बाबा साहेब की अहसान फरामोश पीढ़ी

अब आप कहेगें कि यह क्या कह रहे हो. मैं सच कह रहा हूँ, यह उन लोगों के लिए है जो बाबा साहेब डॉ बी आर अम्बेडकर के संघर्ष से मिले अधिकार और आरक्षण के लाभ को मजे से खा रहे हैं, लेकिन बदले में, बाबा साहेब के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं.

बाबा साहेब ने अपने परिवार व जान की परवाह किये बिना, कड़े विरोध व संघर्ष के बाद हमें यह अधिकार व आरक्षण दिलाया. उनके संघर्ष को हम, केवल इसी बात से समझ सकते है कि, वे एक काबिल बैरिस्टर होने के बाद भी, अपने द्वितीय पुत्र गंगाधर की मृत्यु पर, उनके जेब में कफन के भी पैसे नहीं थे. कफन का कपड़ा, पत्नी ने साड़ी में से टुकड़ा फाड़ कर दिया.

इस बात से, उनकी गरीबी का अन्दाजा लगाया जा सकता है. इतनी गरीबी में भी उन्होंने समाज के पिछड़ों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए कहा कि ‘आप मुझे लोहे के खम्बे से बांध दीजिए, मैं अपने लोगों के हकों के साथ समझौते नहीं कर सकता’.

इतने बड़े संघर्ष का परिणाम है कि आप और हम सम्मान से जी रहे हैं. आज भी करोड़ों ऐसे लोग है, जो बाबा साहेब की कड़ी मेहनत से कमायी गयी रोटी को, मुफ्त में, मजे से खा रहे है. उन्हें इस बात का अन्दाजा नहीं है कि, उन्हेंं जो पावर और पैसा मिला है, वो उनकी अक्ल और होशियारी का नहीं है, यह बाबा साहेब के संघर्ष का परिणाम है.

बाबा साहेब को जो करना था, वह कर गये, लेकिन हमें जो करना है, वो हम नहीं कर रहे हैं. आज मुफ्त की रोटी खाने वालों की संख्या करोड़ों में है, जबकि बाबा साहेब के कारवाँ को आगे बढ़ाने वालो की संख्या हजारों में है.

बाबा साहेब ने अपनी आने वाली पीढ़ी के लिये संघर्ष इसलिये किया कि, उनकी भावी पीढ़ी, उनके कारवाँ को आगे बढ़ायेगी और अपने समाज के पिछड़े लोगों की मदद कर, उन्हें साथ लेकर चलेगी तथा उन्हें भी अपना हक दिलायेगी.

आज बाबा साहेब का मुफ्त में माल खाने वाले बाबा साहेब को भूल गये हैं. ऐसे लोगों को अहसान फरामोश ना कहे तो और क्या कहें?

मैं यह नहीं कहता कि सभी ऐसे है, लेकिन यह सच है कि अधिकतर ऐसे ही है. यदि ऐसा नहीं होता तो, हमारा समाज आज पिछड़ा नहीं होता. उनके पिछड़ेपन के लिये, इसी समाज के उच्च शिक्षित, डॉक्टर, इन्जिनियर, वकील, आर.ए.एस., आई.ए.एस. जिम्मेदार है.

आज जिसे नौकरी मिली, पैसा, पावर मिला, वो आज समाज व बाबा साहेब से दूरी बनाये हुये है. जबकि बाबा साहेब के संघर्ष के कारण ही, वे बंगलों में रहते हैं, बड़ी-बड़ी महंगी-मंहगी गाड़ियों में घूमते है. इनके बच्चे पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं, बड़े बच्चे विदेशों में उच्च शिक्षण संस्थाओं में अध्ययन कर, वहीं बस रहे हैं. उनकी इस हाई प्रोफाईल पीढ़ी को, आज भी यह नहीं पता है कि आज वे जो भी है, वह बाबा साहेब की देन है.

आज जिस समाज की वजह से, वे अफसर बने बैठे हैं, अपने ही लोगों से कन्नी काट रहे हैं, अपने आप को वे, समाज से ऊँचा समझ रहे है. उन्हें जो आरक्षण मिला, जिसकी वजह से, जो कभी उनके सीनियर अफसर होते थे, वे आज, पदोन्नति में आरक्षण की वजह से, जूनियर कर्मचारी बन गये है.

इन्हें मिले जल्दी-जल्दी प्रमोशन ने कई-कई को तो शैतान बना दिया है. यह लोग अपनी सफलता का श्रेय भगवान, माता-पिता, अपने अक्ल, होशियारी को देते हैं, जबकि वास्तविकता में यह बाबा साहेब के संघर्ष की बदौलत है.

आजकल आमतौर पर यह देखने को मिलता है कि जिस आरक्षण की वजह से, एक सामान्य वर्ग के सरकारी कर्मचारी को, अपने सम्पूर्ण सर्विस काल में, एक या दो प्रमोशन ही मिलते है, जबकि वहीं आरक्षित वर्ग के कर्मचारी को चार से पांच प्रमोशन मिलते है. क्या यह भगवान, माता-पिता, उनकी अक्ल-होशियारी की देन है?

नहीं… यह बाबा साहेब की देन है. तो फिर एक शिक्षित व्यक्ति अपने असली भगवान बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को क्यों नहीं पहचानता. आप ही बताएं, ऐसे व्यक्ति को क्या कहें मूर्ख या अहसान फरामोश?

सम्पूर्ण जीवनकाल में अधिकतर समय बाबा साहेब की आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय थी, तो उन्हें कई बार परिवार, समाज व साथियों ने सलाह दी कि, आप सरकारी नौकरी क्यों नहीं कर लेते?

तो वे कहते थे कि, यह केवल मेरी पीड़ा नहीं है, यह मेरे 7 करोड़ लोगों की पीड़ा है. मैंने सरकारी नौकरी कर ली तो, मेरे 7 करोड़ भाई-बहनों के अधिकारों व हकों की लड़ाई का क्या होगा?

इसलिए उन्होंने अपने जीवन में नौकरी से हमेशा दूरी बनाये रखी और अपने लोगों के हक अधिकार के लिए हमेशा लड़ते रहे.

आज ऐसे सरकारी नौकरों की लम्बी फोज है, जो आरक्षण से मिली नौकरी व प्रमोशन से मिले पावर का दुरूपयोग करके, करोड़ों रूपये की धन-सम्पदा के मालिक बने बैठे हैं. जिनके माता-पिता स्‍वयं कभी चौकीदार व मजदूर हुआ करते थे, आजकल उनके बंगलों के बाहर चौकीदार, मजदूर तथा छोटे-मोटे ऑफिसर हाजिरी में खडे़ नजर आते हैं.

वे अपने पावर और पैसे के नशे में स्वार्थी बने बैठे हैं. अपने-पराये को भूल कर, देश-विदेश घूमना, विलासितापूर्ण जिन्दगी जीना उनकी आदत बन गयी है. आज वे अपने समाज के प्रति कर्तव्य को भूल गये है.

आज वे समाज को सन्देश देते है कि हमें फलाना-फलाना कार्य करना चाहिये, इनकी बातें केवल अच्छे-अच्छे भाषणों तक सीमित हो गयी है. पता नहीं किस दुनिया में जी रहे है.

वे कभी यह नहीं सोचते हैं कि, जिस समाज के वजूद की वजह से, वे अफसर बने बैठे हैं, वो समाज आज गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ेपन, असहाय, साधनविहीनता जैसी गम्भीर सामाजिक बीमारियों से ग्रसित है, उसे कौन छुटकारा दिलायेगा. इसके लिए उन्हें मनन कर सोचना चाहिये कि स्वयं क्या हैं. बाते ना कर, कुछ करके दिखाना चाहिये.

बाबा साहेब सोचते थे कि यह अफसर, अपने समाज को लड़ने की हिम्मत व साधन उपलब्ध करायेंगे. जबकि सच्चाई यह है कि ये सरकारी पावर का दुरूपयोग कर धन कमाने में लगे हुऐ हैं. अपने स्वार्थो की पूर्ति, उनका एक मात्र उदेश्य रह गया है.

उस समय अगर बाबा साहब के बेटे के शरीर पर कफन होता… तो विचार करिये… आज हमारे लोगों के शरीर पर कपड़ा तक नहीं होता!

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