इंदौर का गर्व : सोया चंक्स और जेट मेट के अविष्कारक को श्रद्धांजलि

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मेरे प्रिय मित्र श्रीकृष्ण,

सात साल पहले तुम हम सबको छोड़कर ब्रम्ह में लीन हो गए थे. मैं जब भी खुले आसमान में तारों को देखता तो तुम्हारी याद आ जाती है. मुझे याद आती है वह रात जब तुमने मुझे अपने घर की छत पर बने पिरामिड को दिखाया था …. जहाँ तुम रात्रि विश्राम करते थे.

दुनिया की सभी परेशानियों के बोझ को हल्का करने के लिए विश्राम के क्षणों में “पिरामिड” से शक्ति संग्रह करके फ़्रेश होने की तुम्हारी अलौकिक प्रणाली अद्भुत थी. वह दिन मैं कैसे भूल सकता हूँ जब तुमने मुझसे पूछा था “राम भाई मुझे कौन सी दूरबीन ख़रीदना चाहिए जिसे इस घर की छत पर लगा कर इन टिमटिमाते तारों को देखकर, मैं ऊपर जाने के बाद का अपना पर्मानेन्ट घर बनाने के लिए जगह ढूँढ सकूँ. कौनसा तारा अच्छा रहेगा जहाँ पर मैं इस धरती की दुनिया से जाने के बाद सुख शान्ति से हमेशा के लिए रह सकूँगा.

“मेरे प्यारे दोस्त तुम्हारे यह शब्द आज भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं. मेरे भाई कम से कम जाने के पहले तुम मुझे यह तो बता जाते तुमने कौन से तारे को अपना स्थाई निवास बनाना पसन्द किया था. कम से कम मैं उसी तारे को रोज़ देखकर तुमसे मुलाक़ात कर लिया करता.

आज मेरे भाई तुम पर हर इन्दौर निवासी को गर्व है. एक साधारण सा बैंक का कर्मचारी कैसे जापान गया, वहाँ पर मच्छर मारने का लोशन देखकर सोचा क्यों न इसे ब्लॉटिग पेपर में सोखकर फिर गरम करके मच्छरों को मारा जाए. ” जेट” की टिकली का तुमने किस तरह अविष्कार किया. मुझे याद है जब गिरीश तो छोटा बच्चा ही था, उन दिनों तुम और शीला जी रात रात भर जाग कर जेट की टिकली गरम करके, खिड़की दरवाज़े खोल कर बैठे रहते थे और गिना करते थे हर घण्टे में कितने मच्छर मर रहे थे. इस तरह विज्ञान की कोई औपचारिक शिक्षा लिए बग़ैर ही तुमने यह सिद्ध कर दिया कि तुम सचमुच एक महान वैज्ञानिक थे.

मेरे दोस्त मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ, जब ‘गोदरेज’ कम्पनी ने तुम्हारी “जेट ” ख़रीद ली, तुमने तुरन्त सोयाबीन के क्षेत्र में क़दम रखा. जो लोग सोयाबीन के उद्योग में काम कर रहे हैं वह सिर्फ़ सोयाबीन का तेल निकाल कर ही अपना सन्तोष कर लेते हैं. पर तुम इन सब लोगों से एकदम अलग व्यक्तित्व के धनी सिद्ध हुए. तुमने सोयाबीन के भूसे से बड़ी, पापड़ और बहुत सी खाने योग्य चीज़ें निकाल कर कमाल कर दिखाया.

मैं साक्षी हूँ जब तुम मेरे साथ और सुधाकर के पास घण्टों बैठ कर, रसायन शास्त्र की किताबों को समझने की कोशिश करते थे. महीनों की मेहनत के बाद आख़िरकार तुमने “टोकोफेरॉन” निकाल ही लिया. उसी टोकोफेरॉन से तुमने “विटामिन-ई” का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू करके यूरोप के बाज़ारों में इन्दौर का नाम रोशन कर दिया.

मेरे दोस्त तुम सच में महान हो… और महान व्यक्ति कभी दुनिया छोड़कर नहीं जाता; तुम भी अपने पीछे इन्दौर ही नहीं पूरे मालवा के लिए एक मिसाल क़ायम करके अमर हो गए हो, जो हमेशा याद दिलाती रहेगी कि दृढ़ निश्चय, पक्का इरादा और कठोर परिश्रम से ही जीवन में सफलता हासिल की जा सकती है.

यही वह मूल मन्त्र है जिनसे सच में आसमान के तारे भी तोड़े जा सकते हैं. ऐसे ही किसी तारे को तोड़कर उसे अपना घर बनाकर तुमने हमें ऊपर देखते हुए दृढ़ संकल्प के साथ जीवन मे चलने का रास्ता बताया है. तुम्है कोटि कोटि प्रणाम.

तुम्हारा मित्र
डा. राम श्रीवास्तव

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