यात्रा आनंद मठ की – 1 : पांच का सिक्का और आधा दीनार

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ट्रेन छूटने को थी, वो जल्दी से अपना पर्स टटोलने लगा…विदाई से पहले मैंने उससे हाथ मिलाने के लिए खिड़की से बाहर निकाला तो उसने एक पांच का सुनहरा सिक्का मेरे हाथ में देते हुए कहा… રસ્તા માં કોઈ નદી પડે તો એમાં નાખી દે જો… ” (रास्ते में कोई नदी पड़े तो उसमें डाल देना…)

मुझे लगा जैसे मैं पूरी की पूरी नदी हो गयी हूँ… और इस नदी ने मन ही मन उसे आशीर्वाद दिया… तुम्हारी सारी मन्नतें पूरी हो…. स्टेशन ओझल होते तक मैं उसे देखती रही… जैसे नदी किनारे की सौंधी मिट्टी में खेलता हुआ एक बच्चा… खेल के बाद घर लौट रहा हो…

गाड़ी पटरियों पर दौड़ रही थी, और मन नदी में सिक्का डालने से उठी तरंगों पर… आनंद मठ पुस्तक जाते समय ही पढ़ चुकी थी… लौटते में पढ़ने के लिए कुछ नहीं था… लेकिन ऐसा लगा जैसे कोई मेरे चेहरे को पढ़ रहा है…. मैंने चारों तरफ नज़रें घुमाई कोई नज़र नहीं आया…

कुछ देर आँखें बंद किये नदी में उठ रही लहरों को गिनती रही… एक एक करके यादों की स्लिप लगाकर तह करके रखती गयी… सफ़र से लौटने के बाद स्वामी ध्यान विनय कभी हिसाब नहीं माँगते… ना पैसों का ना अनुभवों का.. लेकिन मुझे उन्हें एक एक पल का हिसाब देना होता है… कभी कविता के रूप में, कभी कहानी, कभी यात्रा वृत्तांत, कभी आलिंगनों में, कभी आंसुओं में…

ये हमारे जीवन की कमाई होती हैं.. जो मुझे दिखाई देता है उस हिसाब से मैं उन्हें बताती हूँ कितना खोया और वो कुछ अनदेखे रहस्यों को उजागर कर हमेशा की तरह अचंभित करते हुए बताते हैं आप जिसे खोया कह रही हैं… वो कुछ ऐसा पाने के लिए खर्च किया गया है जो हर किसी को नसीब नहीं होता…

वो हमेशा कहते हैं आप अपनी किस्मत सुनहरे अक्षरों में लिखवाकर आई हैं, आपके संपर्क में मिट्टी भी आएगी तो सोना हो जाएगी… और मैं उनकी पगधूलि को मांग पर लगा सदा सुहागन होने के गर्व को भर लेती हूँ….

और फिर न जाने कितने ही योगियों और सिद्ध पुरुषों की तपस्या का अर्थ समझ आ जाता है…. ब्रह्माण्ड में ध्वनि तरंगों के रूप में विद्यमान मन्त्रों के वास्तविक अर्थ समझ आने लगते हैं, समझ आने लगते हैं शिव और शक्ति के बिम्बों पर टिकी इस धरती के स्थायित्व का गणित… समझ आने लगता है भौगोलिक, भौतिक और लौकिक विज्ञान के पीछे खड़ा अध्यात्म… लेकिन मैं आज तक इस रहस्य को समझ नहीं पाई कि कैसे हर बार ये मानव रूप में शिव का साक्षात रूप, मुझ कमज़ोर को शक्ति का दर्शन करवा जाता है….

मैं अचंभित सी खड़ी रह जाती हूँ और वो हर यात्रा के बाद हुए आत्मिक उन्नयन की झलक दिखा कर फिर से मानव रूप धर लेते हैं… फिर हम लड़ रहे होते हैं.. (और उनके हिसाब से वो कभी नहीं लड़ते), मैं रो रही होती हूँ, इल्जामों की बौछार और मुझसे अपनी योजनाओं को छुपाने की शिकायतों के साथ….

“आपको कुछ चाहिए हैं, तो मैं ला देता हूँ”- मेरे हाथ में पांच का सिक्का देख और मुझे खिड़की के बाहर स्टेशन पर किसी को ढूंढते हुए देख उसने पूछा.

मैंने कहा – “अरे नहीं मैं बाहर का कुछ नहीं खाती, यूं ही चाय वाले को खोज रही हूँ… धन्यवाद” और सिक्का मैंने अपने पर्स में डाल लिया…

वो भी मुस्कुरा दिया और चला गया… ट्रेन छूटने लगी तो मैं फिर उन दो आँखों को खोज रही थी.. अबकी बार उसकी आवाज़ भी थी साथ में… पांच मिनट तक कोई नहीं दिखा…
तो मैं खिड़की के बाहर देखने लगी.. हर बार की तरह इस बार भी साइड लोअर सीट पर अकेले ही बैठी थी… ऐसा अक्सर होता है सीट नम्बर चाहे जो मिले मुझे मेरी पसंदीदा जगह मिल ही जाती है… तो मेरे सामने वाली सीट पर भी कोई नहीं था… बस मेरा बैग मैंने सामने सीट पर रख लिया था…

लगा किसी ने कहा मैं आ जाऊं, आप अपना बैग अपने पास खींच लीजिये मैं यहाँ बैठ जाऊंगा… मैंने खिड़की से नज़र हटा कर देखा तो मेरी सीट वाली रो से अगली सीट के कोर्नर पर पर बैठा वो आँख बंद किये अपने मोबाइल से गाने सुन रहा था….

मेरी नज़र पड़ते ही उसकी आँखें खुल गयी…. मैंने इशारे से उसे अपनी सीट पर आने का निमंत्रण दिया.. वो मुस्कुराता हुआ आया तो मैंने बैग अपनी तरफ खिसका लिया. उसने बैठते से ही कहा- मुझे पता था आप मुझे बुलाएंगी और ये बैग अपनी तरफ खींचकर बैठने के लिए कहेंगी….
मैंने मुस्कुराते हुए कहा – अच्छा! ऐसा भी तो हो सकता है मैं आपको यहाँ से सन्देश दे रही थी आइये बैठिये मैं अपना बैग खिसका लूंगी…

इस बार वो अचंभित था…. आपको जादू आता है?

मैंने कहा नहीं मेरे पास साक्षात जादू है… एक दूसरे का नाम जाना तो उसने कहा – मेरे संपर्क में जितने भी लोग आते हैं उनका नाम अधिकतर श से शुरू होता है… मैंने कहा मेरे संपर्क में जितने भी लोग आते हैं उनमें से अधिकतर का नाम श पर ख़त्म होता है, जैसा कि आपका.

हम अजनबी थे लेकिन अजनबियों जैसी कोई बात नहीं हो रही थी…. आसपास वाले हमारी बातें सुन रहे थे, हम दोनों जैसे उनके लिए एलियन थे… उसने कहा मुझे कई बार ऐसा लगता है, जिन एलियंस की खोज करती रहती है दुनिया, वो वही है जिसे हम भगवान कहते हैं, और वो हम पर नज़र रखे हुए हैं…

मैं हंस दी…. मैंने कहा आपको यकीन है जितने लोग आपको यहाँ मानव शरीर में दिखाई दे रहे हैं, वो वास्तव में उपस्थित हैं? सामान्य दार्शनिक बातों ने paranormal रूप ले लिया था…. और लगा वो आसपास के लोगों को और गौर से देखने लगा है…

मैंने कहा नहीं पहचान पाओगे ऐसे… और पहचान होना होती है तो ऐसे ही हो जाती है जैसे अपनी हुई….

26-27 साल के उसके जीवन में उसे पहली बार ऐसा कोई मिला था जिसकी वजह से उसकी स्थापित धारणाएं छूट रही थी…

विवाह को लेकर भी वो बड़ा उलझन में था, कह रहा था वो इस तरह के किसी बंधन में नहीं पड़ना चाहता….

मैंने कहा मैं विवाहित हूँ… आपको लगता है मैं किसी भी तरह के बंधन में हूँ? फिर लगा नहीं, अब उसकी क्षमता से अधिक का डोज़ मिल रहा है तो मैं चुप हो गयी….

बहुत सारी इधर उधर की बातें करने के बाद उसने पूछा आप कौन हैं?

मन तो हुआ कह दूं प्रेम नदी…. वही, यात्राओं के दौरान रस्ते में पड़ने वाली नदी जिसमें प्रेमधन डालकर लोग मन्नत माँगते हैं, और नदी उनकी मन्नतों के पूरा होने का आशीर्वाद देती है… लेकिन फिर मैंने अपना सामान्य सा परिचय और मेकिंग इंडिया के बारे में बताते हुए कहा लोग ‘माँ’ कहते हैं….

हाँ वो आपकी बिंदी को देखकर ही समझ आता है… मेरे गले में ओशो की माला देखकर उसके मन में और भी सवाल जाग रहे थे…. जिसको पूछे बिना ही मैं एक एक करके जवाब देती गयी..
इन चार पांच घंटे की बातों के बाद उसने कहा आप किसी का भी ब्रेन वाश कर सकती हैं….
मैंने कहा शायद यह एक तरह की थेरपी है, जिसके लिए मुझे चुना गया है… ताकि आप जैसे लोगों की यात्रा जहां अटकी है, वहां के पत्थर निकाल कर रास्ता साफ़ कर सकूं…. और हाँ ये मेरा गुमान नहीं है, दुनिया में बहुत सारे विद्वान और सिद्ध पुरुष हैं जिनके आगे मैं मात्र तिनके के समान हूँ… लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव यदि मेरी रेंज के लोगों के काम आता है तो मैं खुद को सौभाग्यशाली समझती हूँ… कि परमात्मा ने मुझे इस काम के लिए चुना है…

बहुत लम्बे सफ़र के कारण वो थका हुआ सा लग रहा था, मुझे तो फिर भी कुछ देर में जबलपुर उतर जाना था.. उसे और भी आगे की यात्रा करनी बाकी थी… कहने लगा अगली बार ट्रेन से सफ़र नहीं करूंगा, बहुत समय खराब होता है, लम्बी दूरी के लिए हवाई यात्रा ठीक रहती है…

मैंने कहा ट्रेन में सफ़र नहीं करते तो मुझसे मुलाक़ात कैसे होती.. जीवन की यात्राएं भी ऐसी ही होती हैं… हम जिसे किसी का अचानक मिलना कहते हैं वो योजनाबद्ध होता है…. और फिर बुनियादी अनुभव प्राप्त करने के लिए लम्बी ज़मीनी यात्राओं से गुजरना आवश्यक होता है, फिर एक बार आप उस स्थिति को पार कर लेते हैं तो छोटी मोटी हवाई यात्रा से भी आप अपनी मंज़िल पर पहुँच जाते हैं….

जबलपुर पास आ रहा था… मैंने विदा के लिए हाथ बढ़ाया तो उसने हाथ मिलाने से मना कर दिया… नहीं अब मैं आपको लेकर भावुक हो रहा हूँ…

यही भावनाएं ही तो हमें इंसान बनाती है – मैंने उसका हाथ थपथपाते हुए कहा.

फिर मैंने अपना पर्स खोलकर वो पांच का सिक्का दिखाया और उसे बताया, अभी अभी जिस यात्रा से लौटी हूँ ये उसकी कमाई है… फिर मैंने उसे एक दूसरा दस का सिक्का देते हुए कहा, इस सिक्के को हमेशा अपने पास रखना This is our Lucky Charm, जीवन में जब भी किसी के लिए मन में प्रेम जागे, लगे कि उसका मिलना परमात्मा के दर्शन की झलक है तो एक दूसरा सिक्का उसे देना और उससे भी यही कहना कि वो इस सिक्के को संभालकर रखें और इस चेन को आगे बढ़ाए… हम इसे “प्रेमधन” कहेंगे… देखना एक दिन यही सिक्का हमारे पास लौटकर आएगा…

उसने वो सिक्का अपने पर्स में रख लिया, और अपने पर्स से एक आधे दीनार का नोट निकालकर उस पर अपने हस्ताक्षर करके मुझे देते हुए कहा मैं भारत में नहीं रहता, कुवैत में काम करता हूँ ये वहीं की करंसी है. यूं तो एक दोस्त ने मुझसे मंगवाया था उसके लिए संभालकर रखा था, लेकिन इसे अब आप रख लीजिये, मैं उसे कुवैत पहुंचकर दूसरा भिजवा दूंगा…

इस बार मैं इस एक मुलाक़ात के लिए तैयार की गयी प्रकृति की योजना पर अचंभित थी… मैंने उस आधे दीनार के नोट को भी उस पांच के सिक्के के साथ संभालकर रख दिया…

उसने बहुत झिझकते हुए पूछा क्या मैं जान सकता हूँ ये पांच का सिक्का आपको किसने दिया?

मैंने कहा हाँ बताऊंगी ना… मेरे पाठक भी उत्सुक होंगे जानने के लिए… है ना!!

यात्रा जारी है…

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