कितनी ही प्रतिमाएं तोड़ लो, छिपा नहीं सकोगे अपना अतीत, अपनी पहचान

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अफ़ग़ानिस्तान का बामियान सूबा आरंभ से ही बौद्ध भिक्षुओं का केंद्र रहा था. बौद्ध भिक्षुओं ने वहां शिल्पकारों के द्वारा चट्टानें कटवाकर बुद्ध की विशालकाय मूर्तियाँ गढ़वाई. फिर उन्हीं शिल्पकारों के द्वारा बौद्ध भिक्षुओं के लिये बामियान की घाटी में कई गुफ़ाएं भी बनाई गई थी जहाँ बौद्ध भिक्षु एकांत में ध्यान और साधना किया करते थे.

जिस समय ह्वेनसांग चीन से भारत आने की तैयारी कर रहे थे, लगभग उसी समय अरब के प्रायद्वीप में एक नया मजहब भी आकार ले रहा था. ये मजहब जब विस्तारित होने निकला तो अरबी टिड्डी दल अफगानिस्तान तक भी आ पहुंचा.

उन्होंने वहां के हिन्दुओं और बौद्धों को मतांतरित कर उनके मूल से काट दिया, गांधारी और शकुनि के गांधार प्रदेश में अब न तो आर्य धर्म था और न ही करुणावतार बुद्ध का मत बचा था.

बाकी बच गईं थी बामियान में पूरे विश्व को करुणा का संदेश देती भगवान बुद्ध की विशालकाय प्रस्तर प्रतिमायें. ये प्रतिमायें सदियों से पूरे मध्य एशिया के व्यापारिक काफिलों के लिये दिशा-दर्शक का काम भी करती थी और बताती थी कि इसके उस तरफ करुणावतार बुद्ध का देश भारत है.

अगर मैं ऐसा लिखूं कि अफगानिस्तान के बामियान में खड़ी उन बुद्ध प्रतिमाओं को आज से करीब डेढ़ दशक पहले कट्टरपंथी संगठन तालिबान के द्वारा बम से उड़ा दिया गया था तो ये सही नहीं है.

दरअसल मुझे अपने वाक्य को सुधार कर यूं लिखना चाहिये कि अगानिस्तान के बामियान में खड़ी उन बुद्ध प्रतिमाओं को आज से करीब डेढ़ दशक पहले उन लोगों के द्वारा बम से उड़ा दिया गया जिनके पूर्वज भगवान बुद्ध थे.

मज़हबी वहशत और पागलपन का इससे बड़ा उदाहरण और कहाँ मिलेगा जब महज मज़हब की तबदीली ने अपनी विरासत, अपने महान पूर्वज और अपनी गौरवशाली संस्कृति से न सिर्फ नफरत करना सिखा दिया बल्कि नफरत उस इन्तेहा तक चली गई कि उन बुद्ध प्रतिमाओं को ही तोड़ दिया जिससे उनकी पहचान थी, अतीत गौरव था.

बामियान की हजारों बुद्ध प्रतिमाओं को तुम भले तोड़ दो पर तुम्हारा अतीत और तुम्हारा सच हिन्दू है, इसे तुम चाह कर भी नहीं झुठला सकते हो और न ही प्रकृति तुम्हें इसे झुठलाने देगी.

चीनी यात्री ह्वेनसांग, जिसने बामियान की यात्रा की थी, उसने अपने यात्रा-वृतांत में बताया था कि बामियान में दो नहीं बल्कि तीन बुद्ध प्रतिमायें थी. बुद्ध की तीसरी प्रतिमा विश्राम की मुद्रा में लेटे हुए थी, मगर इस तीसरी बुद्ध प्रतिमा के बारे में किसी ने भी नहीं सुना था, उस पर तालिबान की भी नज़र नहीं गई थी.

अब उस तीसरी छुपी हुई प्रतिमा का हाल ही में पता चला है. वर्षों की खोज के बाद एक फ्रांसीसी पुरातात्विक दल ने अंतत: तीसरी बुद्ध प्रतिमा को खोज निकाला है और इसी का नतीजा है कि बामियान को 2015 के लिए दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक राजधानी के रूप चुना गया था.

हो सकता है कल को तुम्हारा मजहबी उन्माद इस तीसरी बुद्ध प्रतिमा को भी तोड़ दे पर तब भी तुम अपना सच नहीं बदल पाओगे क्योंकि प्रकृति फिर कहीं और से कुछ प्रमाण निकाल कर रख देगी जो चीख-चीख कर सारी दुनिया को बतायेगी कि तुम्हारा अतीत, तुम्हारा सच और तुम्हारी पहचान क्या है.

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