एक चुटकी सिन्दूर की कीमत तुम क्या जानों रमेश बाबू?

chutki bhar sindoor deepika narmada jayanti ma jivan shaifaly

जीवन में केवल दो बार भंडारे में गयी हूँ. दोनों बार जबलपुर में, इंदौर में तो तथाकथित आधुनिकता का चोला ओढ़े इस तरह की परम्पराओं का आनंद नहीं ले सकी. हर तरह का जीवन जीने की स्वच्छंदता तो स्वामी ध्यान विनय के पास ही मुमकिन है.

तो पहली बार उत्सुकतावश गयी ये देखने के लिए कि आखिर भंडारे के प्रसाद के लिए इतनी मारामारी क्यों मची रहती है? बंट रहे प्रसाद के लिए भीड़ में घुसना और सही सलामत प्रसाद लेकर भीड़ से बाहर निकलना बिलकुल अभिमन्यु के चक्रव्यूह में फंसने जैसा अनुभव होता है…

दूसरी बार दो साल पहले आज ही के दिन यानी नर्मदा जयंती पर फिर भंडारे में जाना हुआ लेकिन कोई उत्सुकता नहीं थी भंडारे के चक्रव्यूह में फंसने की तो दूर खड़े होकर माँ नर्मदा की बड़ी सी मूर्ति के दर्शन करती रही…

मैं आज तक जान नहीं पाई कि माता की भव्य मूर्ति के सामने मेरा जी इतना क्यों भर आता है कि वो आँखों से आंसू बनकर गालों पर लुढ़कने लगे… बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को आँखों में रोक कर माता की मूर्ति के सामने जाकर खड़ी हो गयी…

कोई दंभ नहीं है लेकिन बहुत कम बार मैं भगवान की मूरत के सामने हाथ जोड़कर खड़ी होती हूँ, तो उस दिन भी हाथ नहीं जोड़े थे लेकिन श्रद्धा के भाव आपकी मनोदशा से व्यक्त हो जाते हैं उसके लिए हाथ जोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती..

तो मैं खड़ी थी और पुजारीजी माता को चढ़ाई हुई चूड़ियां और सिन्दूर सुहागनों को बाँट रहे थे. मैंने जैसे ही हाथ बढ़ाया पुजारीजी बोले झोली में लो तो मैंने दुपट्टे का आँचल दोनों हाथों से फैलाकर जैसे ही पुजारी जी की ओर बढ़ाया बिलकुल फ़िल्मी स्टाइल में लाउडस्पीकर में गाना बजा –

गंगा मैया में जब तक ये पानी रहे
मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे … जिंदगानी रहे…

और इतनी देर से आँखों में रोककर रखे कृतज्ञता के आंसू झर झर बह निकले… पहली बार जादू को मैंने चरितार्थ होते देखा…. हमारे फिल्म वाले भी असल ज़िंदगी से ही उठाकर सीन बनाते हैं..

घर पहुंचकर पतिदेव यानि स्वामी ध्यान विनय के सामने सिन्दूर की पुड़िया खोलकर खड़ी हो गयी…

कुछ पल के लिए पतिदेव समझ ही नहीं पाए कि मैं ऐसे क्यों खड़ी हूँ… मैं चाहे कितनी भी फ़िल्मी होऊँ पतिदेव फ़िल्मी नहीं है तो बेचारे समझ ही नहीं पाए, जब बहुत देर तक मैं पुडिया खोले उनके सामने खड़ी रही तब जाकर उनके पल्ले पड़ा और पुड़िया से चुटकी भर सिन्दूर उठाकर मेरी मांग में भर दिया…

मैंने भी फ़िल्मी स्टाइल से कहा- एक चुटकी सिन्दूर की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू!!!!

आज भी नर्मदा जयंती है तो ये किस्सा याद आ गया… अपना सौभाग्य कहूं या परमात्मा का आशीर्वाद…. मेरे जीवन की तरह माँ नर्मदा भी इकलौती नदी है जो उल्टी बहती है… नीचे से ऊपर की ओर… बस माँ इतना आशीर्वाद दो मेरी भी ये यात्रा ऐसे ही जारी रहे… नीचे से ऊपर की ओर…..

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY