विकास कैसे रोका जा सकता है… इसकी हुनरमंद है अखिलेश सरकार

आप जानते तो होंगे ही कि ग्रामीण विकास की मूलभूत सुविधाओं के लिए केंद्र सरकार सीधे ग्राम पंचायतों को सड़क, पानी, बिजली, नाली, खड़ंजा, सामुदायिक भवन, अस्पताल, स्कूल, तालाब आदि मूलभूत जन सुविधाओं के लिए, केंद्रीय 14वें वित्त आयोग के जरिये बजट देती है, जिसे राज्य सरकार खर्च करती है.

पंचायत स्तर पर ग्रामीण विकास के लिए केंद्र सरकार का यह फंड (केंद्रीय करों में राज्यों का हिस्सा) पांच सालों के लिए लागू होता है और नियमित होता है…. बाकी ग्रामीण विद्युतीकरण, पीएम सड़क योजना आदि के अलावा.

देश के हर राज्य की ग्राम पंचायतें, पंचायती राज व्यवस्था के तहत संवैधानिक तौर पर संस्थाएं होती हैं और किसी भी स्तर से इसके चुने हुए जनप्रतिनिधि ग्राम प्रधान को ग्राम समिति के अनुमोदन के बाद, गाँव के विकास में इस फंड को खर्च करने से रोकने का किसी को भी अधिकार नहीं.

लेकिन आपको यह जान कर तनिक भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उत्तर प्रदेश की सरकार, उसके मंत्री और अधिकारी यह खेल बेरोकटोक करते रहे हैं प्रदेश में.

ग्राम पंचायतों को इस केंद्रीय बजट से रूपये नहीं निकालने दिया जा रहा है.

केंद्रीय करों में राज्यों की भागीदारी 32% से बढ़ा कर 42% करने वाली केंद्र सरकार के इस ग्रामीण विकास को समर्पित बजट, 14वें वित्त आयोग से पैसा निकाल कर गांवों के विकास में न खर्च हो…. सिर्फ इसलिए इस असंवैधानिक काम को होते हुए देखते रहे मुख्यमंत्री?

जबकि शासन स्तर पर, सचिव स्तर पर, संविधान स्तर पर, बैंकिंग स्तर पर…. ग्राम पंचायतों से फंड निकाल कर खर्च करने पर कोई पाबंदी, कोई अप्रूवल लेने का नियम लागू ही नहीं.

अधिकारी आफ द रिकार्ड कहते हैं…. मंत्रियों और सत्ता के लोगों का दबाव रहता है कि इस फंड को कम से कम खर्च किया जाय.

केंद्रीय सहयोग की दो अधूरी योजनाओं… एक्सप्रेसवे और मेट्रो से प्रदेश के हवाई विकास के घोड़े दौड़ाने वाले मुख्यमंत्री क्या जवाब देंगे?

यही है आपका विकास और उसकी नीयत!

क्या आप डरते हैं इसलिए…. क्योकि गाँव का अंतिम आदमी भी अब यह जानता है कि गाँव के विकास के लिए ये रुपया उसके प्रधानमंत्री मोदी के ऑफिस से मिलता है.

वो भी तब… जब केंद्र सरकार की ओर से योजना और अनुदान आधारित मदद के स्थान पर अब प्रदर्शन आधारित सहायता का प्रावधान किया गया है.

प्रदर्शन के आधार पर हस्तांतरण की नई व्यवस्था के परिणामस्वरूप 2015-16 में राज्यों को अतिरिक्त 1.78 लाख करोड़ रुपये मिल जाने थे इसी बजट में!

विकास की नीयत की इस बेईमानी को विस्तार से देखेंगे… तथ्यों, प्रमाणों और दस्तावेजों के साथ अगले लेख में.

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