अर्थक्रांति : सरलता से समझें, क्या है बजट

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एक बहुत ही खुशहाल नगर में एक परिवार रहता था. उसके चार पुत्र थे रमेश, सुरेश, राम और श्याम. चारों बेटे कुछ न कुछ काम करके परिवार को खर्चा चलाते थे. रमेश की अपनी दुकान थी, सुरेश खेती करता था, राम नौकरी करता था और श्याम का अपना कारख़ाना था.

नियम के अनुसार सब अपनी-अपनी कमाई का निश्चित प्रतिशत घर के मुखिया को दे देते थे. एक समय आया कि सुरेश की खेती बाढ़ से बर्बाद हो गयी तो उसने अपने हिस्से का धन नहीं दिया उसका खर्चा रमेश, श्याम और राम ने उठा लिया.

अब तो हर बार सुरेश कोई न कोई बहाना बना देता और घर पर धन देने से मुक्ति प्राप्त कर लेता. पिता ने कुछ समय बाद नियम बना दिया कि खेती वाले से धन नहीं लिया जाएगा.

बाकी सब भाइयों ने भी कुछ न कुछ बहाने बनाने शुरू कर दिये और निर्धारित से कम धन पिता के पास आया. पिता ने अब कुछ उपाय सोचा और रमेश, राम और श्याम के कार्य क्षेत्रों में अपने सेवकों को बैठा दिया जिससे कि शेष भाइयों से पूर्ण धन प्राप्त होता रहे.

पिता का सेवकों को तनख्वाह देने के कारण खर्चा और बढ़ गया. सेवक और अधिक धन उनके कार्य क्षेत्र से निकालते रहे. सब भाइयों के अपने परिवार भी बढ़ते गए और सब अपनी संतानों के लिए पिता से आवश्यकतानुसार मांग करते रहे.

पिता हर महीने उनको उनकी आवश्यकता और अपनी पूंजी को देकर धन दे देते थे. पिता कभी उनकी ज़रूरत पूरी कर पाते और कभी नहीं भी.

चारों भाइयों ने संयुक्त रूप से पिता से कह दिया कि आपको घर चलाना नहीं आता. और एक मोहन नामक व्यक्ति को उस काम और घर के रखरखाव के लिए रख दिया.

अब जब मोहन के पास पैसा कम पड़ने लगा तो घर की चीज़ें गिरवी रख कर परिवार के समस्त भाइयों के खर्चे पूरे करने लगा.

इन्हीं दिनों श्याम का कारख़ाना खूब ज़ोर शोर से चलने लगा और उसने अपने धन को संभालने के लिए पैसा बैंक में रखना शुरू कर दिया.

बैंक जब वह चाहता उससे धन दे देता और फिर वापिस ले लेता. बाकी भाइयों ने भी कुछ-कुछ पैसा बैंक में रखना शुरू कर दिया.

जब कभी भी परिवार में बदहाली की बात होती तो मोहन कहते थे कि श्याम के अतिरिक्त आप सब निकम्मे हो. देखो श्याम को वह कितना कमाता है और उसका पैसा बैंक में भी रहता है.

रमेश, सुरेश और राम ने सोचा यह मोहन तो पक्षपात करता है और इसलिए मोहन को हटा कर राहुल को ले आए जो रमेश का मित्र था.

कुछ समय बाद सुरेश अपने मित्र को ले आया. ऐसे ही बारी-बारी सब अपने मित्र को ले आते रहे. हर महीने हर नया सेवक आता और नए उधार ले कर घर चलाने लगा.

दरअसल जो भी नया सेवक घर चलाने और रख रखाव के लिए रखा जाता उसका आधे से अधिक समय इसी उधेड़बुन में निकाल जाता कि अगले महीने का खर्चा कैसे चलाया जाएगा.

हर माह सब भाई उस सेवक का इंतज़ार करते कि इस बार किसे कितना धन मिलेगा बिना इस बात पर ध्यान दिये कि उस घर के सेवक के पास धन है कितना और कितने की आवश्यकता है. जब धन पूरा है ही नहीं तो सभी भाई कभी भी संतुष्ट नहीं होंगे.

अब यह जो परिवार है वह भारत देश है. घर का रख रखाव करने वाली आपकी सरकार है. हम सब भाई उसमें रहते है.

जो सेवक (घर का रख रखाव करने वाले) बाहर से उधार लेता है वही FDI या LOAN के रूप में आता है. जो पैसा भाई स्वयं पिता को देते हैं वह आपका प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) है और जो पिता के सेवक आपके कार्य क्षेत्र से चुप चाप निकाल लेते हैं वह है अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) है.

वहीं पर श्याम का धन जो बैंक में सबको नज़र आता है उसे आप sensex मान सकते हैं जिसका कि सिवाय श्याम के अतिरिक्त किसी का लेना देना नहीं है. घर-परिवार की प्रगति का sensex कभी भी पैमाना नहीं बन सकता.

दुर्भाग्य से घर चलाने वाले (सरकार) के जितने भी सलाहकार हैं उनमें से अधिकांश श्याम की विचारधारा से हैं.

यदि सबको पर्याप्त धन चाहिए तो सरकार के पास पर्याप्त होना चाहिए. इसके कई उपाय आप सोच सकते हैं.

अर्थक्रांति का सरल सा प्रस्ताव है जिसके अनुसार समस्त भाइयों को कहा जाये कि आपको अधिकांश पैसा बैंक में रखना है. और बैंक का काम यह होगा कि निश्चित प्रतिशत में धन राशि घर के मुखिया को दे देगा. आंकड़ों के अनुसार यह स्पष्ट भी हो जाता है कि परिवार के मुखिया को पर्याप्त धन मिल जाता है.

आप शायद यह सोचेंगे कि अभी भी तो धन दिया जाता है. परंतु आप समझें, आज कुछ भाई तो सत्य आमदनी बताते नहीं, दूसरे जो सरकारी सेवक (Tax Collecting Agency) आपके कार्य क्षेत्र में है उसमें सबसे अधिक भ्रष्टाचार व्याप्त है.

इसके चलते भाइयों की जेब से निकला सारा पैसा पिता तक नहीं पहुंचता और हम सब असंतुष्ट बैठे हैं. अब जब सरकार का बजट पेश हो गया है तो हमारे तथाकथित अर्थशास्त्री इतनी बड़ी-बड़ी बातें करेंगे कि आम आदमी की समझ से बाहर हो जाएंगी और आम भारतीय सिर्फ यह सोचेगा कि मेरे पर आयकर का क्या प्रभाव होगा.

इस बड़ी जटिल समस्या का सीधा सा समाधान अर्थक्रांति के रूप में प्रस्तुत है. सहमत हों तो सब तक यह पहुंचाएं.

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