डेमोक्रेसी ही बताएगी इस्लाम को उसकी औकात

आज डेमोक्रेसी के बारे में कुछ अपने ऑब्जरवेशन लिख रहा हूँ जो कहीं पढाई नहीं जातीं. अमेरिकी डेमोक्रेसी की मिसाल दी जाती है तो मैं अपनी बात अमेरिका से शुरू करना चाहूँगा. दूसरा विश्व युद्ध जीतने के बाद आज तक अमेरिका का वर्चस्व है और आगे भी रहेगा.

जानते हैं क्यों?

इस दुनिया में सब नीयत का खेल है. ईश्वर, अल्लाह, गॉड आपकी नीयत पर नज़र रखते हैं. इस बात को दूसरा विश्व युद्ध जीतने के बाद सबसे पहले अमेरिकियों ने समझा.

अमेरिकियों ने दूसरा विश्वयुद्ध जीतने के बाद अपनी आइडियोलॉजिकल अपील को बल देने के लिए डेमोक्रेसी, रूल बेस्ड ट्रेड और रूल बेस्ड नेविगेशन पर पूरा बल दिया. इससे पूरा विश्व लाभान्वित हुआ. एक मार्शल प्लान बनाया जिससे जर्मनी और जापान रिकवर कर सके.

आज उसी मार्शल प्लान की देन है कि जर्मनी और जापान का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इतना सम्मान है और ये दोनों देश आज भी अमेरिका के इतने बड़े सहयोगी (ally) हैं. अमेरिका के वजह से ही आज जापान का राजशाही इतने खूबसूरत डेमोक्रेसी में तब्दील हुआ है.

इससे पहले दुनिया के ताकतवर देशों का अलग फंडा था… चाहे इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी ये देश अपने दुश्मनों को कुचल दिया करते थे पर अमेरिका ने सही नीयत से इस सोच को ख़त्म किया.

अमेरिका ने यह सिद्ध किया कि डेमोक्रेसी का कोई पर्याय नहीं और डेमोक्रेटिक ढंग से पूरे विश्व पर लम्बे समय तक राज़ किया जा सकता है. यही कारण है कि अमेरिका का वर्चस्व इतने लम्बे समय से चल रहा है और चलता रहेगा.

चीन भी आज एक सुपर पॉवर है. पर चीन से सबको एक खौफ है क्योंकि चीन की नीयत सही नहीं है. सभी यह जानते है कि चीन जितना पावरफुल होगा उतना अधिक भय के वातावरण का निर्माण होगा.

हर राष्ट्र का अपना धर्म होता है, अपना रिलिजन होता है, अपना मज़हब होता है और वह अपने राष्ट्र का आईना होता है. सारे इस्लामी राष्ट्र एक विफल राष्ट्र हैं क्योकि वहां डेमोक्रेसी नहीं है.

जब एक राष्ट्र फेल होता है तो उसके रिलिज़न की क्या दुर्गति होती है इसका अंदाजा आप किसी भी इस्लामिक राष्ट्र को देखकर लगा सकते हैं.

हर रिलिज़न में रिफॉर्मिस्ट रहे हैं और रिफॉर्मिस्ट मूवमेंट होते रहे हैं पर इस्लाम में कभी नहीं.

इनका कहना है कि हमने जो कह दिया वही निर्विवाद सत्य है और यही ढीठपना इनकी दुर्गति का मुख्य कारण है.

ऐसा नही है कि इस्लाम में कभी रिफॉर्म की बात हुयी नहीं. शुरूआती दौर के खलीफा रिफॉर्म पर बहस किया करते थे.

तभी एक इरानियन इमाम गज़ाली आये और उन्होंने कह दिया इस्लाम इतना कम्प्लीट रिलिजन है कि अब इसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है. यही सत्य है, जो हम कह रहे हैं, इसे ही दुनिया को मानना पड़ेगा.

बदलाव ही प्रकृति का नियम है. अब आप ही बताएं प्रकृति से लड़ने वाला अपनी और कितनी दुर्गति कराने पर आमादा है? डेमोक्रेसी ही उसे उसकी औकात बतायेगा या नहीं?

योगेश सिंह

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