हिन्दू बचा रहेगा तभी बचेगा भारत : डॉक्ट्रिन ऑफ़ रेज़िंग लाइफ आउट ऑफ़ ए डेड नेशन

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nadimarg massacre 2003 killing 23 hindus
nadimarg massacre 2003 killing 23 hindus, photo courtesy : http://bharatuntoldstory.tumblr.com/

मैं हमेशा से यह लिखता रहा हूँ कि हम काल के उस आखिरी चरण से गुजर रहे है, जहां यह तय होगा कि भारत का अस्तित्व रहेगा या मिट जायेगा और इसी के साथ हिंदुत्व की भवितव्यता निहित है.

मैं मानता हूँ कि जब भारत का अस्तित्व बचेगा, तब ही हिंदुत्व बचा रह सकता है या यह भी कह सकते है कि हिन्दू बचा रहेगा तभी भारत बचेगा.

आज कश्मीर, केरल, बंगाल और कल यूपी, बिहार, हैदराबाद, पंजाब और तमिलनाडु को देखते हुए क्या यह उम्मीद की जासकती है?

क्या शताब्दियों से खोते और हारती हुई मानसिकता लिए हिन्दू भारत के अस्तित्व की रक्षा कर सकता है? क्या भारत के अस्तित्व को बचाये रखना सिर्फ सरकार का ही दयित्व है?

और यदि है, तो आज तक का इतिहास तो यही बताता है की किसी भी सभ्यता या राष्ट्र को नष्ट होने से उसका नेतृत्व तब तक नही बचा पाया है जब तक उसके लोगों ने, स्वार्थता, भीरुता और अहिंसा का परित्याग कर के खुद अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए कदम नहीं उठाये हैं.

हम हारे ही इसीलिए है कि हम खुद कुछ करने के बजाय दूसरे से करने की आशा में जिये जाते है. ऐसा भी नही है कि हम लोगों के पास सामने कोई विकल्प नही होता है लेकिन हम विकल्पों से भविष्य में उपजने वाली अनिश्चितता से विमुख, वर्तमान की निश्चितता पर ज्यादा भरोसा करते है.

हम लोग रोज बंगाल और केरल में लोगों के कटने और पलायन की खबर सुनते हैं लेकिन हमें वहां से प्रतिकार की कोई खबर नही आती है. यह इसलिए है क्योंकि प्रतिकार की जिम्मेदारी हमनें सरकारों पर डाल रक्खी है.

हम जब तक कटने का प्रतिकार काटने को, मूलभूत रूप से अपने अंदर अंकित नहीं करेंगे, हम तब तक सिर्फ भाग सकते है और ऐसे ही भागते-भागते हम अस्तित्वविहीन हो जाएंगे.

तो क्या इसका मतलब है कि मैं हिंसा समर्थक, एक अराजक हूँ?

नहीं, मुझे नहीं लगता कि मैं कोई एक हिंसक प्राणी हूँ या अराजक हूँ जिसे लोकतंत्र पर विश्वास नहीं है. मैं एक सैद्धान्तिक व्यक्ति हूँ जो अपने गढ़े हुए ‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ रेज़िंग लाइफ आउट ऑफ़ ए डेड नेशन’ या ‘विनाश से राष्ट्र के सृजन का सिद्धान्त’ को मानता हूँ.

मैं एक राष्ट्रवादी हूँ जिसे राष्ट्र की अखण्डता पर हो रहे आंतरिक और बाह्य आक्रमणों व समाज में हो गये विभाजन ने, विप्लवकाल के अनुनाद को सुनने वाला शैल बना दिया है.

जब से मानव सभ्यता ने, राष्ट्र की परिकल्पना की है, तब से हर काल में, हर राष्ट्र के इतिहास में, ऐसे मौके आये है जहां उसके नागरिकों को यह तय करना होता है कि वह अपने अस्तित्व की रक्षा से पहले, राष्ट्र के अस्तित्व को प्राथिमिकता देते है या नहीं.

मुझे इतिहास यह बताता है कि जब भी ऐसे मौके आये है तब, जहां के नागरिकों ने इस प्रश्न का उत्तर देने में देरी की है, वह राष्ट्र और उसका समाज हमेशा के लिए विलुप्त हो गये है.

इसके साथ इतिहास हम सबको एक और कटु सत्य भी बतलाता है कि कभी भी, किसी भी काल में, अहिंसा या उससे जुड़ा कोई भी दर्शन, किसी भी राष्ट्र और उसके समाज के अस्तित्व की रक्षा नहीं कर पाया है.

हमेशा से ही अस्तित्व के लिए संघर्षरत राष्ट्र और उसके समाज की रक्षा, हिंसा ने, शांतिकाल में अंगीकार की गयी अहिंसा का परित्याग कर, उसके सापेक्ष उदित दर्शन को कवच और ढाल बना कर की है.

मैं मानता हूँ कि शांतिकाल में अहिंसा और उससे जुड़े दर्शन, राष्ट्र और समाज को एकरूपता देते हैं लेकिन उसको राष्ट्रीय चरित्र की प्राथिमिकता बना देने की भूल, दूरगामी अहितकारी परिणाम भी देते है.

यह एक तरफ जहां समाज में नपुंसकता की शीतलता को बढ़ावा देता है, वहीं समाज को विभाजित करके लम्बे समय तक सत्ता का दोहन उसे अप्रसांगिक भी बना देता है.

मेरा स्पष्ट मानना है कि यह हिंसा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं हो सकती है क्योंकि जब हिंसा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अपनायी जाती है तब वह राष्ट्र के लिए अपराध है.

लेकिन जहां हिंसा, राष्ट्र के चरित्र में बदलाव लाती है और उसके अस्तित्व को सुरक्षा प्रदान करती है, वहां यही हिंसा विप्लवकाल में रक्षा और सुरक्षा का पर्यायवाची बन जाती है.

यह याद रखिये, यदि आज की इस हिंसा के कारण, कल राष्ट्र सुरक्षित रहता है तो आपके हाथों में लगा खून भी कल गुलाल कहलायेगा, लेकिन यदि साफ़ हाथों की अभिलाषा में आपका राष्ट्र अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने में असफल रहता है, तब हमारे और आपके होने का ही कोई अर्थ नहीं रह जाता है.

जो मैं कह रहा हूँ, वह परिणामों के रूप में हम सब देख चुके है. आज से 70 साल पहले भारत की स्वतंत्रता पर, हमे अहिंसा ने सौगात में, बिना लड़े, अहिंसक 10 लाख लाशें दी थी.

इसी अहिंसा ने 25-26 साल पहले कश्मीर की घाटी से कश्मीरी पंडितों के सफाये का कसैला फल भी दिया है. यही अहिंसा अब बंगाल और केरल में फल देने लगी है, जिस फल को अहिंसा पकने से नहीं रोक सकती है.

संक्षेप में मेरे लिए, भारत उपमहाद्वीप का यह काल, विप्लवकाल है और इसमें, “भारत राष्ट्र प्रथम और वो ही अंतिम” का विधान अहिंसा का परित्याग किये बिना नहीं पूरा हो सकता है.

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