दीप्त‍ि जन्मोत्सव : ज़िन्‍दगी धूप तुम घना साया

sushobhit with deepti ma jivan shaifaly

“तुमको देखा तो ये ख़याल आया/ज़िन्‍दगी धूप तुम घना साया.”

जाने कितनों ने कितनी ही दफ़े अपने प्रेम को एक भाषा और भंगिमा देने के लिए इस गीत का सहारा लिया होगा. कोई हिसाब नहीं. प्रेमियों का एंथम है यह. लेकिन ग़ौर से सोचने पर लगता है कि यह गीत प्रेम के बारे में इतना नहीं, जितना कि प्रेम की दुष्‍प्राप्‍यता के बारे में है : नायक के स्‍तर पर, जो कि इस गीत का आख्‍यायक है.

कि नायक भले जान चुका हो कि नायिका उसके लिए राहतों और तसल्लियों के घने साये की तरह है, लेकिन ऐसा वह अभी धूप में खड़ा होकर जान रहा है, या शायद उसे साये तक में धूप लगती है. साये में शिरक़त अभी उसकी तरफ़ से मुकम्मल नहीं. इस गीत में फ़ारूख़ शेख़ ने एक अनिर्वचनीय-सी अन्‍यमनस्‍कता को व्‍यक्‍त किया है, एक “पीडि़त विवेक-चेतना” को, कि जैसे दुष्‍प्राप्‍य की आत्‍महंता द्वैधा से वह गहरे गुंथा हुआ है.

“हम जिसे गुनगुना नहीं सकते/वक्‍़त ने ऐसा गीत क्‍यों गाया?”

“साथ-साथ” से महज़ एक ही साल पहले आई “चश्‍मेबद्दूर” के उत्‍फुल्‍ल और लगभग दोषहीन प्रेयस की तुलना में यहां फ़ारूख़ एक कहीं जटिल व्‍‍यक्तित्‍व है, अंतर्विरोधों और विडंबनाओं से घिरा हुआ. “चश्‍मेबद्दूर” में जब दीप्ति पहली बार उसके घर आती है तो वह बच्‍चों के-से उत्‍साह से उसकी आवभगत करता है और उसके लौट जाने के बाद चमको डिटर्जेंट पावडर के झाग से यूं खेलता है, मानो दुनिया में होने की इससे हसीन वजह फ़िलवक्‍़त कोई दूसरी नहीं. कि सफ़ेद झाग के फूलों को बालों में सजाकर वह कलगीवाले मोर की तरह इतराना चाहता है.

झील में कंकर भी गिरता है तो जल हर बार एक तरह से नहीं कांपता. फिर यह तो प्रेम है. फिर यह तो मन है.

लिहाज़ा, फ़ारूख़ का आत्मचेतस, subtle और underplaying अदाकार इस फ़िल्म में एक निहायत दूसरे ही, समांतर चरित-नायक को रचता है. और ये डिटेल्‍स इतनी बारीक़ी से वो अपने भीतर रखता है कि यक़ीन करना कठिन है कि परदे के बाहर यह एक ही शख़्स है. नाक-नक्‍़श मिलने भर से क्‍या होता है, भूमिका में कीलित अभिनेता का अंतर्भाव एक दूसरी ही सिफ़त है.

और, और उसके सामने “दीप्ति” है. प्रेम में आकंठ डूबी गंधर्वकन्या. नायक की दुविधाओं और अन्‍यमनस्‍कताओं से पूरी तरह पृथक, विमुक्‍त, जैसी कि एक प्रेम करने वाली स्‍त्री ही हो सकती है. प्रणय की आभा से भरी, मधुसिक्त, दीप्‍त. आंखों में करुणा तक की सजल डूब. देह में उत्फुल्लता और अनुरक्ति. आंचल में नायक को शरण तक देने की साधिकार चेष्‍टा. रागात्‍मकता का भाव-संचरण. और पुलक. और गरिमा. और भरोसे की आदमक़द तस्वीर. किंकर्तव्यविमूढ़ नायक के बरक़्स एक striking juxtaposition.

गीत को गाने वाला पुरुष स्‍वर है, प्रेम और दुश्चिंताओं के दोराहे पर खड़ा, लेकिन उसकी सम्राज्ञी (Muse) तो प्रेम करने वाली यह निष्‍कलुष स्‍त्री ही है. इस गीत की दीप्ति इस सृष्टि की सबसे पूर्ण स्‍त्री है. पूर्णता को इसके बाद किसी और विशेषण का लोभ भला क्‍यूं कर हो?

दीप्ति और फ़ारूख़, हिंदी सिनेमा की सबसे प्यारी जोड़ी का सबसे नायाब नग़मा है ये. उनके अभिकल्पित प्रणय का गानशीर्ष. घुटनों के बल झुककर इस मीठी और मायावी आपसदारी को सलाम करें और कलेजे को चाक होने दें के अब वो जोड़ा टूट गया. कि हंसिनी अब एकाकी रह गई.

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