मैं कभी प्रेम की बंशी तो कभी युद्ध का पाञ्चजन्य बजाता रहूँगा राधे

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कुछ समय पहले सोशल मीडिया और whatsapp पर एक पोस्ट काफी चल रही थी जिससे मेरी कुछ असहमति है। यह लेख किसका है और उसका क्या मंतव्य था कोई नहीं जानता लेकिन मैंने 10000 लाइक तक देखे इस पोस्ट पर.

अतः मैंने अपनी अल्प बुद्धि से उसका प्रतिकार करने का प्रयास किया है. दोनों पोस्ट प्रेषित कर रहा हूँ सभी के विचार एवं तर्क, सौम्यता के साथ आमंत्रित है.

।। जय श्री कृष्ण ।।

स्वर्ग में विचरण करते हुए अचानक एक-दूसरे के सामने आ गए विचलित से कृष्ण, प्रसन्नचित सी राधा… कृष्ण सकपकाए, राधा मुस्काई.. इससे पहले कृष्ण कुछ कहते, राधा बोल उठी- “कैसे हो द्वारकाधीश?”

जो राधा उन्हें कान्हा-कान्हा कह के बुलाती थी, उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया. फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया और बोले राधा से…..

“मैं तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ, तुम तो द्वारकाधीश मत कहो! आओ बैठते है… कुछ मैं अपनी कहता हूँ कुछ तुम अपनी कहो… सच कहूँ राधा जब-जब भी तुम्हारी याद आती थी, इन आँखों से आँसुओं की बूँदें निकल आती थीं.”

बोली राधा, “मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ, ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा, क्यूंकि हम तुम्हें कभी भूले ही कहाँ थे, जो तुम याद आते. इन आँखों में सदा तुम रहते थे, कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ इसलिए रोते भी नहीं थे.

प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया, इसका इक आइना दिखाऊं आपको? कुछ कड़वे सच, प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए, यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुद्र के खारे पानी तक पहुंच गए?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्र पर भरोसा कर लिया और दसों उँगलियों पर चलने वाली बांसुरी को भूल गए?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो… जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी, प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली क्या-क्या रंग दिखाने लगी, सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी.

कान्हा और द्वारकाधीश में क्या फर्क होता है बताऊँ? कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते, सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता.

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है, युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं.

कान्हा, प्रेम में डूबा हुआ आदमी दुखी तो रह सकता है पर किसी को दुःख नहीं देता. आप तो कई कलाओं के स्वामी हो, स्वप्न दूर द्रष्टा हो, गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो.

पर आपने क्या निर्णय किया, अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी? और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया. सेना तो आपकी प्रजा थी, राजा तो पालक होता है, उसका रक्षक होता है.

आप जैसा महा ज्ञानी, उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन आपकी प्रजा को ही मार रहा था. अपनी प्रजा को मरते देख आप में करूणा नहीं जगी क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे.

आज भी धरती पर जाकर देखो अपनी द्वारकाधीश वाली छवि को ढूंढते रह जाओगे… हर घर, हर मंदिर में मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे.

आज भी मै मानती हूँ लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं, उनके महत्व की बात करते है. मगर धरती के लोग युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं.

गीता में मेरा दूर-दूर तक नाम भी नहीं है, पर आज भी लोग उसके समापन पर “राधे-राधे” करते हैं”

अब मेरा प्रत्युत्तर प्रस्तुत है –

सब सुन कर प्रभु मुस्कुराये… कुछ देर राधा को निहारा और फिर मुस्कुराते हुए बोले –

“राधा प्रेम का युद्ध से क्या मुकाबला, कहां प्रेम प्यारा सा और कहां युद्ध का क्रूर क्रंदन!

लेकिन फिर भी कभी-कभी ये आवश्यक हो जाता है और स्वयं प्रेम को जीवित रखने के लिए मुझे युद्ध भी करना और करवाना पड़ता है.

तुम्हें याद है कि मेरे ही सुदर्शन से एक बार मेरी ही अंगुली कट गई थी और युद्ध के इस शस्त्र से लगे घाव को प्रेम से द्रौपदी ने साड़ी की चीर से बाँध कर उपचार किया था.

अब तुम ही बताओ कि क्या उस द्रोपदी के साथ हुए चीरहरण के अपराधियों को छोड़ दिया जाना था, फिर किसी अभागन द्रोपदी की लज्जा भंग की पुनरावृत्ति के लिए?

क्या दुर्योधन की उस जंघा को नहीं तोड़ा जाना चाहिए था जो अपने अग्रजों की पत्नी, यानी माता समान भाभी को अपने पट पर बिठाना चाहता था?

तुम बताओ राधे, गिरिराज को भी तो इंद्र के अभिमान भंग हेतु ही तो अपनी कनिष्का पर धारण किया था न मैंने?

हाँ! मैंने कई कठोर निर्णय लिए लेकिन अपने अनुरंजन के लिए नहीं, व्यापक जनहित के लिए और इसीलिए तो इस धरा पर आया था प्रिये.

जिसका अधिकार था पूर्ण हस्तिनापुर पर यदि कोई दुष्ट उसे सुई की नोक के बराबर भी भूमि देने से मना कर दे तो क्या बेसहारा छोड़ देता उसे और बताओ इन सब को जानते हुए कैसे उसे (बंशी) धारण करता जिसे चैन के समय ही अधरों से लगाया जाता हैं.

जब धर्म और अधर्म, कुरुक्षेत्र में आमने-सामने हो जाएं तो बताओ कैसे अर्जुन के रथ की वल्गाओं को त्याग कर बंशी उठा लेता?

अपनी ही सेना, जो अपना क्षात्र धर्म भूल कर, मात्र यादव कुल की विश्व विजय को धर्म से भी बढ़कर मानने लग गई थी और अपने अहंकार की अति की तरफ अग्रसर थी.

और धर्मराज द्वारा स्वेच्छा से पक्ष बदलने के अवसर के बावजूद भी जिसे धर्म का पक्ष नजर नहीं आया, उसका पतन तो निश्चित ही था प्रिये.

और न इस बात की परवाह है कि लोग मुझे किस रूप में भजते है मंदिरों में, संभव है बहुत से महापुरुष मुझे गीता का प्रवचन करते हुए कुरुक्षेत्र में योद्धा रूप में भी भजते हो अपने हृदय के मंदिर में.

जग ने मुझे इन सब के लिए जिम्मेदार माना और बहुतों ने कोसा भी, लेकिन न मेरे मन को तब कष्ट हुआ, न ही अब, जब स्वयं तुम ऐसा कह रही हो राधे.

मेरे तो एक हाथ में सुदर्शन और एक में वेणु (बंशी) सदा ही थे और सदा ही रहेंगे. मेरे अधरों पर तुमसे प्रेम के कालजयी निवेदन भी सदा रहेंगे और गीता के शाश्वत वचन भी.

जब-जब इस धरती पर सज्जन मुझे पुकारेंगे तो उन्हें कष्ट मुक्त करने के लिए मैं आता रहूँगा. कभी प्रेम की बंशी और कभी युद्ध का पाञ्चजन्य बजाता रहूँगा.

“यदा यदा ही धर्मस्य ………..।
……….. संभवामि युगे युगे।।

हां… और ये सब तुमसे बेहतर और कौन समझ सकता है राधे.

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