वह दी प ती है : तानपूरे के शीशम वन में बैठी बदन चुराए गाए मालकौंस

वह दीप्ति है.

सलोनी-सांवली. मछली की नींद-सा पारदर्शी है उसका नेह. जान ही जाओगे जब तुम्‍हारे नाम लिखकर नहीं भेजेगी तुम्‍हें चिट्ठी. पांव में बांधेगी बारिश, मेंह की डोरी में बादल की झालर. काजल की तटरेखा से लौट आएगी उसके बेख़याल देखने की बाढ़. जो ना काढ़ेगी काजल तो टूट न जाएंगे कितने ही किनारे!

तानपूरे के शीशम वन में बैठी बदन चुराए गाएगी मालकौंस. उसकी पीली किनार की साड़ी में डूबेगी सरसों की सांझ, जिसके भीतर धानी ज्‍वार. कर्णफूलों पर दमकेगा जब स्मित का चंद्रमा तो होंठों के कनेर खिंच जाएंगे आकर्ण.

सूने कमरे की दीवार पर उसकी मुस्‍कराहट की खिड़की वैनगॉग के सूरजमुखी में पीली चांदनी भरेगी. दूर दिशा तक गूंज आएगी उसकी हंसी की भोर. तालू के नाद से उच्‍चारेगी जब तुम्‍हारा नाम तो क्‍या हुलसोगे नहीं? करेगी अनुनय तो क्‍या रीझोगे नहीं? देह में लहर की लय लिए वह चहकेगी, इठलाएगी. “काली घोड़ी” पर गोरे सैयां संग जब निकलेगी तो क्‍या चकित हो नहीं तकेगी “सगरी नगरी.”

झाग के फेन-फूलों को हिमकिरीट की तरह केश पर बांधेगा उसका प्रियतम, जब वह मुस्‍काएगी. बाग़ में हरीतिमा का बिछला स्‍वप्‍न पुलकेगा, जो वह झपकेगी पलक. रेस्‍तरां में टूटकर गिरेगा धूप का धनुष, जो लौटा देगी कॉफ़ी और बुलवाएगी अपने लिये आइस्‍क्रीम का एक प्‍याला. सफ़ेद कुर्ती में, लंबी-सी चोटी बाएं कंधे पर सम्हाले गाएगी कोमल गांधार. आंसू पीएगी जब तक कि टूटता नहीं बांध, गलता नहीं पूस.

वह दी प ती है.

सलोनी-सांवली. सहज-निश्‍छल. पाखी की पुलक-सा पारदर्शी है उसका प्‍यार.

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