हम कब समझेंगे ‘शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चिंताम प्रवर्तते’ का ध्रुव सत्य!

कभी-कभी न चाहते हुए भी अनायास मुंह से सच ही निकल जाता है. मस्तिष्क में उभरे विचार को कोई सायास दबा तो देता है मगर वो चुभी हुई फांस की तरह तब तक तकलीफ़ देता रहता है जब तक उसे निकाल नहीं दिया जाता.

संसार के सबसे भयानक नरसंहारों में सबसे बड़े नरसंहार ईसाइयों और इस्लामियों द्वारा हम मूर्तिपूजकों के हैं. जिन्हें उन्होंने चतुर भाषा में पैगन कहा है. इसके बाद ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा ही यहूदियों के नरसंहार आते हैं.

जैसा चिंतन आज इस्लाम का है वैसा ही हत्यारी सोच शताब्दियों तक ईसाईयत की भी रही है. सारा यूरोप, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, अफ़्रीक़ा, भारत इनके शिकार करने के क्षेत्र रहे हैं. विश्व के ईसाईकरण और इस्लामीकरण का इतिहास भयानक रक्तपात से सना हुआ है.

इस बात से विश्व-इतिहास के सभी जानकर परिचित हैं मगर प्रजातंत्र में वोटों के लिए कहीं सांप्रदायिक एकता का ड्रामा, कहीं मल्टी-कल्टी की नौटंकी के कारण लोग चुप लगा लेते हैं.

इस लेख का आधार स्पेनिश लेखक सैबेस्टियन वीलर रोड्रिग्ज़ का 15 जनवरी 2008 का लेख है मगर वह भारत के सन्दर्भ में भी बहुत सटीक है. आइये तथ्यों का अवगाहन किया जाये.

“मैं बार्सिलोना में सड़क पर जा रहा था. अचानक मुझे एक भयानक सत्य का अहसास हुआ कि यूरोप की ऑश्वित्ज़ में मृत्यु हो गई है. (नये पाठकों के लिए जानना उपयुक्त होगा कि ऑश्वित्ज़ दक्षिण-पश्चिम पोलैंड में नात्सियों द्वारा यहूदियों को यातना दे कर मार डालने के लिये बनाये गए कैम्प थे. जहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 60 लाख यहूदियों को भयानक मृत्यु के घाट उतार दिया गया.)

हमने साठ लाख यहूदियों की हत्या कर दी और उन्हें 2 करोड़ मुसलमानों के साथ बदल दिया. ऑश्वित्ज़ में हमने एक पूरी संस्कृति, विचार, रचनात्मकता, प्रतिभा को जला दिया. हमने चयनित लोगों को सही मायने में चुन-चुन कर नष्ट कर दिया. (यहूदी स्वयं को ईश्वर द्वारा चुने गए लोग मानते हैं).

हमने उन लोगों को नष्ट किया जो वस्तुतः महान और अद्भुत लोग हैं. जिन्होंने संसार को उन्नत बनाया. इन लोगों के योगदान को विज्ञान, कला, अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे जीवन के सभी क्षेत्रों में और सबसे बढ़ कर संसार की अंतश्चेतना के रूप में महसूस किया जाता है. हम ने इन लोगों को जला दिया.

इसके बाद सहिष्णुता का ढोंग करते हुए हमने नस्लवाद के रोग के इलाज का दिखावा किया और अपने फाटकों को 2 करोड़ मुस्लिमों के लिये खोल दिया. जो हमारे यहाँ मूर्खता, अज्ञानता, धार्मिक उग्रवाद और असहिष्णुता, अपराध की बढ़वार ले कर आये.

ये काम करने में अनिच्छुक हैं और अपने परिवार का स्वाभिमान से पोषण नहीं करना चाहते. उन्होंने हमारी ट्रेनों को उड़ा दिया और अब हमारे सुंदर स्पेनिश शहर तीसरी दुनिया के गंदगी और अपराध में डूबे शहर बन चुके हैं.

स्वयं हमने अपने दुखों को बढ़ावा देते हुए संस्कृति का कट्टर घृणा से, रचनात्मक कौशल का विनाशकारी कौशल से, योग्यता का पिछड़ेपन और अंधविश्वास से परावर्तन कर दिया .

वह अपार्टमेंट जो सरकार की ओर से उन्हें नि:शुल्क दिए गए हैं, बंद कर दिए जाने चाहिए. वे अपने सरल पड़ौसियों की हत्या और विनाश की योजना बनाते हैं. हमने यूरोप के यहूदियों की प्रतिभा, उनमें अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की ललक, उसके लिए स्वाभाविक शांति की तलाश की उन लोगों से अदला-बदली कर ली, जो मृत्यु को लक्ष्य मानते हैं. जो हमारे बच्चों के लिए मृत्यु की कामना करते हैं.

योरोप ने कितनी भयानक ग़लती कर ली. इस्लाम की विश्व भर में आबादी लगभग एक सौ बीस करोड़ है अर्थात मुसलमान दुनिया की आबादी का 20% है. उन्हें अब तक निम्नलिखित नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुए हैं.

साहित्य के लिए एक मात्र 1978 में नगीब महफूज़ को, शांति के लिये 1978 में अनवर सादात को, 1990 में इलियास जेम्स कोरी को, 1994 में यासर अराफ़ात को, 1999 में अहमद जीवाई को, अर्थशास्त्र में किसी मुसलमान को कुछ नहीं मिला, भौतिक शास्त्र के लिए किसी मुसलमान को कुछ नहीं मिला, औषधि शास्त्र के लिए 1960 में पीटर ब्रायन को, 1998 में फ़रीद मुराद को, इस तरह कुल हुए 7.

विश्व भर में यहूदियों की कुल जनसँख्या 1 करोड़ 40 लाख है और यह वैश्विक जनसँख्या का 0.02% होता है. इन्हें साहित्य के लिए 10, शांति के लिए 8, भौतिक शास्त्र के लिए 53, अर्थशास्त्र के लिए 13, औषधि शास्त्र के लिए 45 यानी कुल 129 नोबल पुरुस्कार प्राप्त हुए हैं.

यहूदी, सैन्य प्रशिक्षण शिविरों में बच्चों के भेजे की धुलाई करके खुद को उड़ाने, अधिकतम यहूदियोंऔर अन्य गैर मुसलमानों को मारने का प्रशिक्षण नहीं देते. यहूदी विमानों का अपहरण नहीं करते, न ही ओलंपिक में एथलीटों को मारते हैं. न जर्मन रेस्तरां में खुद को उड़ाते हैं . एक भी यहूदी चर्च को नष्ट करता हुआ नहीं पाया गया है.

संसार में एक भी यहूदी लोगों को मारने के पक्ष में नहीं है. यहूदियों गुलामों का व्यापार नहीं करते, न ही उनके नेता काफिरों के लिए जिहाद और मूर्तिपूजकों के लिए मौत का आह्वान करते हैं.

दुनिया के मुसलमानों को अपनी सभी समस्याओं के लिए यहूदियों को दोष देने की जगह शिक्षा के क्षेत्र में अधिक निवेश करना चाहिए. मुसलमानों को, इससे पहले वे मानव जाति से आदर की मांग करें ख़ुद से पूछना चाहिए कि वे मानव जाति के लिए क्या कर सकते हैं.

इजरायल और फिलीस्तीन तथा अरब देशों के बीच संकट के बारे में अपनी भावनाओं को एक तरफ कीजिये. यहां तक ​​कि अगर आपको लगता है इजरायल का दोष अधिक है तो भी बेंजामिन नेतन्याहू के दो वाक्यों से सच समझ जा सकता है.

“अगर अरब शस्त्र रख देते हैं तो और अधिक हिंसा नहीं होगी मगर अगर यहूदी आज अपने हथियार देते हैं तो इसराइल ही नहीं होगा.”

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मित्र देशों की सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर, जनरल ड्वाइट आइजनहावर ने जब मौत के शिविरों में हत्याओं के शिकारियों की करतूतों को देखा तो उन्होंने यथासंभव तस्वीरें लिये जाने के आदेश दिए. उन्होंने आसपास के गांवों से जर्मन लोगों को मृतकों को देखने यहाँ तक कि दफ़नाने के लिए भी बुलाया.

उन्होंने ऐसा क्यों किया? उनका आशय उन्हीं के इन शब्दों में मिलता है: ‘सब कुछ रिकॉर्ड पर लाओ. फ़िल्में बनाओ. गवाहियां दर्ज करो. ऐसा न हो कि इतिहास की लंबी सड़क के किसी मोड़ पर कोई कमीना यह कहे कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था.’

मगर इस्लाम के सन्दर्भ में ऐसा होने लगा है. हाल ही में, ब्रिटेन में स्कूली पाठ्यक्रम से इस्लामी नरसंहारों को हटाने की बहस छिड़ी थी. हटाने के पक्ष वाले यह कारण दे रहे थे कि इससे मुलमानों की भावनाएं आहत होती हैं. उनका कहना है कि ऐसे नरसंहार हुए ही नहीं हैं.

इसी तरह यहाँ यह जानना भयावह रूप से स्तब्ध कर देने वाला है कि द्वितीय विश्वयुद्ध जिसमें 60 लाख यहूदी, 2 करोड़ रूसी, 1 करोड़ ईसाई, 1900 ईसाई पादरी जला कर, पीट-पीट कर, भूखा रख कर, बलात्कार करके, अपमानजनक प्रयोग कर-कर के मार डाला गया, उनके बारे में जर्मन समाज का कुछ हिस्सा सामान्य विश्व से भिन्न सोच रखता है.

इसी तरह इन इस्लामी नरसंहारों को ईरान झुठलाने लगा है. संसार को भूलना नहीं चाहिये, भूलने देना देना नहीं चाहिये कि इतिहास में क्या हुआ था. इसका ध्यान रखने से हम इससे लड़ेंगे. परिणामतः इससे हमारी दुनिया हमारे लिये हमारे बच्चों और उनके बच्चों के लिए एक सुरक्षित जगह हो जायेगी.”

यह तो हुई स्पेनिश लेखक सैबेस्टियन वीलर रोड्रिग्ज़ के 2008 में छापे लेख की बात. अब हम वृहत्तर भारत का सन्दर्भ लेते हैं.

हमने सदैव से ही बाहर से आने वाले किसी भी समूह का स्वागत किया है. बिना इसका ध्यान किये कि वो समूह हमारी धरती पर किस लिए आया है? इस्लाम के प्रारम्भिक जत्थे स्थल मार्ग से हमारी ओर बग़दाद के इस्लामी साम्राज्य के ध्वस्त होने के बाद आये थे.

क़ज़ज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, आज़रबाइज़ान, ईरान, ईराक़, अफ़ग़ानिस्तान इत्यादि क्षेत्रों में इस्लामी आक्रमणकारियों ने समूची हिंदू, बौद्ध आबादी को नष्ट करने का कार्य शुरू किया. इस क्रम में सम्पूर्ण इस्लामी ख़िलाफ़त में मंदिरों, बौद्ध विहारों का ध्वंस होने लगा.

इस से कुपित हिंदू सेनापति चंगेज खान के पौत्र हलाकू खान बग़दाद पर चढ़ दौड़े. उनकी प्रचंड मार से मुस्लिम समाज त्राहि माम् त्राहि माम् करता हुआ भाग-भाग कर शांत क्षेत्र यानी भारत की केंद्रीय भूमि की ओर आया.

संभव है किसी मित्र को इन महान योद्धाओं के हिन्दू होने में संदेह हो अतः ऐसे मित्रों से निवेदन करूँगा कि किसी भी प्रतिष्ठित प्रकाशक की इन योद्धाओं पर पुस्तक खरीद लीजिये.

पहले ही पृष्ठ पर भगवान महाकाल का चित्र दिखाई देगा. ये वही महाकाल की मूर्ति है जो नेपाल के हनुमान ढोका मंदिर के प्रांगण में लगी हुई है. भगवती दुर्गा के चित्र भी इन्हीं पुस्तकों में मिलेंगे. उनकी सेनाओं के ध्वज देखिये. उनके ध्वजों को त्रिशूल में पिरोया जाना ही वास्तविकता बता देगा. अंग्रेज़ी फ़िल्म मंगोल्स देखिये. इन्हीं तथ्यों से साक्षात्कार होगा.

प्रतापी भरतवंशी योद्धा पूज्य हलाकू खान की मार से त्रस्त बग़दाद की इस्लामी ख़िलाफ़त के बचे इस्लामियों को हमारे पूर्वजों ने शरण दे दी. दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि मंदिरों, बौद्ध विहारों के ध्वंस के कारण कुटे-पिटे इस्लामियों को मंदिरों, बौद्ध विहारों के मूल देश भारत भर में ही स्थान दिया गया.

सामान्य राजनैतिक चतुराई तो कहती है कि किसी भी भिन्न सांस्कृतिक समूह पर दृष्टि रखो. ध्यान रखो कि वो क्या कर रहा है ? उसका चिन्तन, खान-पान, शिक्षा क्या है मगर मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना मानने वाले समाज ने इसका ध्यान नहीं किया.

परिणामस्वरूप काफ़िर वाजिबुल क़त्ल (अपने से भिन्न विश्वासी हत्या के पात्र हैं), क़िताल फ़ी सबीलिल्लाह, जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह (अल्लाह की राह में क़त्ल करो, अल्लाह के लिए जिहाद करो), बुतपरस्ती कुफ़्र है और कुफ्र को मिटाना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है, मानने वाले इस्लामी गिरोह भारत भर में फ़ैल गये.

स्वयं को स्थापित, सबल करने के बाद इन्होंने बाहर से मदद जुटाई, शक्ति बढ़ाई और शरण देने वाला राष्ट्र, शरण मांगने वालों के लम्बे समय तक अनाचार, व्यभिचार, जज़िया, बलात्कार, ग़ुलाम बनाये जाने का शिकार हुआ.

वृहत्तर भारत इस्लाम के आतंक का सबसे अधिक शिकार हुआ है. इसी धरती पर इस्लाम ने जला-जला के, पीट-पीट के, आरे से चीर के, दीवार में ज़िंदा चुनवा कर, टुकड़े-टुकड़े कर के, भूखा रख के, जघन्य बलात्कार करके, अपमानित कर के करोड़ों लोग शताब्दियों तक लगातार मारे हैं.

किसी भी सभ्य मनुष्य को इन हत्याकांडों पर जुगुप्सित आश्चर्य होगा. स्वाभाविक है कि कोई सामान्य मनुष्य, विश्व भर में जहाँ-जहाँ भी इस्लामी गए, ऐसे अनाचार को न समझ पाए. इसका कारण मुसलमानों को इस्लाम के आधार ग्रन्थ क़ुरआन के अमुस्लिमों के लिए दिए गए आदेश हैं.

ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये (9-123)

और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो (2-191)

काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये (8-39)

ऐ नबी! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है (9-73 और 66-9)

अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है (9-68)

उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर, जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें (9-29)

मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं (9-28)

जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है (5-72)

ऐसा भयानक चिंतन प्रारंभ में ही थाम लिया जाना चाहिए था. इसके नाख़ून काट लिये जाने चाहिए थे, तीखे दांत तोड़ दिये जाने चाहिए थे, मगर ऐसा नहीं हुआ. हमारी शांतिपूर्ण, ध्यान को जीवन समझने वाली भुजा बौद्ध धर्म को मानने वाले देश भी इसका शिकार हुए. यह देखना बहुत अजीब लगता है कि संसार में सबसे अधिक शांतिप्रिय बौद्ध मूल के देशों में इस्लाम के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठाने लगी हैं.

पड़ोसी देश श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुओं ने मुख्यत: मुसलमानों के ख़िलाफ़ ‘बोडु बाला सेना’ नाम का संगठन बना लिया है. ‘बोडु बाला सेना’ का मुख्यालय कोलंबो के बुद्धिस्ट कल्चरल सेंटर में है. इसका उद्घाटन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे किया था.

इस संगठन के लाखों समर्थक हैं, जो मानते हैं कि श्रीलंका को मुसलमानों से खतरा है. हज़ारों लोग उनकी रैलियों में शामिल होते हैं. सोशल मीडिया पर भी उनकी अच्छी-ख़ासी पहुँच है. वे अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक विश्वासों, पूजा-पाठ के तरीकों और विशेषकर मस्जिदों को निशाना बना रहे हैं.

म्यामांर में मांडले के बौद्ध भिक्षु पूज्यचरण अशीन विराथु चट्टान की तरह दृढ क़दम जमाये खड़े हैं. अशीन विराथु अपने प्रभावशाली भाषणों से जनता को समझा रहे हैं कि यदि अब भी वो नहीं जागे तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा.

जनता का धैर्य टूट चुका है और लोग इस हद तक भड़क उठे हैं कि दुनिया में सबसे शान्तिप्रिय माने जाने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने भी हथियार उठा लिये हैं. अब बर्मा की तस्वीर बदलने लगी है.

इस्लामी आतंकवाद की पैदावार हिंसक झड़पों एवं उनके भड़काऊ भाषणों पर पूज्य अशीन विराथु के तेजस्वी उद्बोधनों से बर्मा की सरकार ने सेकुलरिज्म दिखाते हुए विराथु को 25 वर्ष की सजा सुनायी थी. लेकिन देश जाग चुका है और जनता के जबरदस्त दबाव में सरकार को उन्हें उनकी सजा घटाकर केवल सात साल बाद 2011 में ही जेल से रिहा करना पड़ा.

रिहा होने के पश्चात भी विराथु की कट्टर राष्ट्रवादी सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. और वे अनवरत रूप से अपने अभियान में लगे हैं. म्यांमार में हुई हिंसक घटनाओं के बाद से अब प्राय: पूरी दुनिया में बौद्धों और मुस्लिमों में भारी तनातनी पैदा हो गई है.

केवल म्यांमार और श्रीलंका के बौद्ध ही नहीं… चीन में भी बौद्धों और मुस्लिमों में टकराव जारी है. चीन ने भी इस्लामी उद्दंडों पर चाबुक़ फटकारना शुरू कर दिया है.

बौद्ध देश चीन के मुस्लिम बहुल प्रांत शिनजियांग के मुसलमान देश के इस क्षेत्र को इस्लामी राष्ट्र बनाने के लिए वर्षों से जेहाद कर रहे हैं. ये लोग चीन में केवल एक बच्चा पैदा करने के क़ानून का भी हिंसक विरोध करते रहे हैं.

यहाँ तुर्क मूल के उईंगर मुसलमान पाकिस्तान के क़बायली इलाकों में आतंक की ट्रेनिंग लेकर चीनी नागरिकों का खून बहाने की साज़िश रचते हैं. चीनी सरकार ने पूरी दुनिया को इस्लामी आग में जलता देखकर सबक़ लिया है और यहाँ के मुसलमानों मनमानी बातें न मानने की नीति अपना ली है.

यहाँ मुसलमानों को दाढ़ी रखने, बुर्क़ा पहनने यहाँ तक कि रोज़ा रखने पर भी पाबंदी लगा दी गयी है. चीन में उइगर दुकानदारों को शराब बेचने के लिए बाध्य कर दिया गया है.

25 वर्ष से कम उम्र के लड़के रोज़ा नहीं रख सकते हैं. मस्जिदों में नहीं जा सकते. इसके बावजूद चीन में आतंकवादी गतिविधियां एवं जेहादी भावना भी लगातार बढ़ रही हैं जिसके कारण यहाँ भी बौद्धों और मुसलमानों में घमासान मचा हुआ है.

हम यह वैश्विक ध्रुव सत्य “शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चिंताम प्रवर्तते” कब समझेंगे ?

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