यात्रा आनंद मठ की – 2 : जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

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ma jivan shaifaly anandmath yatra part 2

पता नहीं कोई करता है या नहीं लेकिन मेरे हाथ में जब भी कोई नई पुस्तक या डायरी आती है तो मैं उसे सबसे पहले सूंघकर देखती हूँ… नई किताब की खुशबू मुझे बहुत पसंद है…. सबसे पहले जिस किताब को सूंघकर देखा था तो वो थी स्कूल के लिए सरकारी दुकानों से खरीदी हुई ढाई रुपये की हार्ड बाउंड और सवा रुपये की पतली नोटबुक और कोर्स की किताबें… पढ़ती कम थी उसकी खुशबू ज्यादा लेती थी…

स्कूली शिक्षा का बहुत अधिक प्रभाव नहीं रहा मुझ पर, इसलिए बस उन पुस्तकों की खुशबू भर याद रही… लेकिन फिर जब होश संभाला (गर वाकई संभाला), जीवन में जब जब कोई नई किताब की खुशबू ली तो बाहर निकल कर आया उस किताब का जादू…. कभी कविता बनकर, कभी कहानी बनकर, कभी यूं ही चार सहेलियां इकट्ठी होकर चूड़ी बाज़ार चूड़ियाँ खरीदने निकल पड़ती है वैसे ही दो चार पंक्तियाँ मेरी डायरी में खनक जाती…

कभी कभी कोई चूड़ी टूटकर ऊंगली में चुभ जाती तो कलम से स्याही की जगह लहू रिसने लगता और कभी दर्द बढ़ जाता तो लहू बेरंग आंसू में बदल जाता… फिर कलम तो चलती रही लेकिन उस बेरंग आंसू से लिखे शब्द मेरे अलावा किसी को दिखाई नहीं देते…

फिर जो भी उसको पढ़ने की कोशिश करता वो अपने दर्द का रंग उसमें उड़ेल देता है…. मेरे शब्दों को नया रंग मिल जाता…. और फिर पढ़ने वाले के जज़्बात जुड़ते जाते….

इस तरह बहुत लंबा सफ़र तय किया…. प्रेम, पीड़ा, प्रतीक्षा को ही शब्दों में उतारती… अमृता प्रीतम और ओशो तो जैसे मेरी कलम की नोंक पर बैठे रहते…. फिर अवतरण हुआ स्वामी ध्यान विनय का… लेखन में प्रेम, पीड़ा, प्रतीक्षा के बाद शब्दों को जैसे आत्मा मिल गयी…. और सब भावनाओं ने एक साथ आवाज़ लगाई… परमात्मा….

अमृता और ओशो के अलावा भी पढ़ने के लिए बहुत कुछ उपलब्ध करवाया गया… लेकिन अमृता और ओशो मेरे अध्ययन की रेल की दो पटरियां बने रहे…. फिर एक नई यात्रा शुरू हुई … मुझे कब क्या पढ़ना है ये स्वामी ध्यान विनय तय करके देते और मेरी आगे की यात्रा होती रही…

बस ऐसे ही जीवन की यात्रा भी जारी है, और ऐसे ही यात्राओं पर भेजने की स्वामी ध्यान विनय की तैयारी भी… यात्रा से पहले की तैयारी, यात्रा के दौरान का समय और यात्रा से लौट कर आने के बाद के अनुभव मेरी आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करते गए….

ऐसी ही एक यात्रा शुरू हुई 23 जनवरी 2017 को….. बहुत सारी अनिश्चितता और जाना – न जाना की उलझन के बाद 22 जनवरी को ध्यान विनय ने निर्णय सुनाया… “जाना है…”. ऑनलाइन रिजर्वेशन देखने बैठे तो नेट गायब, भागकर स्टेशन गए तो रविवार होने के कारण हमारे पहुँचते ही रिजर्वेशन खिड़की बंद…

“जाना है… ” के निर्णय के बाद ये सारी अटकलें कोई मायने नहीं रखती…. एक परिचित से संपर्क कर तत्काल में टिकट की व्यवस्था हुई… 22 की रात 8 बजे टिकट हाथ में आई पता चला 23 की सुबह दस बजे ट्रेन है… टिकट मिलने के बाद घर और मेकिंग इंडिया का काम निपटाने के बाद, बच्चों को सुलाने के बाद देर रात पैकिंग हुई….

सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ा…. स्वामी ध्यान विनय ने हमेशा की तरह मुझे दोनों हाथों से ट्रेन के सुपुर्द किया… ले जाओ माँ जीवन शैफाली को एक नई यात्रा पर…. जी हाँ ट्रेन के ही सुपुर्द किया… जड़ वस्तु की भी अपनी चेतना होती है, इसलिए कई बार वो मुझे अपनी बाइक से भी बात करते हुए नज़र आते हैं…

सफर में पढ़ने के लिए एक पुस्तक रख ली.. नाम… आनंद मठ … लेखक बंकिमचन्द्र, वही बंकिम चन्द्र जिनके बारे में कहा जाता है कि गुरुदत्त उनका पुनर्जन्म है….
सुबह 10 बजे ट्रेन चलते ही मैंने पुस्तक खोल ली… पहले पन्ने पर लिखा था…

“हम लोग दूसरी किसी माँ को नहीं मानते –
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी..
हम कहते हैं – जन्मभूमि ही माता है….

पढ़ते ही सबसे पहले यही ख़याल आया…. मैं तो अपनी जन्मदेने वाली माँ को मिलने गुजरात जा रही थी… अपनी रूठी हुई माँ को… क्या सच में “हम जैसे लोग दूसरी किसी माँ को नहीं मानते”

चलो ठीक है… फिर भी एक प्रयास और करने को तैयार थी… 22 साल बाद गुजरात जा रही थी…. और 19 साल बाद विशेष रूप से माँ से मिलने…. क्योंकि जब तक पिता जीवित थे तब तक सिर्फ पिता से मिलने जाती थी…. माँ बात नहीं करती थी…. बात तो पापा से भी नहीं हो पाती थी.. उनसे मिलती तो हम नहीं बोलते थे, बस हमारे आंसू बोलते थे…. माँ को तो बस धोखे से अचानक से गले लग जाती और वो मुंह बनाकर पत्थर सी मूरत सी खड़ी रहती तो हौले से कभी उनके माथे पर हाथ रख देती या माथे को चूम लेती… जैसे वो मेरी माँ नहीं रूठी हुई बेटी हो….

पिता की मृत्यु के बाद अपनी मानस माँ अमृता प्रीतम के जन्मदिन पर एक लेख लिखा था….

मानस माँ एमी और माँ की बड़ी बिंदी का क़र्ज़

पिता की मृत्यु के बाद समय पीछे की ओर लौटने लगा… याद आई माँ की बड़ी सी बिंदी…. फिर उनका स्कूल के लिए मेरी चोटी करना… गर्मी की छुट्टियों में लम्बे बालों का अम्बोड़ा…. थोड़ा और पीछे चली गयी…. तो कच्चे दूध की खुशबू से मन भीग गया और फिर दिखने लगा माँ की कोख का अँधेरा…………

आज भी उसी अँधेरे की तलाश होती है हर संतान को जब जब वो जन्म देने वाली धरती से कटने लगता है….. मेरी तो सारी जड़ें ही समय की दीमक चट कर गयी है…

क्या शिकायती लग रहा है लहज़ा?…. अरे नहीं अब नहीं… अब तो वो सारी सीवन, तुरपन को खोल रही हूँ जो फटी किस्मत को छुपाने के लिए पैबंद के रूप में लगाई थीं…. बस उसी के टूटे हुए धागे हैं…

ये हकीकत का आसमान है जिस पर चाँद का पैबंद लगा था…. उम्मीदों के तारे टंके थे… टूटते तारे से मन्नत नहीं माँगा करती मैं… मन्नतें इल्तजाएं होती हैं… मैंने तो हक़ छोड़े हैं….
लेकिन आदतें नहीं छोड़ पाई… माँ की तरह सब्जी बनाने की आदत… माँ की तरह बड़ी बिंदी लगाने की आदत….

सोचती हूँ कैसी लग रही होगी बिना बिंदी की वो सूरत… जिसका माँ होने का क़र्ज़ माफ़ कर दिया और अपनी कोख के जायों में बाँट दिया… तयशुदा हो चाहे माँ का बच्चों से दूर रहना, सबकी यात्रा का हिस्सा… लेकिन अनुभव… अनुभव की मार तो उसे खाने वाली की ही होती है… किस्मत ने ज़ोरदार तमाचा लगाया…. माँ से दूरी का बदला… बच्चियों से दूरी…

आज फिर कोख के अँधेरे में दुबकी तो अपनी मानस माँ का चेहरा दिखा…. अलमारी की तरफ हाथ बढ़ाया तो हाथ में आई एक थी सारा….. एमी माँ जो कुछ कह सकती थी ऐसे समय में उस किताब के ज़रिये कह गयी… एक साथ 60 पन्ने पढ़ गयी… पापा की मृत्यु के बाद के दिन से रुके हुए आंसुओं को रोकने में एक बार फिर कामयाब रही….

किताब में सारा शगुफ्ता लिखती है –

यह भी सच है, मेरी बेबाकियों की वजह से भाई-बहन, शायर, अदीब, इज्जतदार सोसायटी मुझे बड़ी नफरत से देखती है. ऐसा क्यूं है अमृता?

कहीं लोग सच तो नहीं बोल रहे और मैं अपनी छोटी-छोटी चोरियों की बदौलत, अपनी रंगसाजी में मसरूफ हूँ. चंद रोज़ पहले बहुत अच्छे-अच्छे लोगों ने मुझे मिलने से इनकार कर दिया- “सारा साहिबा, आप हमारे घर मत आया करें.”

(याद आया वो वाकिया… जब मातापिता की मर्जी के खिलाफ की शादी के 6 साल बाद पापा के एक बहुत करीबी रिश्तेदार घर पत्रिका देने आये… बेटी की शादी है शैफाली… ये पत्रिका … लेकिन तुम आना नहीं…. बस मन था तुम्हें बताने का तो चले आए… मैंने मुस्कुराते हुए वादा किया… चिंता मत करो नहीं आऊँगी…)

सीढ़ियों से क्या उतरी, मैं तो अपने चेहरे से उतर गयी. मैंने सारा से कहा, ज़मीर के नमक से आटा गूंथती है. ज़रूर तेरे लिबास में ऐसा रंग है, जो मुझे नजर नहीं आता. अब जानों कि पढ़े-लिखे लोगों के घर में अब मेरा कोई कोढ़ नहीं.

ज़मीर और आँखों में कुछ फासला रह गया है, अमृता! जभी तो लोग मेरी गिरी हुई आँखें मुझे थमाते रहते हैं. ज़र्द लहू में ज़र्द पत्तों की चीखें आती हैं, तो खिजां से आँखें मरने लगती है अमृता!

सच्चाइयों के नंग मुझे मुर्दा क़रार देते हैं….

भाई-बहन मुझे देखते हैं, तो उनकी आँखें दुकान से ज्यादा नहीं खुलती- यह लम्स के कौन से पट हैं, अमृता?

मैं सिर्फ घूंघट-भरी या चादर-भरी औरत तो नहीं, और भी अफकार हैं मेरे पास. कई दरारें हैं मेरे लहू में, रात एक कंजरी की तरह मुझ पे उतरती है, और मेरे शफाफ़ कलेजे से संगरेजे गिरने लगते हैं. बुतों की तराश-खराश आखिर मेरे ही जिम्मे क्यूं?

थिंकर सोसायटी तो अपने गुनाहों का नाम “सारा” बताती है. घर वाले भी कुछ फासले से नहीं रहते.

खानदानी चादरें आखिर इंसान से छोटी होती हैं. मैं लहू का कोई क्लेम मानने पर तैयार नहीं. बहने अपने घूंघटों में ज़ख़्मी ज़बान रखे जाने क्या क्या चुराती रहती हैं. मैं इनके आंगनों का कचरा हूँ, तो लगा क्यूं नहीं देते आग! लहू की लगाम से आख़िर हर वक़्त मेरे लिए फंदा क्यूं बुना जाता है…?

यह कौन-सी कड़ियाँ हैं जो मेरी जंजीरों में सजी हैं? मैं इन छ: बुतों से कम अज कम एक बुत हूँ.

आखिर मेरी भी कोई मिट्टी है.

और फिर अमृता लिखती है….. हमारी ज़मीन से दो तरह की गर्द उठती है. एक सुर्ख रंग की और एक स्याह रंग की. सुर्ख रंग की गर्द वह होती है, जिसे शोहरत कहते हैं और स्याह रंग की गर्द वह, जिसे इलज़ाम कहते हैं.

जिनके बदन पर यह गर्द लिपटती है, अगर स्याह रंग की हो तो लोग अपना बदन चुराकर चलते हैं और सुर्ख रंग की हो तो लोग उसे कीम्खाब की तरह पहनकर चलते हैं…

लेकिन दुनिया में थोड़े से लोग होते हैं- जो उस गर्द को, चाहे वह स्याह हो या सुर्ख, अपनी आत्मा के पानी से, अपने बदन पर से धो सकते हैं…. और सारा दुनिया के उन थोड़े से लोगों में से थी….

एमी माँ ने मेरी आत्मा के पानी पर अपने हरूफ़ का छिट्टा दे दिया… मैंने अपने बदन से सारी गर्द धो डाली… सारा भी तो यही कहती थी ना… ज़िंदा गर्द ज़िंदा बदन पर ही तो मिलेगी….

और जो वो हमेशा अपने लिए कहती थी कि मैं हाथों से गिरी हुई दुआ हूँ….

मेरी नज़र में

अधूरे खुदा का नाम इंसान है….

और पूरे इंसान का नाम खुदा है….

जो कुछ भी गलत है, वह इसलिए है

कि उसके लिए बहुत जगह है… अधूरेपन में.

पूरे में उसके लिए जगह नहीं है…

इसीलिए इंसान खुदा से दुआ माँगता है….

एक अधूरेपन पूरा होने की दुआ माँगता है….

और यही रिश्ता है- इंसान और खुदा के बीच

एक दुआ का रिश्ता….

और एक दुआ मेरे हाथ से गिर गयी… माँ की सूरत देखने की दुआ…. बिना बिंदी के वैसे भी वो केवल स्वर्गीय अरविन्द टोपीवाला की पत्नी ही होगी… मेरी माँ नहीं…..

मेरा और मेरी माँ का रिश्ता माथे की बिंदी का रिश्ता है… पिछले जन्म में साझा था… वो नहीं समझ सकती … मैं समझ पाई लेकिन समझा नहीं पाई…

और माथे की बिन्दी जैसे माथे की दरारों को छुपाने के लिए माँ की दुआ हो गयी ….

और दुआ को ज़ुबान मिली… जिसकी बाहें तुम्हें पिता जैसी लगती है…. वो उन दरारों को हमेशा भरता रहेगा….

ध्यान विनय से हमेशा कहती हूँ…. तुम्हारी बाहों का समंदर बहुत चौड़ा है… न जाने किस किस को समाये हुए हो…. और पापा की महक उनकी छाती से होती हुई… मेरी आत्मा में समा जाती है…..

ma jivan shaifaly with mother

और बंकिम चन्द्र यात्रा के प्रारम्भ में ही संकेत दे देते हैं… हम लोग दूसरी किसी माँ को नहीं मानते……

फिर भी जा रही थी मिलने देखने भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है मेरे लिए इस बार….

जैसा कि तय था स्वर्गीय अरविन्द टोपीवाला की पत्नी मिली… ऐसे जैसे दूर के रिश्तेदारों से मिली, और मिली भी तो कब मासी (माँ की छोटी बहन जो हमेशा मेरे साथ “माँ-सी” ही रही थी) की मृत्यु के बाद उनकी तेरहवीं में…. लेकिन माँ नहीं मिली…. क्योंकि बंकिम दा ने पहले ही संकेत दे दिया था – “हम लोग दूसरी किसी माँ को नहीं मानते”

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी.. – जन्मभूमि ही माता है….

हां मैं अपना यह जन्म माँ भारती को समर्पित करती हूँ…

(यात्रा जारी है)

पहला भाग यहाँ पढ़ें – यात्रा आनंद मठ की – 1 : पांच का सिक्का और आधा दीनार

 

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