आक्रमण के हथियार बदल गए हैं : 5

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गतांक से आगे…

सांस्कृतिक आक्रमण : छिनती ज़मीन

कभी सोचा है पेड़-पौधे अपने बाल-बच्चे कैसे पैदा करते हैं? उनका मिलन कैसे होता है?

कीट तो जानते हैं न? अरे वही भिनभिनाते भौरे, गौबड़उरे, तितलियां, भांति-भांति की मक्खियाँ, मधुमक्खियाँ, चींटी… रेंगने वाले कीड़े आदि-आदि.

कीटों का काम है पौधों और पेड़ों के फूलों से पराग उठाकर दूसरे पौधों के फूलों पर पहुंचा देना. इसे पर-परागण कहते हैं. इसी तरह उनका निषेचन होता है. मतलब की ‘मिलन’ ‘सेक्स प्रोसेस’ और फिर बीज तैयार हो जाता है. उस बीज से अंकुरित होकर नया पौधा बनता है. फसलों का बीजीकरण इससे ही होता है. हमारा अन्न-दाना-भोजन भी ऐसे ही तैयार होता है.

कई पक्षी-जन्तु-पशु भी इसमें सहयोग करते हैं. लेकिन मुख्य भूमिका कीट-पतंगो की ही होती है. यही जैविक चक्र है. यही प्रक्रिया अरबों सालों से चल रही है. हमें पता भी नहीं चलता कि लाखों की संख्या और प्रकार वाले कीट-पतंगों के कारण हमारे जीवन चल रहा है. वे नष्ट हो गए तो फसल खत्म, पेड़-पौधे समाप्त. यह तो पता ही होगा कि पेड़-पौधे ही वर्षा बुलाते हैं.

नद्यो वर्षन्ति पर्जन्या:…. वर्षा का आकर्षण तबाह, पर्यावरण-चक्र खत्म हो जाएगा… जगह मरुस्थल में बदल जाएगी… और हमें भागना पड़ेगा दूसरी जगह जहां पेड़-पौधे मौजूद हों.

एक विशिष्ट प्रकार के कीट-पतंगे ‘टिड्डी दलों’ के बारे में सुना है न?…. वे बड़ी मात्रा में एक साथ आते हैं… खरबों की संख्या में…

जिधर जाते हैं… सारे पेड़ों-फसलों-पौधों की पत्तियों को खा जाते हैं… ठूंठ में बदल देते हैं. स्थानीय कीटों को भी मार देते हैं… जो छुपे होते बिना खाये-पीए मर जाते हैं.

कहते है हजारों साल पहले उनका आक्रमण सबसे बड़ा हमला माना जाता था. कई हजार साल पहले दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान ‘सहारा’… उन्होंने ही तैयार किया था.

वैज्ञानिक लोग भारतीय रेगिस्तान ‘थार’ के बारे में भी यही कहते हैं. सरस्वती नदी के लुप्त करने में उन छोटे-छोटे कीटों का योगदान माना जाता है. बाद में उस प्रजाति के टिड्डे खुद भी काल-कवलित हो गए.

कुछ साल पहले दुनिया के सभी देश इन ‘टिड्डी दलों’ की बड़ी संख्या और हमलों से बहुत परेशान थे. फिर सभी सरकारों ने मिलकर अभियान चलाया, हवाई-जहाजों से कीटनाशकों का छिड़काव करके उन्हें लगभग समाप्त कर दिया… अब वे बड़ा खतरा नहीं है. उपाय ही यही है.

इधर सरकार बहुत परेशान हैं. कृषि विभाग की एक वैज्ञानिक समिति की रिपोर्ट है कि इधर इटैलियन मधुमक्खियों को शहद के लिए लोग बड़ी मात्रा में पाल रहे हैं. यह मक्खियाँ ज्यादा शहद बनाती हैं. पर इनकी एक विशेषता है कि यह जिन इलाकों में जाती हैं बाकी के कीटों को मार देती है.

समिति का कहना है उनकी प्रजनन क्षमता बाकी के कीटों और देशी मधुमक्खियों से कई गुना ज्यादा है. यदि दस साल भी लगातार पल गई तो स्थानीय कीटों को पूरी तरह साफ कर देंगी.

प्राकृतिक नियम है कि जब एक ही प्रजाति बचती है तो जल्दी ही वह भी खत्म हो जाती है. कीट-पतंगे खत्म तो प्रकृति चक्र भी खत्म… पशु-पक्षी-मनुष्य सभी को भागना पड़ेगा… एक बड़ा सा रेगिस्तान तैयार… करो लालच… खाओ शहद!

सबसे मजेदार बात सुनिए… इन्हे कुछ कीट वैज्ञानिकों ने बताया है… बाहरी आक्रमणकारी कीट स्थानीय कीटों को कभी भी और बिलकुल ही नहीं रंगता बल्कि स्थानीय और देशी कीट जो कि पर्यावरण चला रहे होते हैं… जो रीयल -ड्राइवर के नाम से जाने जाते हैं….. वे लपक कर नए कीटों का स्वागत करते हैं.

वह उन्हें भी अपने जैसा ही समझने की भूल कर बैठते हैं. नए कीट पर्यावरण समझने के लिए शुरुआत में उन्हें झांसे में रखते हैं… फिर कुछ देर बाद अपने आर्गनाइज्ड ढांचे के साथ अटैक करके नष्ट कर देते हैं. स्थानीय कीट जान भी नहीं पाते कि यह क्यों और कैसे हुआ.

बचपन में हम प्रो. हक (नाम बदल दिया है) के यहां जाते थे. सातों बेटे, दोनों बेटियां ए क्लास सर्विसेज में हैं. अति आधुनिक फैमिली थी/है. उनका सबसे छोटा बेटा मेरा दोस्त है. वे सब के सब अपनी मम्मियों को अम्मी-जान और अपने पापा को अब्बा ही कहते हैं. पता करिये बड़े-बड़े मुस्लिम फ़िल्मी हीरोइन-हीरो क्या कहते हैं!

जानेंगे तो आँख फटी रह जायेगी. लेकिन इस बंटे भारतवर्ष में आप बप्पा-माई कहकर ‘पिछड़ा’ फील करने लगते हैं.

वामी/सामी तुरन्त बोलेंगे… क्या फरक पड़ता है, उच्चारण/सम्बोधन में क्या रखा है, यह तुम्हारी संस्कृति तो बड़ी सहिष्णु रही है, लिबर्टी… लचीलापन…उदार…

और… इन्हीं मुगालतों में रखकर तुम्हें खा जाते हैं… धीरे-धीरे सारा बदलाव किसके लिए है? सनातनियों के लिए… उनके शिकार हम हैं, जो माँ-माई से होकर अम्मा और मम्मी… पिताजी को बप्पा, बाऊ जी से होते हुए पापा/डैडी सम्बोधन पर आ जाते हैं…

यदि इस मानव-जगत का सबसे नजदीकी-भावनात्मक-संवेदनात्मक शब्द ‘माँ’ को बदला जा सकता है किसी को भनक लगे बगैर, तो सब कुछ संभव है.

भाषा, नाम, खान-पान, वेश-भूषा, पहनावा, जीवन चर्या, रहन-सहन, उच्चारण, लहजे, सोच… अवचेतन के उस हिस्से को बदला जा रहा है… जो इस राष्ट्रात्मा से उपजे है… उसकी पारिस्थितकी से उपजे है.

संगठित कीटों के हमले और हथियार देखिये –

अब भैया ‘ब्रो’ में बदल रहा है, दीदी ‘सिस, पापा ‘पा’ मम्मी ‘ममा’ से होते हुए ‘मी’ की तरफ बढ़ रही है… खुद लिस्टिंग करो…

लकी, पिंकी, चकी… स्वीटी… डॉगी… बॉक्सर… जूली… टामी… कुत्ते-बिल्लियों, पालतू जानवरों से आदमी में बदल गए और मॉडर्न होने की पहचान हो गए.

परन्तु ध्यान देने लायक तथ्य है इसाई ने अपने नजदीकी सम्बोधन नहीं बदले, मुस्लिम ने नहीं बदले, तुम्हीं सम्बोधन बदल कर मॉडर्न बन रहे हो?

आप के बाप-दादों का सम्बोधन खुद अटपटा लगने लगा!

ये कैसे हुआ? यह तो उदाहरण के लिए था. लिस्टिंग करिये, हजारों चीजे मिलेंगी… हर क्षेत्र और व्यवहार में. जो बड़ी चतुराई और शार्प निशाने से जड़-मूल सहित तबाह कर दी गईं और आप जान भी नहीं पाए.

मैं ‘शब्द’ के सही-गलत होने पर नहीं जा रहा. ‘शब्दों’ से भावनाओं की पवित्रता नहीं संस्कृति और सोच बदल जाती है, वह भी बिना जानकारी के.

बाहरी कीट-दुश्मन कीट छोटे-देशी कीट को खा रहा है रेगिस्तान बन जाने का खतरा… सुमेरिया, असीरिया… बेबीलोनिया…

हथियार और कीट पहचानिए…अब आक्रमण के हथियार तीर-धनुष, तलवार, तोप, बन्दूक, मिसाइल और बारूद नहीं कुछ और होते हैं. उन्हें बड़े गौर से पहचानना होगा. नहीं तो बिना लड़े हार जाएंगे और आपके बाप दादों की थाती नष्ट कर दी जायेगी.

महज 12 सौ सालों में आपसे 14 देशों की जमीन छिनते-छिनते अफगानिस्तान छिना, पाकिस्तान बना, बांग्लादेश बदला…. काश्मीर, बंगाल, केरल, पूर्वी भारत के कुछ हिस्से भी अलगाववाद की स्थिति में हैं… कांटते-बांटते… आप सम्पूर्ण धरती पर सिर्फ एक देश हिंदुस्तान में ही बचे हैं. बहुत साफ़-साफ़ समझिये ‘हिन्दू घटा देश बंटा’.

किसने छीना? कौन छीन रहा है?

भाग कर जाने के लिए आपके पास दुनिया की कोई धरती नहीं बची है. कोई माने या न माने कम से कम मैं तो यही मानता हूं मज़हब के नाम पर देश बंटने के बाद यह बची भूमि ‘हिंदूराष्ट्र’ ही है.

तत्कालीन संविधान, अंग्रेजी पार्लियामेंट, कानून और भारत भूमि से मज़हबी आधार पर अलग होने वाली कौम और सभी बाँटने वाले नेताओं ने यह मानकर ही बंटवारा स्वीकारा था.

सेकुलरिज्म केवल डिजाइन होती है. फैब्रिकेशन मात्र. वर्तमान शासन व्यवस्था के अलावा कुछ नहीं होता वह. शायद ही कोई एकाध उदाहरण हो कि कोई मुस्लिम या ईसाई बाहुल्य देश का संविधान, किसी अन्य संप्रदाय को अलग से कानून मानने या बाहरी को राष्ट्राध्यक्ष बनने की अनुमति देता हो.

संवैधानिक तौर पर तो पाकिस्तान और सभी इसाई देश भी खुद को सेकुलर कहते है. लेकिन सुना है कि किसी अन्य कौम का मजहब का व्यक्ति उनका पन्त प्रधान बन सका?

लिबर्टी… लचीलापन… उदारता… अनेकता में एकता… विभिन्नता… जातीयता सब ऊपर से थोपी हुई चीजे है… उनका शासन पर कब्जा होना, कार्पोरल जगत में पैठ, कोर्स, साहित्य, कला, मीडिया, फिल्म, और नौकरशाही द्वारा इंपोज कर दी गई है… प्रशासकीय हथकंडे… केवल कमजोर बनाने के लिए है.

वह एक रणनीतिक हिस्सा है. दिमाग के उस अवचेतन पर कब्जा, जो आपको गुलाम में बदल देता है. इसी साजिशन वे आपसे टुकड़ो में बात करते हैं.जाति में बात करते हैं. आक्रमण के समय वे सिर्फ ‘हिन्दू’ ही देखते हैं.

क्या समझे?

‘गंगा-जमुनी’ नाम की कोई चीज नहीं होती… वह टिड्डी-दलों की बाढ़ है जो सब कुछ उड़ा ले जाती है… जो सरस्वती सुखा देती है और फिर गंगा की ताक में है.

गंगा-जमुना-सरस्वती को तबाह करने वाले हथियार पहचानिए.

क्रमशः 6

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