हम मूर्ख थे जो समझ नहीं पाए वेद का आदेश

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वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) के दिन कोलकाता के अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में गया. पुस्तक मेले कुछ संस्थाओं के लिये मजहब प्रचार का भी जरिया होता है तो उनके कई लोग मुफ्त में अपने धर्मग्रन्थ बांटते और लोगों को पकड़-पकड़ कर अपना मजहब समझाते हुये मिले.

मौलाना वहीदुद्दीन खान साहेब के प्रकाशन स्टॉल पर गया, बात शुरू ही की थी कि वहां बैठे लोगों ने मेरे लिये कुर्सी आगे बढ़ा दी और इस्लाम पर चर्चा शुरू कर दी, अपनी संस्था का स्थानीय पता और अगले कार्यक्रम में आने का आमंत्रण दिया, मुफ्त में कुछ साहित्य देकर विदा किया.

फिर जमाते-इस्लामी के अधिकृत प्रकाशन के स्टॉल पर गया तो वहां भी यही मंजर था, जमात-अहमदिया के स्टॉल के बाहर तो खैर उनके मुबल्लिग लगातार अपने मत का प्रचार करते ही रहते है.

इस्लामिक बुक सेंटर में आने वाले हरेक गैर-मुस्लिम को नई निकलती मूंछों वाले कम-उम्र लड़के भी पूरी तन्मयता से फ्री में कुरान बांटते और इस्लाम समझाते नज़र आ जातें हैं.

ईसाई मिशनरियां मेले के दौरान हर जगह अलग-अलग भाषाओं में अपना बाईबिल लगातार बांटते रहतें हैं. एक रोचक बात ये भी दिखी कि किसी भी इस्लामी बुक-स्टॉल पर चले जाइये आपको वहां एक लिस्ट टंगी मिलेगी कि इस वृहत मैदान में इस्लामिक किताबें किस-किस स्टॉल पर मिल रही है.

इसके बाद मेरे लिये ये देखना दिलचस्प था कि इधर के अपने मठ-मंदिर और धार्मिक संस्थाओं के लोगों में भी अपनी विचारधारा या धर्म के प्रसार का कोई आग्रह है या ये लोग केवल किताबें बेचने आये हैं?

इस पुस्तक मेले में रामकृष्ण मिशन के कई स्टॉल लगे हैं, एक-एक कर सब में गया, एक-दो किताबें खरीदी और मिशन और उसके कार्यों और हिन्दू धर्म पर चर्चा करनी चाही तो वो बिलकुल निरुत्साह दिखे.

‘भारतीय जनता पार्टी’ के स्टॉल पर बैठे लोगों से एक वृद्ध पूछ रहे थे कि मुझे संघ के सरसंघचालकों की जीवनी कहाँ मिलेगी तो उन भाजपाइयों में कोई भी उसे गाइड करने की स्थिति में नहीं था. मजेदार बात ये भी है कि उनके अपने स्टॉल में ही पूज्य गुरूजी और डॉक्टर जी पर दो छोटी-छोटी जीवनियाँ बिक रही थी पर उन्हें पता ही नहीं था.

योगदा सत्संग, आर्य समाज, विश्व हिन्दू परिषद्, गौडीय मिशन, कबीर पंथी, आनंद मार्गी, ब्रह्माकुमारी, श्री श्री रविशंकर और ओशो से लेकर दुनिया भर के संत-महात्माओं की स्टॉलों में कोई एक भी मुझे नहीं मिला जिसे आने वाले किसी इंसान को हिन्दू धर्म या हिन्दू संस्कृति के बारे में बताने में रत्ती भर भी दिलचस्पी हो.

किसी को अपने CD बेचने की चिंता थी, कोई धूप-अगरबत्ती बेचकर खुश था, कोई आयुर्वेदिक औषधि की दुकान खोले बैठा था तो कोई राजयोग सिखाकर ही आनंदित था.

उपरोक्त तुलना के बाद आप ये कह सकतें हैं कि चूँकि हमारा धर्म विस्तारवादी नहीं है इसलिये ऐसा करना हमारे स्वभाव में नहीं है. तो मैं आपको बताना चाहता हूँ कि ये एक भ्रांत धारणा है कि हिन्दुओं को अपने धर्म प्रचार की मनाही है.

वेद वाक्य “कृण्वन्तो विश्वार्यम” हमें दुनिया भर को आर्य बनाने यानि उन्हें हिंदुत्व से संस्कारित करने का आदेश देता है, हम मूर्ख थे इसलिये इस आदेश को समझ नहीं पाये, हमारे पूर्वजों ने इसे समझा था, जिसका प्रमाण है विश्व के हर कोने में फैले हमारे सांस्कृतिक दिग्विजय के चिन्ह.

हमारे पूर्वज चीन गये, मंगोलिया गये, कोरिया से लेकर वियतनाम होते हुए सूदूर-दक्षिण-पूर्व के सारे देशों पर अपने संस्कृति की पताका लहराई. ईरान की पर्वतमालाओं से लेकर उन सब जगहों तक हिन्दू संस्कृति प्रस्फुटित हुए जिनको अपना हिन्दू सागर-स्पर्श करता है.

यानि ये फर्क मान्यताओं का है जो हमारे यहाँ भी थी पर जिसे दुर्भाग्य से हम भूल चुके हैं और जो दुर्भाग्य से उन्हें याद है. वो इतनी तन्मयता से इसलिये अपने मजहब की तबलीग करतें हैं क्योंकि उनके धर्म-गुरुओं ने उनसे कह रखा है कि अपने मजहब की तब्लीग करो. भले तुमको एक ही आयत आती हो.

वो अपने लोगों को यह कहकर उत्साहित करतें हैं कि मोजेज ने हकला होते हुए भी मिश्रियों के सामने अपने मजहब की तब्लीग की, तुम तो बोल सकते हो फिर क्यों नहीं अपने मजहब का प्रचार कर रहे?

भविष्य पुराण में आता है कि माँ सरस्वती ने कण्व ऋषि को ये आज्ञा देते हुए मिश्र भेजा था कि जाओ और जाकर वहां के मलेच्छों को संस्कृत पढ़ाकर संस्कारित करो.

कण्व ऋषि मिस्र गये और दस हज़ार से अधिक मलेच्छों को उस धारा में लेकर आये जिसे आज दुनिया हिंदुत्व के नाम से जानती है.

अटल जी ने लिखा है :

कोई बतलाए काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी
भूभाग नहीं शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय

यानि हमारा अभियान किसी खून-खराबे या साम्राज्यवाद के लिये नहीं था वरन विश्व को शांति, सह-अस्तित्व और समादर की धारा में लाने के लिये थे. सरस्वती पुत्र तो हम भी हैं और वही कार्य करने का आदेश हमारे लिये भी है जो माँ ने ऋषि कण्व को दिया था.

देखना ये है कि विश्व के सांस्कृतिक दिग्विजय का निश्चय लिये माँ सरस्वती की आराधना के इस पावन पर्व पर ऐसा कोई संकल्प लेने वाला सामने आता है कि नहीं.

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