन तयशुदा योजना पर निकलते हैं, अपना काम पूरा करते हैं और तयशुदा दिन लौट आते हैं. लेकिन मेरे लिए यात्रा का अर्थ थोड़ा भिन्न होता है. यात्रा के लिए निकलने के दिन तक मुझे पता नहीं होता मैं सच में यात्रा पर जा भी सकूंगी या नहीं.

वलसाड यात्रा भी एक दिन पहले तय हुई और जिस योजना के साथ मैं यहाँ से निकल रही थी, उसके बारे में मैं बिलकुल निश्चित नहीं थी वो हो सकेगा भी या नहीं. तो मैं आँख बंद किये बस चली जा रही थी ये देखने कि मेरे लिए भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है..

मासी की तेरहवीं पर मिलने गयी थी माँ से… माँ मिली फिर भी माँ नहीं मिली.. तो बुआ के साथ उन बाकियों से मिलने निकल पड़ी जिनके घर बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में आती थी…

रिश्तेदार कौन? मेरी दादी की छोटी बहनें और उनके बच्चे… दादी भी वो जिसने मेरे पिता को जन्म नहीं दिया, लेकिन हमें पता होने के बाद भी जैसे पता ही नहीं चला इस बात का… सिर्फ जन्म देनेवाली ही माँ होती है यदि, तो मैं अपनी माँ से यूं दूर नहीं होती….

पापा और दादी का रिश्ता भी माँ यशोदा और कन्हैया सा था, और मज़े की बात यह कि पापा का जन्म भी जन्माष्टमी को ही हुआ था… और मेरी दादी का नाम भी जशोदा ही था जिसे गुजराती में जशु बेन कहते थे… और यही नाम उनके हाथ पर भी गुदा हुआ था… मेरी अनपढ़ दादी जिसे पढ़ना लिखना नहीं आता था लेकिन मेरे पापा ने उन्हें अपना नाम लिखना सिखा दिया था तो वो कहीं भी अंगूठा नहीं लगाती थी बल्कि हस्ताक्षर करती थी…

तो मैं ये कह सकती हूँ कि पापा ही मेरी दादी की किस्मत के हस्ताक्षर थे.. इसलिए शायद जब दादी चली गयी तो पापा को भी अपना जीवन निरर्थक लगने लगा… जब वसीयत ही नहीं रही तो उस पर किये गए खाली हस्ताक्षर का कोई अर्थ नहीं रह जाता…

हालांकि पापा मुझे बचपन में एक बार अपनी जन्म देने वाली माँ के गाँव ले गए थे चिखली, लेकिन वो मेरे लिए दूर के अजनबी रिश्तेदारों से बढ़कर नहीं थे… उस समय छोटी थी तो समझ नहीं पाई लेकिन आज पापा की मन:स्थिति समझ पाती हूँ… माँ के गाँव जाकर भी माँ ना मिले तो कैसा लगता है… क्योंकि उनकी माँ तो उन्हें दुधमुंहा छोड़कर चली गयी थी…

खैर मैं वलसाड में दादी की बहनों के घर गयी. 22 साल पहले उनके बच्चों के साथ जो समय गुज़ारा था उसकी यादें मेरे मन में आज भी उतनी ही ताज़ा थी लेकिन लग रहा था… इन 22 सालों में समय ने कितनी ही करवटें ले ली होगी, बड़े तो ठीक है याद रखते हैं, लेकिन बच्चों के अपने परिवार हो गए थे अपनी अपनी घर गृहस्थी उनके परिवारों में कुछ नए लोगों का भी आगमन हो गया था… जो उस समय मेरे सामने तीन चार साल के बच्चे थे वो आज 25- 26 साल के नौजवान हो गए थे…

फिर भी सोचा चलो यहाँ तक आई हूँ तो अपने बचपन की यादें ही ताज़ा कर लूं… मैं जैसे ही उन लोगों के घर पहुँची सबने ऐसे गले लगा लिया जैसे आज भी मैं उनके लिए वही 20 साल की शैफाली हूँ जो गर्मियों की छुट्टियों में उनसे मिलने आई हूँ…

स्वागत ऐसा जैसे आसमान से परी उतरी हो…  प्रेम ऐसा कि मैं भूल ही गयी कि मैं तो अपनी माँ से प्रेम मांगने आई थी… बब्बा (ओशो) की बातें याद आ गयी… प्रेम करो नहीं प्रेम हो जाओ… और प्रेम माँगा तो समझो जो मिलने वाला था वो भी खो दिया… बिना अपेक्षा के इन सबसे मिलने आई थी शायद इसीलिए इतना अधिक प्रेम मिला…

अपनी पसंद की चीज़ें खिलाने का सबका अनुग्रह ऐसा कि दो समय के भोजन के बदले चार समय भोजन किया… गुजराती खाने का स्वाद ऐसा जैसे आत्मा तृप्त हो गयी… थोड़ा मीठा सब्जियों में शक्कर के कारण लगता ही है, बहुत मीठा उन सब के प्रेम के कारण लगा…

इन सबसे मिलने के बाद अपने प्रिय फूफाजी के घर गयी वही दिनेश कुमार जिनकी वजह से आमिष से निरामिष होने की यात्रा का सौभाग्य मिला था…

सबसे मिलकर रात को मासी के घर लौटी तो दिन भर की यादें और चेहरे पर तृप्त मुस्कान लिए मासी के हार चढ़े हुए फोटो के सामने देर रात तक बैठी रही… जैसे मासी जो हमेशा माँ-सी रही, कह रही हो मैं शरीर रूप में भले अब तुम्हारे सामने नहीं हूँ… लेकिन ममता को किसी देह की ज़रूरत नहीं होती वो तो किसी के भी माध्यम से प्रकट की जा सकती है…

और मुस्कान कब कृतज्ञता भरे आंसुओं में बदल गयी पता ही नहीं चला… रात गहराती गयी और मैं नींद के आगोश में… अगले दिन के रहस्यों के उजागर होने की प्रतीक्षा में…

सुबह का सूरज आया और ले गया मुझे अपने पहले इश्क़ से मिलवाने…. जानना चाहते हैं कौन है वो मेरा पहला इश्क़?

(यात्रा जारी है)

पहले भाग यहाँ पढ़ें – 

यात्रा आनंद मठ की – 1 : पांच का सिक्का और आधा दीनार

यात्रा आनंद मठ की – 2 : जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

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