आक्रमण के हथियार बदल गए हैं : 4

0
35
bollywood-khan-trio-making-india

गतांक से आगे…

किसी भी राष्ट्र, समाज में संस्कृति की मूल संवाहक-संरक्षक स्त्रियां और बालिकाएं होती हैं. वह संस्कृति को अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करती हैं. स्त्रियाँ भ्रष्ट संस्कृति नष्ट, फिर तो राष्ट्र स्वाहा. कमजोर आंतरिक दुश्मन इसलिए स्त्रियों-बच्चों पर मौन और गोपनीय आक्रमण करता है. सदैव सजग रहना ही बचाव है.

हालांकि सभी की सजगता के कारण रईस फिल्म बुरी तरह पिट गई और 10 करोड़ रूपये भी न कमा सकी किन्तु कमाई के झूठे आंकड़े के मीडियाटिक वार के सहारे किसी तरह इज्जत बचाई जा रही है.

साम्राज्य दरकन के बावजूद एक नजर इधर डालें.

क्या यह संयोग है कि बॉलीवुड में सभी जगह पुरुष मुस्लिमों का वर्चस्व है और उन सभी की पत्नियां हिन्दू है?

शाहरुख खान की पत्नी गौरी एक हिंदू है. आमिर खान की पत्नियां रीमा दत्ता / किरण राव और सैफ अली खान की पत्नियाँ अमृता सिंह / करीना कपूर दोनों हिंदू हैं.

नवाब पटौदी ने भी हिंदू लड़की शर्मीला टैगोर से शादी की थी.

फरहान अख्तर की पत्नी अधुना भवानी और फरहान आजमी की पत्नी आयशा टाकिया भी हिंदू हैं.

अमृता अरोड़ा की शादी एक मुस्लिम से हुई है जिसका नाम शकील लदाक है.

सलमान खान के भाई अरबाज खान की पत्नी मलाइका अरोड़ा हिंदू हैं और उसके छोटे भाई सुहैल खान की पत्नी सीमा सचदेव भी हिंदू हैं.

आमिर खान के भतीजे इमरान की हिंदू पत्नी अवंतिका मलिक है. संजय खान के बेटे जायद खान की पत्नी मलिका पारेख है.

फिरोज खान के बेटे फरदीन की पत्नी नताशा है. इरफान खान की बीवी का नाम सुतपा सिकदर है. नसरुद्दीन शाह की हिंदू पत्नी रत्ना पाठक हैं.

एक समय था जब मुसलमान एक्टर हिंदू नाम रख लेते थे क्योंकि उन्हें डर था कि अगर दर्शकों को उनके मुसलमान होने का पता लग गया तो उनकी फिल्म देखने कोई नहीं आएगा. ऐसे लोगों में सबसे मशहूर नाम युसूफ खान का है जिन्हें दशकों तक हम दिलीप कुमार समझते रहे.

महजबीन अलीबख्श मीना कुमारी बन गई और मुमताज बेगम जहाँ देहलवी मधुबाला बनकर हिंदू हृदयों पर राज करतीं रहीं.

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी को हम जॉनी वाकर समझते रहे और हामिद अली खान विलेन अजित बनकर काम करते रहे.

मशहूर अभिनेत्री रीना राय का असली नाम सायरा खान था. जॉन अब्राहम भी दरअसल एक मुस्लिम है जिसका असली नाम फरहान इब्राहिम है.

जरा सोचिए कि पिछले 50 साल में ऐसा क्या हुआ है कि अब ये मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि उनका मुस्लिम नाम उनका ब्रांड बन गया है. यह उनकी मेहनत का परिणाम है या हम लोगों के अंदर से कुछ खत्म हो गया है?

वे बड़े तरीके से एक्सेप्ट करवाते हैं. यह नार्मल है. सहिष्णुता है. परंतु अपनी स्त्रियों को सात पर्दे में छुपा कर रखते हैं. दुतरफा तलवार है.

ये आधुनिकता के नाम पर बाजार के माध्यम से आक्रमण है. फ्रेन्डशिप बैन्ड, ग्रीटिंग, चॉकलेट के गिफ्ट पैक, सबने अपना बाजार सेट कर लिया है.

फ्रेंडशिप बैड को बाजार में बिकवाने वाला जेंडर है करण जौहर… जिसके बारे में न जाने क्या-क्या प्रसिद्ध है. ‘कुछ-कुछ होता है’ जैसी फिल्म से एक ट्रेन्ड सेट कर दिया… दोस्ती शब्द का दुरूपयोग.

उसने भारत के युवा वर्ग को टारगेट किया आधुनिकता के ड्रामे में सॉफ्ट टारगेट खड़ा कर दिया. यह सब पूरी रचना-योजना से हुआ. लव-जेहाद का मैदान पचास साल से तैयार किया जा रहा था.

जरा सोचिए! एक मरियल से हकले को लेकर एक कॉमन जेंडर किस युद्ध के मैदान को फतह करवा रहा था. इसका शिकार सबसे अधिक महिलाएँ हुईं.

लेकिन दंगल और रईस का बुरी तरह पिट जाना इस बात का संकेत है युद्ध के नगाड़े बज चुके हैं. छुपे हथियार पहचाने जा चुके हैं.

आप पता करिये कितने पुराने मुस्लिम अभिनेताओं, कलाकारों, कर्मियों की बेटियां फिल्म लाइन में जाने दी गयी?

कभी सोचा आपने महान शोमैन राज कपूर अपने जीते-जी कपूर खानदान की बेटियों को क्यों नही सिनेमा में काम करने देते थे. अमिताभ बच्चन अपनी बेटी को फिल्मो में क्यों नही ले गए?

बाद के सभी शिकार थे… वामी-सामी-कामी हथकंडा सफल होता गया.

फिर जरा सोचिए कि हम किस तरह की फिल्मों को, और लोगों को बढ़ावा दे रहे हैं?

क्या वजह है कि बहुसंख्यक बॉलीवुड फिल्मों में हीरो मुस्लिम लड़का और हीरोइन हिन्दू लड़की होती है?

समझ, तथ्य, प्रमाण और आंकड़े साफ़-साफ़ जता रहे हैं कि सब कुछ असहज है, कोई बड़े तरीके से चीजें कंट्रोल कर रहा है. आपकी स्त्रियां-बच्चे निशाने पर हैं.

फिल्म उद्योग अपने सबसे बड़े फाइनेंसर दाऊद इब्राहिम, उसके गुर्गो और हवाला माफियाओं के कंट्रोल में रहा है. वही यह चाहता है.

कभी टी-सीरीज़ के मालिक गुलशन कुमार ने उसकी बात नहीं मानी और नतीजा सबने देखा. राकेश रोशन पर भी गोलियां चली… और भी तमाम कुछ. वहां एक गड़बड़ झाला काबिज है.

आज भी मुस्लिम हीरो साइन करते ही एक फिल्मकार को दुबई से आसान शर्तों पर कर्ज मिल जाता है. इकबाल मिर्ची और अनीस इब्राहिम जैसे आतंकी एजेंट सात सितारा होटलों में खुलेआम मीटिंग करते देखे जा सकते हैं.

सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, नसीरुद्दीन शाह, फरहान अख्तर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, फवाद खान जैसे अनेक नाम हिंदी फिल्मों के सफलता की गारंटी इमेज में ढाल दिए गए हैं.

अक्षय कुमार, अजय देवगन और ऋतिक रोशन जैसे फिल्मकार इन दरिंदों की आंख के कांटे हैं. उनकी फिल्मों की रिलीज़ के वक्त जरा मुस्लिम समुदाय के रिएक्शन पर गौर फरमाएं… बहुत कुछ समझ जाएंगे.

तब्बू, हुमा कुरैशी, सोहा अली खान और जरीन खान जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का कैरियर जबरन खत्म कर दिया गया. क्या एक साथ उनका कैरियर खत्म हो जाना संयोग है?

अगर आप यह नहीं समझ रहे हैं तो फिर आप जरूरत से ज्यादा भोले हैं… साफ़-साफ़ समझिये वे मुस्लिम हैं और इस्लामी जगत को उनका काम गैर मज़हबी लगता है.

फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मुस्लिम लेखकों के इर्द-गिर्द ही रहा है. आप जानकर स्तब्ध रह जाएंगे कि मैक्सिमम स्क्रिप्ट राइटर या तो कम्युनिस्ट हैं या मुस्लिम.

वे आतंकियों, माफियों, गुंडों, देशद्रोहियों को लॉजिकल बना कर आपके सामने लाते हैं. वे कम्पनी, माफिया, फिज़ा जैसी फिल्म बनाकर अपराधियों को नायक इम्पोज़ करते हैं. सूची बनाइये खुद साफ़ दिखने लगेगा.

आप ‘माई नेम इज खान’ बनाने के पीछे की मानसिकता समझिये. वे हॉलीवुड की मेगा-हिट ‘मोमेंटो’ जैसी फिल्मों की चोरी भी ‘गजनी’ बनाकर गजनवी की क्रूरता भुलवाते हैं.

वे ‘फिज़ा’ ‘फना’ बनाते हैं आतंकियों को जस्टिफाई के लिए. औरँगेजेब बनाते हैं उसकी स्वीकार्यता बढाने के लिये. अपने नवजातो का नाम ‘तैमूर’ रखते हैं, आपके ज़ख्मों को कुरेदने के लिए, क्रूरता को एक्सेप्ट कराने के लिए.

कला के नाम पर कोई फ़िदा हुसैन माँ सरस्वती का अश्लील चित्र बनाता है. लिस्टिंग करिये एक लाख से ऊपर ऐसे आक्रमण दिखेंगे. अभिव्यक्ति के नाम पर कोई भी देवी-देवताओं का मजाक उडाता है….

गौर से देखिये… यह वही हैं जो कभी सेना लेकर बुतशिकन करने हिंदुस्तान आता था. हजारों टूटे मंदिर, लुटे घर द्वार, मारे गए लोग, उठाकर ले जाई जाती औरतें-बच्चे, सिरों की मीनार…

अब बहरूपिया बनकर आये हैं. तर्ज बदल गया है. उन्हें पहचानना सीखिए… हथियार बदल गए हैं. देश के बंटवारे के बाद यह कोई सहज सी घट रही घटनाएं नहीं है. न ही गंगा-जमुनी जैसा बहकावा बल्कि हमले का ही दूसरा प्रकार है.

जिनकी कहानियों में एक भला-ईमानदार मुसलमान, एक पाखंडी ब्राह्मण, एक अत्याचारी-बलात्कारी क्षत्रिय, एक कालाबाजारी वैश्य, एक राष्ट्रद्रोही नेता, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक गरीब दलित महिला होना अनिवार्य शर्त है. इस तरह की कुछ फिक्स सी चीजें भी हैं.

इन फिल्मों के गीतकार और संगीतकार भी मुस्लिम हों तभी तो एक गाना मौला के नाम का बनेगा और जिसे गाने वाला पाकिस्तान से आना जरूरी है. अंडरवर्ड के इन हरामखोरों की असलियत को पहचानो और हिन्दू समाज को संगठित करो, तब ही तुम अपने धर्म की रक्षा कर पाओगे.

चाणक्य का एक कथन याद है न?

सब कुछ छोड़कर सबसे पहले कुल और स्त्रियों को बचाओ.

यदि इन्हें आप केवल अभिनेता (निर्माता-निदेशक, हीरो, कलाकार) समझ रहे हैं तो बुद्धि की बलिहारी है. आप सावधान हो जाएं वरना वे आप के बची-खुची सभ्यता को निगल जायेगे.

अपनी बहन-बेटियां बचाओ. युद्ध मैदानों में नहीं लड़े जाते, न ही अब सीधे मंदिर तोड़े जाते हैं. वे औरते छीनने और बच्चो को गुलाम बनाने का कोई न कोई तरीका निकाल ही लेते हैं. अब फ़िल्में इस युद्ध का नया बेजोड़ हथियार हैं. तुम्हारी बेटियाँ-बहन, बच्चों को बर्बाद करने का हथियार.

नहीं सम्हले तो आने वाली पीढ़ियां आप को कायर डरपोक तो कहेंगी ही, साथ में महा नासमझ-मूर्ख भी कहेंगी… कि सब कुछ जानते हुए भी आप ने उन को आपने घर में घुसने दिया. बचाने छोड़ने का रास्ता क्यों नही अपनाया. सबसे आसान तरीका है इनकी फिल्मों को अपने बच्चों को मत देखने दो, मीडिया चाहे जितना कमाने का प्रचार करे.

वे पिट जाएंगे रईस, दंगल और फैन की तरह. अगर कमा रहे होते तो सभी राज्यो के मनोरंजन कर में जमा भी हुआ होता. इनकम टैक्स विभागों में हिसाब होता.

झूठ के हथकंडे खत्म हुए.

साभार – इस लेख के कुछ सन्दर्भ मूलत: मेरे सहपाठी-मित्र Dharmendra Paigwar जी का भेजा हुआ है जो कि भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

क्रमशः 5

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY