किसने और क्यों कहा था इस्लाम को शांति का धर्म!

इस्लाम को ‘रिलिजन ऑफ़ पीस’ याने शान्ति का धर्म कहा जाता है. यह चलन कब से है, पता है?

कुछ लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि इस्लाम को शांतिधर्म कहने वाला ना उनका प्रेषित था, न खलीफा! न ही वह कोई मुस्लिम था. इतना ही नहीं, वह इस्लाम की दुनिया को बड़ी भारी चोट पहुंचाने वाला एक आधुनिक देश का प्रमुख था, जिस देश के लगभग 3500 नागरिकों को 19 इस्लामी कट्टरपंथियों ने बड़ी भयानक मौत मारा था!

जी हाँ! अमरीका के 43वें राष्ट्राध्यक्ष जॉर्ज डब्ल्यू बुश पहले प्रसिद्ध व्यक्ति थे जिन्होंने इस्लाम को शांतिधर्म कहा, वह भी तब जब अमरीका इन शांतिधर्मियों की करतूत से लहूलुहान था!

इस पर एक के बाद एक विश्व नेताओं ने इस्लाम को शान्ति का धर्म होने का प्रमाणपत्र दे डाला! कारण इस्लाम का वाकई शान्तिवादी धर्म होना नहीं था, बल्कि उन सारे देशों में इस्लाम का अशांति का कारण बनने की संभावना और क्षमता का था!

इन नेताओं के सामने इस्लाम के खिलाफ उठे प्रचंड रोष को शांत करने की बड़ी चुनौती थी. इसमें चूक होने पर दंगे या गृहयुद्ध छिड़ जाते. दूसरी ओर इन हत्याओं के बदले के रूप में प्रचंड प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई करने के लिए इन्हें राजनीतिक रूप से बाध्य होना पड़ता. युद्ध ऐसे ही एक दिन में छेड़ा नहीं जाता, लेकिन जनभावनाएँ इसे समझ नहीं सकती, और तुरंत प्रतिशोध चाहती हैं!

इन परिस्थितियों में जनक्षोभ और इस्लाम के बीच एक दूरी बनाए रखनी अनिवार्य थी, जिसे इस ‘शांतिधर्म’ शिगूफे ने अंजाम दे दिया!

अब 9/11 की हत्याओं का दोष इस्लाम के माथे नहीं मढ़ा जा सकता था! दुनिया भर के हिंसाचार, दहशतगर्दी और कुकर्मों से इस्लाम को निजात मिल गई, और इस्लाम के खिलाफ का रोष बगैर कोई जमीनी नुकसान के शांत हो गया!

बुश ने बाद में मध्य पूर्व के देशों और अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ युद्ध जरूर छेड़ा, पर उस की मंशा इस्लाम के खिलाफ प्रतिशोध न रह कर अपने विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति थी. इस्लाम किसी दोषारोप के पार पहुँच चुका था, और इस्लामी नेतृत्व भी इसी दलील को आगे खींचता चला गया, क्योंकि इस्लाम के लिए यह बड़ी ही फायदे की दलील थी!

लेकिन क्या इस्लाम वाकई एक शांतिपूर्ण धर्म रहा है? कतई नहीं!

मुहम्मद के धर्म प्रचार के पहले के कुछ साल जरूर शांतिपूर्ण थे, लेकिन वे इसलिए नहीं कि शान्ति, धर्म के सूत्रों का केंद्रबिंदु थी, बल्कि इसलिए कि मुहम्मद और उनके अनुयायी अभी किसी बड़े उत्पात के लिए पर्याप्त रूप से शक्तिशाली नहीं थे.

उसके बाद वे मक्का से मदीना स्थानांतर कर गए, और मदीना में जैसे उनकी शक्ति बढ़ी, उनकी हिंसा भी बढ़ी. वहां धर्म के साथ राजनीति भी तत्कालीन परिदृश्य का हिस्सा बनी, और कई राजनीतिक हत्याएं और अन्य हिंसा को अंजाम दिया गया. यह सब मुहम्मद के जीवनकाल में ही हुआ.

प्रेषित के देहावसान के बाद भी इस्लाम राजनीतिक रूप से एक प्रभावशाली शक्ति बन के मध्य पूर्व में उभरा, वह तलवार के बल पर ही. यूरेशिया, मध्य पूर्व, अर्वाचीन पाकिस्तान, भारत, यहां तक की पश्चिमी चीन और दक्षिण पूर्व एशिया में इस्लाम फैला तो शांतिपूर्ण धर्म प्रचार की वजह से नहीं, बल्कि तलवार की नोक पर, और स्थानिक जनता को दुर्दान्त पीड़ा पहुंचा कर!

आज जो 150 करोड़ इस्लाम के मतावलंबी है, उन में से अतीत में इस्लामी पीड़ा की बलि बहुतांश के पूर्वज होंगे!

इस्लाम के धर्मग्रन्थ भी हिंसा के आह्वानों और आदेशों से पटे पड़े है, जो इस बात से इत्तेफ़ाक़ न रखते हो, वे बस एक गूगल सर्च करें.

खुद इस्लाम के जानकार इस्लाम को ‘शान्ति’ का नहीं, बल्कि ‘शरणागति’ का धर्म मानते है. इन दो शब्दों के मूल अरबी भाषा में शायद मिलते हैं. लेकिन जो इस्लामी विद्वान अपने धर्मग्रंथों को ठीक से जानते है, वे कदापि उसे ‘शान्ति’ का धर्म कहने की भूल नहीं कर सकते है.

अतः मित्रों, न खुद कहें, की इस्लाम शान्ति का धर्म है, न औरों का ऐसा कहा सुनें. जो है, जैसा है, बताने का आग्रह करें! कौन जाने आप के इस आग्रह से किसी का मत परिवर्तन हो जाए, और दुनिया एक कट्टरपंथी का सामना करनें से बचे!

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