मेकिंग इंडिया गीतमाला : तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले

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आस्था फिल्म के गीत के लिए….

तुम मेरी अल्हड़ उम्र की तरह मेरे साथ बड़े हुए… विरहा की तरह जले…. और वस्ल-ए-वसले यार की तरह मिले….

तुम्हें खोया था यूं जैसे कोई हसरत अपनी ही मुट्ठी में बाँध कर भूल गयी और खोजती रही कभी किसी की बातों में, कभी आँखों में तो कभी किसी के so called affair में…

फिर बरसों तुम पड़े रहे ज़हन के कोने में …. कभी जगजीत की ग़ज़ल में उलझे मिले तो कभी गुलज़ार की नज़्म में ….

कभी एमी (अमृता प्रीतम) की किताबों में ढूँढती रही बरसों…. तो कभी बब्बा (ओशो) के “श” और “स” के फेर में….

लेकिन तुम तो मेरे जादुई इश्क की अमानत थे… तो उस इश्क को पाने से पहले कहाँ याद आने वाले थे…

फिर पूरे 16 साल बाद तुम्हें दोबारा सुना…. स्वामी ध्यान विनय के साथ बैठकर….

तुम्हारे तबले की थाप के साथ वो अपनी एक टूटी ऊंगली से कम्प्यूटर को ठक ठक करते रहे…. और खुद भी सुनाते रहे वो किस्सा कि कैसे आपको ये गीत भेजने के लिए इन्टरनेट की सारी गानों की साइट्स छान मारी थी… और मिला भी तो यूं कि आज आपके साथ बैठकर सुन पा रहा हूँ…

मैं उनकी पीठ पीछे बैठकर 16 बरसों से ज़हन में दबे तुम्हारें lyrics के साथ आंसू से भरी आँखों से उन्हें तकती रही…..

………………… और सुनती रही तुम्हें…. मैं ध्यान विनय से मिलने से पहले तक सिर्फ एक देह थी तो कहती रही ……
..
“लबों से चूम लो, आँखों से थाम लो मुझको
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले”

और वो हमेशा से प्रकृति है… तो कहते रहे…

“नदी है जाई जमीं की, नदी को बहने दो…
जमीं को फूलों के पेड़ों के सब्ज़ गहने दो……………………. ”
……..
जय जय नाथ जय नवनाथ, नाथ अनाथ के कनीफ़नाथ
जल के नाथ थल के नाथ, नाथ अनाथ के कनीफ़नाथ

नदी है जाई जमीं की, नदी को बहने दो…
जमीं को फूलों के पेड़ों के सब्ज़ गहने दो

पशु बनूँ मैं, पखेरू हवा में उड़ते रहें
पहाड़ी रास्ते जाकर घरों को मुड़ते रहें
जमीं गरजती रही बिजलियों की गोली से
भरा रहे ये गगन बादलों की होली से

तुम्हारा न्याय हमेशा जहां में जारी रहे
सुनहरी खेतों की माटी उपज से भारी रहे…
—————————————————–

और मेरे जहान में न्याय जारी रहा…
अपने जादुई निराकार इश्क को छूकर देख सकी…

तुम जैसे गीत का प्रार्थना बन जाना सिर्फ तुम्हारे जहान में मुमकिन है…
जहां मैं उस अनदेखे की आवाज़ के कहने पर जब फूलों को तोड़ने के लिए सर उठाती थी तो उसका अमृत मेरे होठों पर टपक जाता था….
जब वो बिना देखे कह देते था कि तुम्हारी दुनिया देखो कितनी गुलाबी है तो मेरे चारों और दुनिया सच में गुलाबी हो जाती थी… .

वो 600 किमी दूर बैठकर फोन पर कहते देखो कोयल कूकने वाली है तो मेरे शहर में उस पेड़ पर बैठी कोयल कूकने लग जाती थी… जिसके नीचे मैं खड़ी थी…
और फिर अपने उसी जादू के साथ तुम सा जादुई गीत सुना…
…………………………
गुलज़ार- दो सौंधे-सौंधे से जिस्म जिस वक़्त
एक मुट्ठी में सो रहे थे
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी

मैं आरज़ू की तपिश में पिघल रही थी कहीं
तुम्हारे जिस्म से होकर निकल रही थी कहीं
बड़े हसीं थे जो राह में गुनाह मिले
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले

गुलज़ार- तुम्हारी लौ को पकड़ के जलने की आरज़ू में
जब अपने ही आप से लिपट के सुलग रहा था
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी

तुम्हारी आँखों के साहिल से दूर दूर कहीं
मैं ढूंढती थी मिले खुशबुओं का नूर कहीं
वहीँ रुकी हूँ जहाँ से तुम्हारी राह मिले
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले…

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