नागाओं का रहस्य – 6 : महाभारत की कथाओं में छुपा समृद्ध इतिहास

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कुछ अन्य जानकारी के अनुसार पाताल को कहीं अन्यत्र रखने का प्रयास भी किया जा सकता है. पुराण और महाभारत के कुछ वर्णन यह दर्शाते हैं कि भारत के नौ विभागों में से एक नागाओं का था, और वह देश का पश्चिम भाग था, वीरुपक्ष के साथ नागा अर्ध-देवता उसके संरक्षक के रुप में थे.

मलय पर्वत पर रहनेवाले जिमुतवाहन, जो गरुड़ों का संदेश नागाओं तक पहुंचाते थे, कहा जाता है कि जब वह गोकर्ण गए जो कि शिवजी की अंतिम प्रार्थना का स्थान था तो वहां उन्होंने शंखसुडा के स्थान पर ख़ुद को शिकार के रुप में प्रस्तुत किया.

गोकर्ण कनारा का एक धार्मिक स्थल है. रामायण हमें यह विश्वास दिला सकता था कि रसातल समुद्र के बीचोबीच स्थित है और लंका नरेश रावण ने भोगवती को हस्तगत कर नागाओं पर विजय प्राप्त की थी. उसी महाग्रंथ में भोगवती को अगत्स्य ऋषि का निवास स्थान बताया जाता है.

सीता की खोज में हनुमान के नेतृत्व में वानरों की सेना भेजते हुए सुग्रीव ने कहा: कंजारा नाम का एक पर्वत है, जो आँखों और ह्रदय को प्यारा लगता है जहाँ अगत्स्य का निवास स्थान विश्वकर्मन द्वारा सजाया गया है. वहाँ उसका रत्नजड़ित सोने का दिव्य घर है, जो एक योजन चौड़ा और दस योजन लंबा है.

सर्पों का निवास स्थान भोगवती जो बड़े मार्ग वाला अडिग, चहु ओर से तीखे दांतों वाले जहरीले भयानक सर्पों से घिरा है जो सर्पों के बहुत भयानक राजा वासुकि का निवास स्थान है. पारंपरिक रुप से यह माना जाता है कि पश्चिमी घाट पर दक्षिणी छोर में अगत्स्य मुनि का निवास स्थान पोडियिल पर्वत था.

महाभारत के अनुसार भी भोगवती दक्षिणी क्षेत्र में था और उस पर वासुकि, तक्षक और ऐरावत का शासन था. पर्याप्त उलझन के साथ भोगवती का एक नदी के नाम के रूप में भी उल्लेख किया है और कुरुक्षेत्र के निकट नदी सरस्वती के साथ पहचान की मांग की है.

इस प्रकार शब्द कदाचित घुमावदार नदी (भोग का अर्थ सर्प की कुंडली भी होता है) के रुप के नगर (भोग-विलास का नगर) का भी संकेत देता होगा. अगर इसका मतलब एक नदी है तो यह संभव नहीं है कि एक पौराणिक शहर पर सर्पों का नाम लागू किया जा सके.

महान महाग्रंथ महाभारत अकेले नागा से संबंधित कथाओं और धारावाहिकों से समृद्ध है. हमें यहाँ से इन विषयों पर मिथक प्राप्त होते हैं : नागा कबीले की उत्पत्ति, कद्रु और विनत की होड़, गरुड़ द्वारा सोमा का बलात्कार, शेषनाग, नागों की दुनिया, नागा विचारसभा कैसे लेते हैं, हरमित जरतकरु और सांप का बना जरतकरु, ब्राह्मण उत्तंक और नाग राजा तक्षक, नागराज तक्षक द्वारा राजा परिक्षित की हत्या, सर्पों का यज्ञ, भीम का नागाओं द्वारा विष उपचार, अर्जुन और उलुपी की कहानी, अर्जुन और तक्षक के पुत्र अश्वसेना, नाला और नागा कार्कोतक, दामाद की खोज में निकला इन्द्र का सारथी मताली, बुद्धिमान और धार्मिक नागा पद्मनाभ जिसने सूर्य भगवान के एक पहियेवाले रथ को खींचा था, कृष्ण ने कालिया नाग पर कैसे विजय प्राप्त की, अकोइरा ने कैसे नागाओं की दुनिया को संभाला.

कथाओं में से जिन पारंपरिक इतिहास का निचोड़ मिल सकता है वह यह है कि महाभारत युद्ध के प्रलय के बाद उत्तर पश्चिमी भारत में राजनीतिक स्थिति बहुत ज्यादा अव्यवस्थित दिखाई देती है जो उस क्षेत्र में नागाओं की उत्पत्ति का कारण है. कहा जाता है कि पौरव के राजा, परिक्षित, अर्जुन के पौत्र, कुरु राज्य (सरस्वती और गंगा के बीच के क्षेत्र में फैला) पर शासन करते आए हैं.

महाभारत के अनुसार, पूरी सावधानी के बावजूद एक श्राप के कारण वह नागरज तक्षक द्वारा मार दिया जाता है. इसलिए उनके पुत्र जनमेजय सर्पसत्र (सर्पों का यज्ञ) कराते हैं, जिसमें मंत्रौच्चार द्वारा कई साँप पवित्र अग्नि में चढ़ावे के रूप में गिरते हैं और नष्ट हो जाते हैं.

आखिरकार, यह स्पष्ट रूप से गंधर्व के नागा की उत्पत्ति और परिक्षित के नेतृत्व में हस्तिनापुर पर आक्रमण की पौराणिक कथा है, जो कदाचित प्रतिरोध करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाता है. बाद में उनके पुत्र जनमेजय, जो शक्तिशाली शासक के रुप में उभरे, नागाओं से लड़ें और तक्षक की राजधानी और नागाओं के राजा पर विजय प्राप्त की.

हालांकि अस्तिका के बीचबचाव के परिणाम स्वरूप, जनमेजय ने नागाओं के वध और उनकी पूर्ण विलुप्ति को बंद कर दिया. जनमेजय द्वारा तक्षक की राजधानी पर विजय एक ऐतिहासिक तथ्य के रूप में लिया जा सकता है क्योंकि उस जगह पर उसे वैशम्पायन द्वारा महाभारत की कहानी सुनाई गई थी.

उनके देश के पूर्व भाग में पांचाल रहते थे, वे मूल रूप से कृवि के नाम से जाने जाते थे. महाभारत काल में उन्हें उत्तर और दक्षिण भागों में विभाजित किया गया. महाभारत के अनुसार, उत्तर पांचाल कुरु की मदद से द्रोण द्वारा द्रुपद से छीन लिया गया था, और उसकी राजधानी अहिच्छत्र थी. इसे अहिक्षेत्र भी कहा जाता है, परंतु आदी-राजा की स्थानीय किंवदंती के अनुसार जब वह सो रहा था, फन फैलाये हुए एक कोबरा नाग द्वारा उसे राजगद्दी पर चढ़ने से पहले संरक्षित किया गया था, इसलिए अहिच्छत्र कदाचित अधिक उचित है जिसका अर्थ होता है नाग का छत्र.

टोलेमी (ptolemy) में इसे अदिसद्र कहा जाता है. उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में रामनगर के साथ इस स्थान को पहचाना जाता है. ह्युन-सैंग के अनुसार अहिच्छत्र देश परिपथ में 3000 ली (li) था और राजधानी ही लगभग 17 या 18 ली (li) की थी. कहा जाता है कि बुद्ध वहाँ प्रवचन दिया करते थे और वहीं पर उन्होंने वहाँ के नाग राजा को परिवर्तित किया था.

सुदूर पूर्व में भी नागा राजवंश थे. ययाति, पुरु के पिता और नागा नहुसा के पुत्र, अस्तक के नाना थे. पांडव नागा आर्यक के पौत्र थे. यादव भी नागा के ही वंशज थे. कृष्ण भी एक नागा थे, जैसा कि पहले उल्लेखित तथ्य से देखा जा सकता है कि उनके पिता वासुदेव नागा आर्यक के प्रपौत्र कहे जाते हैं. उनके बड़े भाई बलदेव शेषनाग का ही एक अंश माने जाते हैं.

Nagas : The Tribe and The Cult (R. K. Sharma) पुस्तक का हिन्दी अनुवाद

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नागाओं का रहस्य -1 : उद्गम और टोटेमवाद

नागाओं का रहस्य -2 : पुराण में नागाओं का उल्लेख

नागाओं का रहस्य -3 : बुद्ध के सिर पर नाग-छत्र

नागाओं का रहस्य – 4 : स्वदेशी और आर्यन मूल

नागाओं का रहस्य – 5 : पारंपरिक इतिहास

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