दीप्त‍ि जन्मोत्सव : अवाम को ‘मिस चमको’ से मोहब्बत थी, है और रहेगी

दीप्त‍ि “मिस चमको” से तंग आ चुकी हैं. पिछले 36 सालों से यह तमगा उनका पीछा कर रहा है. वे जहां भी जाती हैं, उन्हें “मिस चमको” कहकर ही पुकारा जाता है, कभी-कभी तो लगभग किसी फ़ब्ती की तरह.

दीप्त‍ि इससे हैरान हैं. हाल ही में उन्होंने कहीं कहा कि उनका पूरा जीवन “मिस चमको” की छवि से बाहर निकलने की क़वायद है. उन्होंने कहा, “मैं “गर्ल नेक्स्ट डोर” नहीं हूं, मैं इस इमेज को ध्वस्त कर देना चाहती हूं.” “चश्मेबद्दूर” उन्नीस सौ इक्यासी में आई थी, उनकी तीसरी या चौथी फिल्म. उसके बाद दीप्त‍ि ने “साथ-साथ”, “कमला”, “पंचवटी”, “दामुल”, “मैं जिंदा हूं”, “फ्रिकी चक्र”, “मेमरीज़ इन मार्च” जैसी फिल्में की हैं, और वे चाहती हैं उन्हें इन फिल्मों के लिए याद रखा जाए.

वे चाहती हैं कि उन्हें फिल्म “लीला” के अपने इस संवाद के लिए याद रखा जाए : “आई हैड बिकम टू इंडिपेंडेंट फ़ॉर हिम सो आई थ्रू हिम आउट!” उन्होंने 1991 के बाद से मुख्यधारा की हिंदी फिल्में ना के बराबर की हैं. उन्होंने तिब्बत की ख़ाक़ छानी है, लदाख की पैदल सैर की हैं. उन्होंने टीवी सीरियल्स बनाए हैं, एक फिल्म भी : “दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश”. उन्होंने तीन किताबें लिखी हैं, फ़ोटोग्राफ़ी की है, पेंटिंग्स बनाई हैं. दीप्त‍ि चाहती हैं कि उन्हें “सेल्फ़ पोर्ट्रेट एज़ अ प्रेग्नेंट नन” बनाने वाली आर्टिस्ट के रूप में याद रखा जाए, “मिस चमको” के रूप में नहीं.

लोकवृत्त में काम करने वाले कलाकारों को अकसर इस दुविधा का सामना करना पड़ता है. “आर्टिस्ट” और “ऑडियंस” का द्वैत बहुत पेचीदा शै है. दोनों के बीच अजब अंत:क्रियाएं चलती हैं, पर्सेप्शंस की कांफ़्ल‍िक्ट होती हैं. एक “आर्टिस्ट” का काम अनिवार्यत: उसकी “ऑडियंस” के ही परिप्रेक्ष्य में होता है, अन्यथा उसका बस चले तो वह “ऑडियंस” को निरस्त ही कर दे.

“आर्टिस्ट” की अपनी महत्वाकांक्षाएं होती हैं, “ऑडियंस” की अपनी पसंद होती हैं, इनमें टकराव अवश्यंभावी है. लेकिन चूंकि एक “आर्टिस्ट” का समूचा ऐतिहासिक अस्त‍ित्व उसकी ऑडियंस की अनुशस्त‍ि पर आधारित होता है, जिसके बिना वह संदर्भहीन होकर इतिहासच्युत हो जाएगा, इसलिए वह बार-बार “ऑडियंस” के पास लौटकर आने को विवश होता है.

“आर्टिस्ट-ऑडियंस डायलेक्ट‍िक” दो छल्लों के आपस में ओवरलैप करने की तरह है, जिनकी त्रिज्याएं मिलकर एक साझा वृत्त का निर्माण करती हैं, लेकिन उस वृत्त का लगातार पुनर्सीमन भी होता रहता है. लोकवृत्त का दबाव “आर्टिस्ट” के सार्वजनिक व्यक्त‍ि-रूपक को पोषित और परिभाषि‍त करता है, जबकि “आर्टिस्ट” को लगातार यह शि‍क़ायत बनी रहती है कि उसकी श्रेष्ठ कृति के साथ न्याय नहीं किया जा रहा है.

मनुष्य का मन “जटिल” होता है. “आर्टिस्ट” का तो और ज़्यादा. “सरल” के प्रति वह विद्रोह करता है. उसे ख़ुद को “मनवाना” होता है. उसकी यह “जिद” होती है कि उसके महत्व को माना जाए और जायज़ वजहों से माना जाए. लेकिन ऑडियंस कभी अपने अपने चहेते कलाकार के पास उसका “लोहा मानने” के लिए नहीं आती है. वह उस पर “रीझने” के लिए आती है. वह एक निरायास “मुस्कराहट” पर भी रीझ सकती है, जिसके सामने समूचे जीवन की सायास पूंजी फीकी पड़ जाए. “आर्टिस्ट” को इससे कोफ़्त होती है. वह इसका “ज़ोरदार” प्रतिकार करता है. मार्केज़ ने बहुत “ज़ोर” लगाकर “पैट्रियार्क” लिखी थी, लेकिन रीडर्स को वह नहीं जंची तो नहीं जंची.

उन्होंने मार्केज़ को “सॉलिट्यूड” के लिए ही हमेशा प्यार किया. सिप्पी ने बहुत ज़ोर लगाकर “शान” बनाई, लेकिन वह दूसरी “शोले” नहीं बनी तो नहीं बनी. जैक्सन ने बहुत ज़ोर लगाकर “घोस्ट” बनाई थी, लेकिन वह एक महंगा मज़ाक़ बन गया. उसके चाहने वालों ने उसे हमेशा “थ्र‍िलर” के लिए ही पसंद किया. बच्चन का मतलब “मधुशाला” बन गया. फ़रीदा ख़ानूम का मतलब “आज जाने की जिद ना करो” बन गया.

इक़बाल बानो जीवनभर के लिए “हम देखेंगे” में सिमटकर रह गईं. बॉब डिलन “ब्लोइन इन द विंड” को लांघ नहीं सके. बहुत-सी चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन पर एक सीमा के बाद रचनाकार का बस नहीं चलता. “पब्लिक डोमेन” अजब चीज़ है. उसमें जाने के बाद चीज़ें एक अलग ही शक़्ल अख्त‍ियार कर सकती हैं, जो कि मूलत: सोची नहीं गई थीं. कुछ क्लासिक बन जाती हैं, कुछ मिथ कहलाती हैं, कुछ भुला दी जाती हैं, एक ठंडी क्रूरता के साथ, जो कि उन्मादी प्रशंसकों के ही बस की बात है.

दीप्त‍ि “मिस चमको” से तंग आ चुकी हैं, इसके बावजूद आने वाले सौ सालों तक उन्हें “मिस चमको” की तरह ही याद रखा जाएगा. अब यह किसी के भी बस में नहीं है. दीप्त‍ि अपने कॅरियर में चाहे जो उपलब्ध‍ियां हासिल कर लें, “मिस चमको” के सामने सब नाकुछ हैं. “पब्ल‍िक डोमेन” “श्रेय” को उतना महत्व नहीं देता, जितना वह “प्रेय” को महत्व देता है. अवाम को “मिस चमको” से मोहब्बत थी, है और रहेगी. सन् इक्यासी में अनजाने ही एक करिश्मा हो गया था, और करिश्मा ही सिर चढ़कर बोलता है!

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